सूत्रों के मुताबिक, दस-दस साल से लंबित आश्वासनों के बीच कई माननीय बड़े जोश से सवाल लगाते हैं, रणनीति बनती है, कागज़ तैयार होते हैं—और फिर अचानक वही सवाल ‘डस्टबिन’ में चला जाता है। कारण? कथित “डील”!
एमपीबीडीसी का ताज़ा किस्सा: जनवरी में ‘फील्डिंग’, फरवरी में वापसी !
चर्चा गर्म है कि हालिया फरवरी सत्र में एमपी बीटीसी में हुई नियुक्तियों पर एक माननीय ने सवाल लगाया। लेकिन विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि इसकी पूरी “फील्डिंग” जनवरी में ही कर ली गई थी।
बताया जा रहा है कि उसी समय कुछ “एडवांस” राशि भी दी गई। इसी एडवांस के आधार पर माननीय ने अपना वादा निभाया और फरवरी सत्र में सवाल वापस ले लिया। मामला यहीं खत्म नहीं होता। अभियंता पक्ष विधानसभा समाप्त होने की प्रतीक्षा में शेष भुगतान को लेकर माननीय को “लटकाए” हुए है। यही वजह बताई जाती है कि माननीय के गुर्गे एमपीबीडीसी के दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए देखे गए। वहीं से यह पूरा घटनाक्रम राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना और मामला संज्ञान में आया।
कहा तो यहां तक जा रहा है कि दस लाख के “प्रसाद” वाले सूटकेस ने सवाल की धार कुंद कर दी—सूटकेस पहुंचा, सवाल साइलेंट!
विधानसभा: विमर्श का मंच या नौटंकी का मंचन?
विधानसभा में पक्ष-विपक्ष सामाजिक सरोकारों और प्रदेशहित के मुद्दों पर चर्चा के लिए बैठते हैं। लेकिन यदि सवाल ही ‘समझौते’ में बदल जाएं, तो जवाबदेही किससे मांगी जाए? क्या अब प्रश्न पूछना भी ‘पैकेज’ का हिस्सा बन गया है?
अगर आरोपों में दम है, तो यह केवल एक माननीय या एक विभाग का मामला नहीं—पूरे तंत्र की साख का प्रश्न है। और यदि आरोप निराधार हैं, तो संबंधित पक्षों को खुलकर सामने आकर खंडन करना चाहिए।
लोकतंत्र का आईना
लोकतंत्र में सवाल जनता की आवाज़ होते हैं। यदि वही आवाज़ ‘मोल’ में बदल जाए, तो यह प्रदेश की राजनीति के लिए गंभीर संकेत है।
अब निगाहें इस बात पर हैं कि क्या इस कथित सौदेबाज़ी की निष्पक्ष जांच होगी? या फिर अगला सत्र आएगा, नए सवाल लगेंगे, और पुराने सवालों की तरह वे भी “समझौते” की फाइल में समा जाएंगे?
(नोट: उपरोक्त आरोप सूत्रों और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित हैं। संबंधित पक्षों की आधिकारिक प्रतिक्रिया प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)
