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गहरी नींद में सो रहे निगम कर्मियों को काम पर लगाना निगमायुक्त के लिये सबसे बड़ी चुनौती

निगम कर्मचारियों की लापरवाही से ग्वालियर नगर की हालत जर्जर, जनता त्रस्त

ग्वालियर। लगातार गिरती साख से जूझ रहे ग्वालियर नगर निगम के सामने अब हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो चुके हैं। नगर निगम आयुक्त श्री संघप्रिय ने एक ओर जहां बेलगाम अधिकारियों और कर्मचारियों पर नकेल कसना शुरू कर दिया है, वहीं दूसरी ओर कलेक्टर द्वारा ली गई वायु सुधार समीक्षा बैठक ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है।

“युगक्रांति समाचार” ने अपनी ब्रेकिंग न्यूज़ में शहर के

विभिन्न हिस्सों की बदहाल स्थिति, गंदगी और कचरे के अंबार को लाइव वीडियो के माध्यम से उजागर कर नगर निगम प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया था। जिस पर नगर निगम आयुक्त संघप्रिय त्वरित संज्ञान लिया,

साथ ही इस खबर का बड़ा असर भी दिखा—गंदगी से त्रस्त शहर को राहत देने की दिशा में कदम उठाते हुए नगर निगम आयुक्त ने वार्ड क्रमांक 20, 30 एवं 65 के डब्ल्यूएचओ को बर्खास्त कर दिया।

इन अधिकारियों की कार्यशैली इस हद तक बिगड़ चुकी थी कि वे सफाई कर्मचारियों को बिना काम पर आए और बिना ड्यूटी किए ही निगम के खजाने से वेतन दिलवा रहे थे। मामला संज्ञान में आते ही निगम आयुक्त ने तत्काल सख्त कार्रवाई की और अन्य अधिकारियों एवं कर्मचारियों को शहर में फैले कचरे और गंदगी के ढेरों को तत्काल हटाने के निर्देश दिए।

स्वच्छता सर्वेक्षण 2026: बड़ी जिम्मेदारी, कड़ी परीक्षा

आगामी स्वच्छता सर्वेक्षण 2026 को देखते हुए यह निगम प्रशासन के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। यदि ग्वालियर को एक मजबूत प्रतिभागी के रूप में प्रस्तुत करना है, तो निगम आयुक्त को शहर को स्वच्छ और सुंदर बनाने के लिए भागीरथ प्रयास करने होंगे।
केंद्रीय टीम के निरीक्षण में अधिकतम अंक प्राप्त करने के लिए जमीनी स्तर पर ठोस सुधार अनिवार्य है।
निगम आयुक्त के यह प्रयास शायद उन अधिकारियों और कर्मचारियों को जगाने में सफल हों, जो लंबे समय से जिम्मेदारियों के प्रति उदासीन बने हुए हैं।

वायु सुधार: कागज़ी योजना या जमीनी समाधान?

कलेक्टर श्रीमती रुचिका चौहान ने शहरी क्षेत्र में वायु सुधार कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि शहर में वायु गुणवत्ता सुधार के लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की जाएं।
*वायु सुधार कार्यक्रम के तहत 20 करोड़ रुपये का प्रावधान
*अब तक 9 करोड़ 50 लाख रुपये के कार्य पूर्ण
*शेष कार्य प्रगति पर

कलेक्टर ने निर्देश दिए कि ऐसे स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र चिन्हित किए जाएं, जहां बरसात में जलभराव या कीचड़ की समस्या होती है, और वहां पेवर ब्लॉक लगाए जाएं। इसके साथ ही शहर के सभी फाउंटेन स्थलों पर फॉगर लगाने की व्यवस्था सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

ग्वालियर का वार्ड 18—जहां लगभग 24 हजार मकान और करीब एक लाख की आबादी निवास करती है—आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए जूझ रहा है।
शताब्दीपुरम, आदित्यपुरम, दीनदयाल नगर सहित कई कॉलोनियां ऐसी हैं, जहां हालात बेहद खराब हैं:

सड़कें कच्ची, उखड़ी हुई या मोरम की

दिनभर उड़ती धूल, शाम होते ही स्थिति भयावह

लोगों को सांस लेने में तकलीफ

वार्ड 18 की हकीकत ये है कि यहां हजारों की संख्या में लोगो की जिंदगी धूल में दम तोड़ती प्रतीत होती है। इन समस्याओं का असर आसपास की सड़कों पर भी साफ दिखाई देता है।

शताब्दीपुरमसचिन तेंदुलकर मार्ग पर भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिलती है, हालांकि वहां स्थायी समाधान के रूप में सड़क निर्माण कार्य शुरू किया जा रहा है।

वास्तविकता यह है कि वायु प्रदूषण और धूल की समस्या का मूल कारण खराब और अधूरी सड़कें हैं। फॉकर मशीन और फव्वारे अस्थायी उपाय हो सकते हैं, लेकिन स्थायी समाधान केवल सड़क निर्माण और बुनियादी ढांचे के सुधार में ही निहित है। यदि सुधार के नाम पर केवल दिखावटी उपाय किए जाते हैं, तो यह जनता और सरकार दोनों की आंखों में धूल झोंकने जैसा होगा।

बजट बनाम चुनौती: आगे की राह कठिन

यदि कलेक्टर की समीक्षा के अनुरूप निगम आयुक्त संघप्रिय वायु सुधार के लिए ठोस निर्माण कार्यों पर जोर देते हैं, तो बजट की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आएगी।
ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि प्रशासन प्राथमिकताओं को कैसे तय करता है। किसी भी कॉलोनी को कच्ची अथवा अवैध बताकर अपनी जिम्मेदारी से बचना जनता के साथ बेमानी होगी, क्योंकि यह सभी स्मार्ट शहर ग्वालियर एवं स्वच्छ भारत के हिस्सा है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या निगम आयुक्त और जिला प्रशासन धूल और गंदगी की समस्या को जड़ से खत्म करने के लिए ठोस और स्थायी कदम उठाएंगे?
या फिर फॉगर और फव्वारों के सहारे औपचारिकता निभाकर खुद को सही ठहराने की कोशिश की जाएगी?