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ग्वालियर में तोमर और सिंधिया में सियासत की मैराथन

संपादक बृजराज सिंह की प्रस्तुति। ग्वालियर-चंबल अंचल की राजनीति इन दिनों पूरी तरह ‘मैराथन मोड’ में नजर आ रही है, जहां केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया और मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के बीच वर्चस्व को लेकर सियासी घमासान चरम पर है। यह टकराव अब केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नहीं बल्कि प्रभाव और पकड़ की खुली जंग में तब्दील हो चुका है।

पिछले काफी समय से दोनों नेताओं के बीच यह खींचतान जारी है। इसकी शुरुआत विधानसभा और लोकसभा चुनावों से हुई थी, लेकिन अब यह सियासी संघर्ष_ एक लंबी मैराथन दौड़ का रूप ले चुका है। भले ही सिंधिया पर दूसरी पार्टी से बगावत कर भाजपा में शामिल होने के आरोप लगते रहे हों, लेकिन इसके बावजूद पूरे प्रदेश में उनके साथ इस सियासी दौड़ में कदम से कदम मिलाकर दौड़ने वाले कई मजबूत “धावक” मौजूद हैं।

वहीं दूसरी ओर, चुनाव के दौरान वायरल हुए वीडियो ने नरेंद्र सिंह तोमर की सियासत के सितारों को गर्दिश में लाने की शुरुआत कर दी थी। मौजूदा हालातों में उनके साथ इस मैराथन में दौड़ने वाले सीमित चेहरे ही नजर आते हैं। इनमें ग्वालियर सांसद भारत सिंह कुशवाह, मुरैना सांसद शिवमंगल सिंह तोमर और भिंड सांसद संध्या राय शामिल हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि “दंडी (बैटन)” संभालकर इस दौड़ में सक्रिय रूप से केवल ग्वालियर सांसद कुशवाह ही दौड़ते दिखाई देते हैं। बाकी चेहरे या तो हाशिए पर हैं या इस दौड़ में खुद को अनफिट मानकर दूरी बनाए हुए हैं।

इसके उलट सिंधिया खेमे की बात करें तो उनके पास ग्वालियर में ही ऊर्जा मंत्री प्रद्युम्न सिंह तोमर और प्रभारी मंत्री तुलसीराम सिलावट जैसे ऊर्जावान और आक्रामक धावक मौजूद हैं, जो लगातार मैदान में सक्रिय रहकर सियासी बढ़त बनाए रखने में जुटे हैं।

रणनीति की जीत या नेतृत्व की हार? यही तय करेगा नतीजा

सियासत हो या जंग—दोनों ही मैदान में मजबूत पट्ठों और भरोसेमंद योद्धाओं की अहमियत सबसे ज्यादा होती है।सियासत में केवल पद का रुतबा नहीं, बल्कि टीम को साथ लेकर चलने की क्षमता ही असली ताकत होती है। यही वह मोड़ है जहां दोनों नेताओं की कार्यशैली में साफ अंतर नजर आता है। एक ओर सिंधिया अपने अनुयायियों और समर्थकों को लगातार मजबूती और संरक्षण देते हुए उन्हें आगे बढ़ाते रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तोमर पर आरोप है कि उन्होंने अपनी ही बक्र दृष्टि से अपने अनुयायियों और समर्थकों को कमजोर कर दिया। जबकि एक दौर में नरेंद्र तोमर का रुतबा मोदी कैबिनेट के दिल्ली दरबार से लेकर मध्य प्रदेश की सत्ता और संगठन की जड़ों तक था। मगर असुरक्षा के भाव से उद्दीप्त इनकी बक्र द्रष्टि ने अपने ही समर्थकों रूपी मैदान का सफाया कर दिया।

यही असली वजह अब इस सियासी मैराथन की दिशा तय करती नजर आ रही है। मौजूदा परिस्थितियों में सिंधिया जहां बढ़त बनाते दिख रहे हैं, वहीं तोमर के सामने अपनी टीम को दोबारा संगठित और सक्रिय करने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।

अब देखना यह है कि इस लंबी सियासी दौड़ में अंतिम बाजी कौन मारता है, लेकिन फिलहाल तस्वीर साफ इशारा कर रही है कि ग्वालियर-चंबल की इस मैराथन में सिंधिया की रफ्तार भारी पड़ती दिख रही है। तोमर को अपनी टीम की रफ्तार बढ़ाने के लिए अब कड़े फैसले लेने ही होंगे, वरना फिनिश लाइन अब दूर नहीं…।