मीणा बंधु और एसीएम पर मिलीभगत के गंभीर आरोप, लाइसेंसी ठेकेदारों से ‘सेटिंग’ का खेल उजागर
ग्वालियर। ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर चल रहा पुनर्विकास कार्य जहां एक ओर सुस्त रफ्तार का शिकार है, वहीं दूसरी ओर खानपान इकाइयों के व्यवस्थापन के नाम पर वाणिज्यिक विभाग में कथित तौर पर अवैध कमाई का खेल जोरों पर है।
सूत्रों के अनुसार, स्टेशन पर खानपान इकाइयों के लिए स्थान निर्धारण का कार्य सामान्यतः 5-6 अधिकारियों के जॉइंट नोट् के आधार पर किया जाता है। लेकिन पुनर्विकास के दौरान इस प्रक्रिया को दरकिनार कर मनमाने तरीके से निर्णय लिए जा रहे हैं।
आरोप है कि मंडल वाणिज्यिक निरीक्षक (DCI) वाय के मीणा इस पूरी प्रक्रिया को अपने स्तर पर संचालित कर रहे हैं। जॉइंट नोट जैसी अनिवार्य प्रक्रिया की अनदेखी करते हुए, लाइसेंसधारियों के साथ कथित ‘सेटिंग’ के आधार पर स्थान आवंटन किया जा रहा है।
‘सेटिंग’ वालों को प्राइम लोकेशन, बाकी को सन्नाटा
बताया जा रहा है कि जो ठेकेदार ‘रस्म अदायगी’ करते हैं, उन्हें स्टेशन पर प्रमुख और व्यावसायिक रूप से लाभकारी स्थान दिए जाते हैं। वहीं, जो इस व्यवस्था में शामिल नहीं होते, उन्हें ऐसे स्थान थमा दिए जाते हैं जहां ग्राहक के नाम पर सन्नाटा पसरा रहता है।
उदाहरण के तौर पर_ जैसे स्टेशन के पूर्वी हिस्से में अंजनी फूडवैन को कथित रूप से लाभार्जन के एवज में निर्धारित स्थान (जीआरपी थाना और सुलभ शौचालय के पास) के बजाय पार्किंग क्षेत्र में जगह दे दी गई। इस फैसले से फूड वैन के तो बल्ले बल्ले हो गए मगर पार्किंग क्षेत्र में संकीर्णता और अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिससे यात्रियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
वहीं पश्चिमी हिस्से में सिमरन कैटर द्वारा कथित तौर पर पेशगी न देने पर डीसीआई की नाराजगी का शिकार होना पड़ा। उसे पुराने जीआरपी (नैरो गेज) थाना क्षेत्र से हटाकर ऐसे स्थान पर शिफ्ट कर दिया गया, जहां ग्राहक न के बराबर आते हैं—जिससे उसका व्यवसाय प्रभावित हो रहा है।
मीणा बंधु की ‘जुगलबंदी’ और एसीएम का संरक्षण?
इस पूरे मामले में सीसीई बलराम मीणा की सक्रिय भूमिका भी सामने आ रही है। चौंकाने वाली बात यह है कि स्थानांतरण के बावजूद भी उन्हें इन गतिविधियों के आसपास सक्रिय देखा जा रहा है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि इस पूरे खेल को सहायक वाणिज्यिक प्रबंधक वर्मा का संरक्षण प्राप्त है, जिससे विभागीय कार्रवाई नहीं हो पा रही।
सवाल जो जवाब मांगते हैं_क्या जॉइंट नोट की प्रक्रिया को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? किन आधारों पर खानपान इकाइयों का स्थान बदला जा रहा है? क्या वाणिज्यिक विभाग में ‘सेटिंग सिस्टम’ हावी हो चुका है? और सबसे बड़ा सवाल है कि रेल प्रशासन इस पर चुप क्यों है?
जांच के साथ जवाबदेही तय हो
ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण स्टेशन पर इस तरह की अनियमितताएं न सिर्फ व्यवस्था को प्रभावित कर रही हैं बल्कि रेलवे की साख पर भी सवाल खड़े कर रही हैं।
जरूरत है कि उच्च स्तरीय जांच कर दोषियों पर सख्त कार्रवाई की जाए ताकि पारदर्शिता और निष्पक्षता सुनिश्चित हो सके और रेलवे जैसा अहम विभाग तथाकथित अधिकारियों के निजि हित साधना की बजाय जनता की सेवा का माध्यम बन सके।
