शिक्षक बने क्लर्क, छात्रों का भविष्य दांव पर!
भोपाल 22 मार्च 2026। मध्यप्रदेश का शिक्षा तंत्र इन दिनों गंभीर सवालों के घेरे में है, जहां शिक्षक अब पढ़ाने से ज्यादा “आदेशों के पालन” में उलझकर रह गए हैं। लोक शिक्षण संचालनालय, राज्य शिक्षा केन्द्र, माध्यमिक शिक्षा मंडल, राज्य ओपन बोर्ड के साथ-साथ कलेक्टर, सीईओ, एसडीएम, तहसीलदार और स्थानीय निकायों के सीएमओ तक—हर स्तर से निर्देशों की बौछार हो रही है।
स्थिति यह है कि इन विभागों के बीच कोई समन्वय नहीं है, और एक ही समय में अलग-अलग अधिकारियों द्वारा जारी आदेशों की पालना करना शिक्षकों के लिए असंभव सा हो गया है। नतीजा—शिक्षक कक्षा छोड़कर फाइलों और प्रशासनिक कामों में उलझे हैं, जबकि छात्रों की पढ़ाई सीधे प्रभावित हो रही है।
“एक शिक्षक, कई मालिक”_ शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा संकट
शिक्षकों पर “बॉसिंग” का यह दबाव अब असहनीय स्तर पर पहुंच चुका है। हर विभाग अपनी मनमर्जी थोप रहा है, जिससे शिक्षक मूल कार्य—शिक्षण—से पूरी तरह भटक गए हैं। मांग उठ रही है कि अन्य विभागों के आदेशों को लागू करने से पहले विभाग प्रमुख स्तर पर एक ऑनलाइन अनुमोदन व्यवस्था बनाई जाए, ताकि शिक्षकों को अनावश्यक अटैचमेंट और गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त किया जा सके।
बोर्ड परीक्षा परिणामों में ‘जल्दबाजी का खेल’ — बच्चों के भविष्य से खिलवाड़?
दसवीं और बारहवीं के परीक्षा परिणामों को लेकर भी बड़ा विवाद सामने आया है। मूल्यांकनकर्ताओं और अधिकारियों पर तेज़ी से परिणाम तैयार करने का भारी दबाव बनाया जा रहा है। कम समय में कोर्स पूरा कराया गया, जल्दबाजी में परीक्षाएं कराई गईं, और अब उससे भी कम समय में मूल्यांकन—यह पूरी प्रक्रिया शिक्षा की गुणवत्ता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है।
शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की जल्दबाजी न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि यह छात्रों के भविष्य के साथ सीधा धोखा है।
क्या ‘बोर्ड’ बन गया है व्यापार का केंद्र?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है—क्या शिक्षा विभाग का उद्देश्य अब गुणवत्ता शिक्षा देना नहीं, बल्कि “बोर्ड का व्यापार” बनकर रह गया है? संचालनालय के अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में है, जिन पर इस पूरी प्रक्रिया को संरक्षण देने के आरोप लग रहे हैं।
यह आशंका भी गहराती जा रही है कि शिक्षा व्यवस्था को धीरे-धीरे निजीकरण की ओर धकेला जा रहा है, जिससे सरकारी स्कूलों की स्थिति और कमजोर हो सकती है।
आगे टकराव तय_ सरकार के हस्तक्षेप की मांग तेज
मौजूदा हालात बताते हैं कि छात्र, शिक्षक, मंडल और शिक्षा विभाग के बीच टकराव की स्थिति तेजी से बन रही है। यदि समय रहते सुधार नहीं किए गए, तो यह संकट बड़े आंदोलन का रूप ले सकता है।
अब यह जरूरी हो गया है कि सरकार छात्र, शिक्षक और राष्ट्रहित को केंद्र में रखकर तत्काल हस्तक्षेप करे और शिक्षा व्यवस्था को “आदेशों के अराजक राज” से बाहर निकाले।
