विभाग में विशेषज्ञता की अनदेखी, भविष्य पर प्रश्नचिह्न
भोपाल। मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग की वर्तमान स्थिति को देखकर कभी-कभी ऐसा लगता है मानो इसकी कमान इस पृथ्वी के नहीं बल्कि किसी दूसरे ग्रह के प्राणियों के हाथों में हो। ऐसे प्राणी जो भले ही शिक्षा-शास्त्र की सामान्य समझ न रखते हों, किंतु उनमें कुछ “विशेष” अवश्य है _ शायद वही विशेषता उन्हें शिक्षा व्यवस्था का स्वामी बनाती है।
खगोलशास्त्र बताता है कि शुक्र ग्रह का एक दिन पृथ्वी के लगभग एक वर्ष के बराबर होता है। यदि यही गणित मध्यप्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग पर लागू करें तो पिछले तेरह वर्षों में जो कुछ हुआ है, वह मानो शुक्र ग्रह के केवल तेरह दिनों की कहानी भर है_ लेकिन इन तेरह दिनों में शिक्षा विभाग का “तेरहवाँ” लगभग तय कर दिया गया है।
प्रदेश में राज्य शिक्षा सेवा लागू होने के बाद से विभाग के मूल कैडर_ अर्थात शिक्षक संवर्ग की स्थिति अत्यंत विडम्बनापूर्ण हो गई है। पिछले लगभग तेरह वर्षों में न तो उन्हें पदोन्नति का अवसर मिला और न ही नये सृजित पदों पर नियुक्ति का। जिस सेवा के नाम पर शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने की बात कही गई थी, वही सेवा धीरे-धीरे अपने मूल आधार से कटती चली गई। स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि जिन पदों का मूल उद्देश्य शिक्षा व्यवस्था का शैक्षणिक नेतृत्व करना था, वे धीरे-धीरे सामान्य प्रशासनिक पदों में बदलते चले गये। शिक्षा-शास्त्र और शिक्षा-मनोविज्ञान का अध्ययन किये बिना भी अब कोई भी व्यक्ति शिक्षा व्यवस्था का संचालक बन सकता है_ कम से कम व्यवस्था का संदेश तो यही है।
विडम्बना यह है कि अन्य सभी विभागों में विशेषज्ञता का महत्व आज भी स्वीकार किया जाता है। वित्त विभाग में वित्त सेवा के अधिकारी, कृषि विभाग में कृषि विशेषज्ञ, उद्यानिकी विभाग में उद्यानिकी विशेषज्ञ ही नियुक्त किये जाते हैं। यहाँ तक कि सहायक संचालक जैसे पदों के लिए भी अधिकांश विभाग विषय-विशेष में उच्च योग्यता को अनिवार्य मानते हैं।लेकिन शिक्षा विभाग, जो किसी भी समाज और राष्ट्र के भविष्य की नींव तैयार करता है, शायद एकमात्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ विशेषज्ञता को अनावश्यक मान लिया गया है। मानो यह मान लिया गया हो कि शिक्षा चलाने के लिए शिक्षा की समझ आवश्यक नहीं है।
आज से दो वर्ष पूर्व प्रत्यक्ष भर्ती के माध्यम से नियुक्त हुए सहायक संचालक जल्द ही अपनी परिवीक्षा अवधि पूर्ण कर लेंगे। आने वाले वर्षों में वे भी उसी प्रशासनिक परम्परा का हिस्सा बन जायेंगे, जिसमें शिक्षा-तंत्र को चलाने वाले अधिकांश लोग स्वयं शिक्षा-शास्त्र से दूर रहे हैं। ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब शिक्षा व्यवस्था का संचालन ही उन लोगों के हाथों में होगा जिन्होंने शिक्षा को विषय के रूप में कभी पढ़ा ही नहीं, तो उनसे शिक्षा-नीति की गहराई या शिक्षण-प्रक्रिया की समझ की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यदि यही क्रम चलता रहा तो संभव है कि आने वाले वर्षों में हम सब अपने ही जीवनकाल में स्कूल शिक्षा विभाग का “श्राद्ध” होते देख लें। और तब यह केवल एक प्रशासनिक असफलता नहीं होगी, बल्कि उस व्यवस्था की पराजय होगी जिसने शिक्षा को ही महत्वहीन मान लिया।
