ग्वालियर क्षेत्रीय कार्यालय में वर्षों से जमे चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों पर गंभीर आरोप; 400 से अधिक ईंट भट्ठों से 15 से 20 हजार रुपये प्रति भट्ठा वसूली की चर्चा, तबादले के बाद भी नहीं टूटा कथित वसूली तंत्र
ग्वालियर 4 नवंबर 2026। मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ग्वालियर क्षेत्रीय कार्यालय में व्यवस्था किसके इशारे पर चल रही है, अधिकारियों के या उन चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के, जिनका मूल काम विभागीय सहयोग तक सीमित होना चाहिए? यदि सामने आ रहे आरोपों और सूत्रों से मिल रही जानकारियों में सच्चाई है तो ग्वालियर, भिंड, मुरैना, दतिया और श्योपुर में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के नाम पर चल रहा कथित वसूली तंत्र विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आरोपों के घेरे में कार्यालय में वर्षों से पदस्थ चपरासी नन्हे अहिरवार और सैंपलर दिलीप भटनागर बताए जा रहे हैं। चर्चा है कि इन दोनों ने विभागीय कार्रवाई, नोटिस और निरीक्षण के नाम पर पांच जिलों में संचालित ईंट भट्ठों सहित प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के दायरे में आने वाले प्रतिष्ठानों तक अपनी कथित पहुंच और दबदबा बना रखा है।
400 से अधिक चिमनी/भट्टे, प्रत्येक से 15-20 हजार की कथित वसूली!
सूत्रों के अनुसार ग्वालियर क्षेत्रीय कार्यालय के इन पांच जिलों में करीब 400 से अधिक ईंट भट्ठे संचालित हैं। आरोप है कि इनमें से प्रत्येक भट्ठे से 15 से 20 हजार रुपये तक की अवैध वसूली का कथित नेटवर्क सक्रिय है। यदि इन दावों की निष्पक्ष जांच की जाए तो इस पूरे तंत्र के आर्थिक आकार और इसमें शामिल लोगों की भूमिका का खुलासा हो सकता है। सवाल यह है कि आखिर विभाग के दो कर्मचारी पांच जिलों में इस तरह का कथित प्रभाव कैसे बनाए हुए हैं? क्या इनके पास निरीक्षण, नोटिस और कार्रवाई के नाम पर प्रतिष्ठानों तक पहुंचने का कोई आधिकारिक अधिकार है या फिर अधिकारियों के नाम और विभागीय कार्रवाई का भय दिखाकर अपनी दुकान चलाई जा रही है?
तबादला गुना, लेकिन कथित वसूली अभियान पर विराम नहीं!
युग क्रांति में पूर्व में प्रकाशित खबर के बाद सैंपलर दिलीप भटनागर का स्थानांतरण गुना किए जाने की जानकारी सामने आई थी। सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में स्थानांतरण का उद्देश्य संबंधित कर्मचारी की पुरानी कार्यप्रणाली और प्रभाव को समाप्त कर नई व्यवस्था स्थापित करना होता है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि भटनागर का कथित नेटवर्क स्थानांतरण के बाद भी सक्रिय है। आरोप है कि वह अवकाश लेकर अथवा अन्य विभागीय बहानों से ग्वालियर क्षेत्र में आता-जाता रहता है और कथित वसूली गतिविधियों में उसकी भूमिका बनी हुई है।
सूत्रों का यह भी दावा है कि ग्वालियर और गुना क्षेत्रीय कार्यालयों में उसके पारिवारिक सदस्यों की पदस्थापना होने के कारण विभाग के भीतर उसकी पकड़ मजबूत बनी हुई है। यदि यह जानकारी सही है तो इसकी भी विभागीय स्तर पर जांच होनी चाहिए कि पारिवारिक पदस्थापनाओं और संभावित हितों के टकराव का कहीं इस पूरे मामले से कोई संबंध तो नहीं है।
दीपावली और ईंट-भट्टों का सीजन बना कथित वसूली का अवसर!
आरोपों के मुताबिक, जब भी प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड किसी अभियान के तहत नोटिस जारी करता है, निरीक्षण करता है अथवा किसी प्रतिष्ठान के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होती है, तब इन कर्मचारियों की कथित सक्रियता अधिक बढ़ जाती है। वर्तमान में दीपावली के त्योहारी सीजन और ईंट भट्ठों के संचालन का समय नजदीक होने के कारण इस गतिविधि में तेजी आने की चर्चा है।
विशेष रूप से युग क्रांति में प्रकाशित खबरों के बाद ग्वालियर के दर्जनभर चिमनी-भट्टों पर कार्रवाई की प्रक्रिया चलने की जानकारी के बीच कथित वसूली की शिकायतें और गंभीर हो जाती हैं। आरोप है कि संबंधित प्रतिष्ठानों तक अधिकारियों का हवाला देकर दबाव बनाया जाता है, जबकि वास्तविक विभागीय कार्रवाई और कर्मचारियों की कथित गतिविधियों के बीच अंतर को समझना आम प्रतिष्ठान संचालकों के लिए मुश्किल हो जाता है।
यही वह बिंदु है जहां विभागीय अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में आनी चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि कुछ कर्मचारी अधिकारियों के नाम का इस्तेमाल कर अपनी समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं और वास्तविक स्थिति से अधिकारियों को अनजान रख रहे हैं? अथवा इस पूरे तंत्र को कहीं न कहीं विभागीय संरक्षण प्राप्त है? इन सवालों का जवाब निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
आलीशान मकान और संपत्ति की जांच भी जरूरी
मामला केवल कथित वसूली तक सीमित नहीं है। सूत्रों का दावा है कि दोनों चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों की शहर की पॉश कॉलोनियों में आलीशान आवासीय संपत्तियां हैं। ऐसे में उनकी ज्ञात आय, सेवा अवधि, संपत्ति के स्रोत और घोषित-अघोषित परिसंपत्तियों की जांच भी आवश्यक हो जाती है। हालांकि संपत्तियों के संबंध में लगाए जा रहे दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन यदि शिकायतें सामने आती हैं तो आर्थिक अपराध और आय से अधिक संपत्ति के पहलू की जांच से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
विभाग की साख दांव पर, अब जिम्मेदार अधिकारी जवाब दें
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि विभाग के कुछ अधिकारी और कर्मचारी भी इन दोनों की कथित कार्यशैली एवं व्यवहार से परेशान बताए जा रहे हैं। यदि विभाग के भीतर ही इस तरह की स्थिति है तो यह केवल दो कर्मचारियों के आचरण का मामला नहीं, बल्कि क्षेत्रीय कार्यालय की प्रशासनिक नियंत्रण व्यवस्था पर भी सवाल है।
यह आवश्यक नहीं कि किसी गंभीर शिकायत पर कार्रवाई करने से पहले विभाग किसी लिखित शिकायत का इंतजार ही करता रहे। क्षेत्रीय अधिकारी और वरिष्ठ अधिकारियों को अपने स्तर पर संज्ञान लेकर दोनों कर्मचारियों की कार्यप्रणाली, पांचों जिलों में उनकी गतिविधियों, प्रतिष्ठानों से संपर्क, निरीक्षण एवं नोटिस संबंधी भूमिका और संपत्ति के स्रोतों की निष्पक्ष जांच करानी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए है या उसके नाम पर कथित वसूली का समानांतर साम्राज्य चलाने वालों के नियंत्रण में है? यदि आरोप निराधार हैं तो जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी और यदि इनमें दम है तो केवल तबादले जैसी औपचारिक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। नवागत क्षेत्रीय अधिकारी संजय जैन को जिम्मेदारों की जवाबदेही तय कर कठोर विभागीय एवं कानूनी कार्रवाई करना जरूरी होगा।
