चेहरा पहचानकर हाजिरी और जियो-फेंसिंग से उपस्थिति दर्ज कराने की व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल; चेक-इन से चेक-आउट तक लोकेशन और फोटो का डिजिटल रिकॉर्ड रहेगा उपलब्ध, लेकिन संवेदनशील जानकारी की सुरक्षा और उसके दुरुपयोग की जिम्मेदारी कौन लेगा?
भोपाल/ग्वालियर 3 नवंबर 2026। सरकारी कामकाज में तकनीक का इस्तेमाल पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने का प्रभावी माध्यम हो सकता है, लेकिन जब तकनीक लागू करने की प्रक्रिया में उन कर्मचारियों की सुरक्षा और निजता ही जोखिम में पड़ने लगे, जिनके कंधों पर संवेदनशील और चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारियां हैं, तब व्यवस्था की उपयोगिता के साथ उसके संभावित दुष्परिणामों पर सवाल उठना भी लाजिमी है। मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में लागू किया जा रहा SARTHAK (सार्थक) ऐप इसी दोहरे सवाल के केंद्र में आ गया है। विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के उद्देश्य से शुरू की जा रही इस व्यवस्था को प्रशासनिक अनुशासन की दिशा में कदम बताया जा सकता है, लेकिन आबकारी कार्यपालिक बल के मैदानी कर्मचारियों की सुरक्षा के लिहाज से इसके कई प्रावधान गंभीर चिंता पैदा कर रहे हैं।
आबकारी आयुक्त दीपक कुमार सक्सेना द्वारा 2 नवंबर 2026 को डिजिटल हस्ताक्षर से जारी आदेश के अनुसार 4 नवंबर से विभाग में जियो-फेंसिंग (Geo-fencing) और फेस रिकग्निशन (Face Recognition) आधारित सार्थक ऐप लागू किया जाना है। इसके माध्यम से अधिकारियों एवं कर्मचारियों को प्रतिदिन अपनी उपस्थिति चेक-इन और चेक-आउट के जरिए दर्ज करनी होगी। आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह व्यवस्था केवल कार्यालय में बैठकर काम करने वालों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि फील्ड में तैनात कार्यपालिक बल को भी इसका पालन करना होगा।
हाजिरी की व्यवस्था या मैदानी अमले की गतिविधियों का डिजिटल रिकॉर्ड?
आयुक्त के आदेश में आठ बिंदुओं के माध्यम से ऐप के
संचालन और निगरानी की प्रक्रिया निर्धारित की गई है। इसके तहत कर्मचारी IFMIS पोर्टल की यूनिक आईडी से लॉगिन करेंगे। पहली बार लॉगिन करने पर कार्यालय अथवा कार्यक्षेत्र की लोकेशन निर्धारित करनी होगी और फेस आइडेंटिफिकेशन की प्रक्रिया पूरी करनी होगी। इसके बाद निर्धारित कार्यदिवस में जियो-फेंसिंग क्षेत्र के भीतर फेस रिकग्निशन के माध्यम से चेक-इन और चेक-आउट करना अनिवार्य होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश के बिंदु क्रमांक 4 में कार्यपालिक कर्मचारियों को प्रतिदिन अपने निर्धारित कार्यालय के साथ-साथ शासकीय कार्रवाई के दौरान कार्यक्षेत्र में अन्य स्थानों से भी उपस्थिति दर्ज करने की अनुमति दी गई है। यानी आबकारी अधिकारी अथवा कर्मचारी किसी दूसरे स्थान पर कार्रवाई कर रहे हैं तो वहां से भी अपनी उपस्थिति दर्ज कर सकेंगे।
इतना ही नहीं, निर्धारित कार्यालय अथवा कार्यक्षेत्र की लोकेशन से बाहर रहकर उपस्थिति दर्ज करने की स्थिति में भ्रमण, मीटिंग, ट्रेनिंग और अतिरिक्त प्रभार जैसे कारणों का उल्लेख करना अनिवार्य होगा। आदेश के बिंदु क्रमांक 6 के अनुसार कर्मचारियों द्वारा दर्ज की गई उपस्थिति से संबंधित समय, लोकेशन और फोटो की जानकारी सार्थक वेब पोर्टल पर संबंधित नियंत्रणकर्ता अथवा कार्यालय प्रमुख के लॉगिन पर प्रदर्शित होगी। बिंदु क्रमांक 7 में अधीनस्थ अधिकारियों एवं कर्मचारियों की उपस्थिति की नियमित मॉनिटरिंग के निर्देश भी दिए गए हैं।
यहीं से इस व्यवस्था की उपयोगिता के साथ एक बड़ा सुरक्षा संबंधी सवाल खड़ा होता है। जब किसी आबकारी अधिकारी या कर्मचारी की फील्ड में मौजूदगी, कार्रवाई के स्थान और उपस्थिति का समय डिजिटल रूप से दर्ज होगा, तब इस संवेदनशील जानकारी तक पहुंच रखने वाले लोगों की संख्या, उनकी भूमिका और डेटा की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
शराब माफियाओं से मुकाबला करने वाले अमले की लोकेशन कितनी सुरक्षित?
आबकारी विभाग का कार्य दूसरे सामान्य सरकारी विभागों से अलग है। इस विभाग के कार्यपालिक बल को अवैध शराब निर्माण, तस्करी, परिवहन और बिक्री के खिलाफ कार्रवाई करनी होती है। इस दौरान उनका सामना ऐसे शराब कारोबारियों और संगठित माफियाओं से भी होता है, जिनके लिए सरकारी कार्रवाई सीधे उनके अवैध आर्थिक हितों पर चोट होती है। ऐसे में आबकारी अमले की गतिविधियों और लोकेशन से जुड़ी जानकारी सामान्य प्रशासनिक डेटा नहीं, बल्कि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील जानकारी है।
विभागीय कर्मचारियों की सबसे बड़ी आशंका यह है कि यदि उनकी लोकेशन और कार्रवाई से संबंधित जानकारियां अनधिकृत व्यक्तियों के हाथ लग गईं अथवा किसी कर्मचारी द्वारा जानबूझकर किसी बाहरी व्यक्ति तक पहुंचा दी गईं, तो इसका इस्तेमाल आबकारी अमले की गतिविधियों पर नजर रखने, कार्रवाई को विफल करने या कर्मचारियों को निशाना बनाने के लिए किया जा सकता है।
मसलन, कोई आबकारी अधिकारी किस क्षेत्र में कार्रवाई के लिए गया है, किस समय वहां मौजूद है और किस समय वहां से रवाना हुआ है, ऐसी जानकारी गलत हाथों में पहुंचने पर उसके लिए गंभीर खतरा बन सकती है। खासकर तब, जब कार्रवाई शराब माफियाओं के प्रभाव वाले क्षेत्रों में की जा रही हो।
यहां सवाल केवल लाइव लोकेशन का नहीं, बल्कि चेक-इन और चेक-आउट के बीच दर्ज होने वाली गतिविधियों, लोकेशन और फोटो की गोपनीयता का भी है। आदेश में इन जानकारियों को नियंत्रक अधिकारियों के पोर्टल पर प्रदर्शित करने की बात कही गई है, लेकिन इनके एक्सेस पर किस स्तर का नियंत्रण रहेगा, कौन-कौन इन्हें देख सकेगा, डेटा कितने समय तक सुरक्षित रहेगा और इसके अनधिकृत इस्तेमाल पर क्या कार्रवाई होगी, इन सवालों का स्पष्ट जवाब भी आवश्यक है।
पर्याप्त सुरक्षा संसाधन नहीं, फिर कर्मचारियों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
आबकारी कार्यपालिक बल का एक बड़ा हिस्सा सीमित संसाधनों और सीमित स्टाफ के बीच दिन ही नहीं, रात में भी कार्रवाई करता है। कई बार संवेदनशील इलाकों में दबिश और अवैध शराब के नेटवर्क के खिलाफ कार्रवाई के दौरान उन्हें ऐसे लोगों का सामना करना पड़ता है, जिनसे व्यक्तिगत दुश्मनी तक की आशंका बनी रहती है।
इसके बावजूद आबकारी अमले के पास पुलिस बल जैसी पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था, हथियार और अतिरिक्त बल उपलब्ध होने का दावा नहीं किया जा सकता। ऐसे में यदि किसी कर्मचारी की लोकेशन या कार्रवाई से जुड़ी जानकारी लीक होती है तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए विभाग के पास क्या व्यवस्था है?
हाल के दिनों में शराब माफियाओं के दुस्साहस और पुलिस अधिकारियों पर हुए जानलेवा हमलों की घटनाएं इस आशंका को और गंभीर बनाती हैं। देवास में थाना प्रभारी की हत्या जैसी घटना के बाद यह सवाल और प्रासंगिक हो जाता है कि जब अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हो सकते हैं, तब शराब के अवैध कारोबार के खिलाफ कार्रवाई करने वाले आबकारी अमले की सुरक्षा को लेकर अतिरिक्त सतर्कता क्यों नहीं बरती जानी चाहिए?
पुलिस और आबकारी बल की कार्यप्रकृति तथा तैनाती की व्यवस्था अलग-अलग है, लेकिन दोनों का सामना ऐसे अपराधियों से होता है जो सरकारी कार्रवाई का विरोध करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसलिए आबकारी कर्मचारियों की लोकेशन संबंधी जानकारी की सुरक्षा को महज तकनीकी औपचारिकता मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मॉनिटरिंग के लिए संभागीय टीम है तो हर कर्मचारी की लोकेशन का जोखिम क्यों?
यदि विभाग का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आबकारी अधिकारी और कर्मचारी अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में सक्रिय रहकर काम कर रहे हैं, तो इसके लिए पहले से मौजूद विभागीय निगरानी तंत्र को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
संभागीय स्तर पर उपायुक्त आबकारी और उनकी टीम के माध्यम से मैदानी अमले की सक्रियता, कार्रवाई और कार्यप्रणाली का भौतिक सत्यापन कराया जा सकता है। समय-समय पर औचक निरीक्षण, कार्रवाई की रिपोर्ट, पंचनामा, जब्ती और अन्य विभागीय रिकॉर्ड के आधार पर भी जवाबदेही तय की जा सकती है।
ऐसी स्थिति में सवाल यह है कि क्या कर्मचारियों की उपस्थिति दर्ज कराने के लिए ऐसा तकनीकी मॉडल आवश्यक है, जिसमें उनके फील्ड मूवमेंट से जुड़ी संवेदनशील जानकारियां भी डिजिटल रूप से उपलब्ध रहें? तकनीक का इस्तेमाल जरूर होना चाहिए, लेकिन उसका स्वरूप ऐसा हो जिससे प्रशासनिक पारदर्शिता भी बनी रहे और मैदानी कर्मचारियों की सुरक्षा भी प्रभावित न हो।
आयुक्त को स्पष्ट करना चाहिए सुरक्षा की गारंटी कौन देगा?
आबकारी आयुक्त के आदेश में सार्थक ऐप की तकनीकी समस्याओं के निराकरण के लिए विभागीय तकनीकी कंसल्टेंट का मोबाइल नंबर तक उपलब्ध कराया गया है, लेकिन कर्मचारियों की लोकेशन और फोटो जैसे संवेदनशील डेटा की सुरक्षा के लिए क्या विशेष प्रोटोकॉल बनाया गया है, इस संबंध में आदेश में कोई विस्तृत व्यवस्था दिखाई नहीं देती।
ऐसे में विभाग को तत्काल स्पष्ट करना चाहिए कि पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी तक पहुंच किन-किन अधिकारियों और कर्मचारियों को होगी? क्या प्रत्येक लॉगिन की निगरानी और ऑडिट होगा? क्या लोकेशन और फोटो का डेटा किसी बाहरी व्यक्ति अथवा अनधिकृत कर्मचारी तक पहुंचने से रोकने की पुख्ता व्यवस्था है? क्या संवेदनशील कार्रवाई के दौरान कर्मचारियों को विशेष सुरक्षा प्रोटोकॉल अथवा वैकल्पिक उपस्थिति व्यवस्था उपलब्ध कराई जाएगी?
सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि यदि किसी आबकारी कर्मचारी की लोकेशन लीक होने के कारण उसके साथ कोई अप्रिय घटना होती है, तो उसकी जवाबदेही किसकी होगी?
प्रशासनिक अनुशासन के नाम पर कर्मचारियों की सुरक्षा को दांव पर नहीं लगाया जा सकता। सार्थक ऐप की उपयोगिता पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए, बशर्ते इसका इस्तेमाल हाजिरी और कार्यप्रणाली की निगरानी तक सीमित, सुरक्षित और नियंत्रित रहे। लेकिन यदि यह व्यवस्था अनजाने में भी शराब माफियाओं के लिए आबकारी अमले की गतिविधियों की जानकारी हासिल करने का माध्यम बनती है तो यह विभाग के लिए बेहद घातक साबित हो सकती है।
अब देखना यह है कि सार्थक ऐप आबकारी विभाग में जवाबदेही और पारदर्शिता का सार्थक माध्यम बनता है या सुरक्षा संबंधी खामियों के चलते मैदानी अमले के लिए एक नया जोखिम खड़ा करता है। क्योंकि जिस अमले को शराब माफियाओं से सरकार की लड़ाई लड़नी है, उसकी सुरक्षा की कीमत पर डिजिटल हाजिरी का अनुशासन कायम करना किसी भी स्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता।
