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रुपया गिर नहीं रहा… गिराया जा रहा है -बृजराज सिंह

भारतीय रुपया लगातार गिर रहा है और यह अब कोई नई खबर नहीं रह गई। हर कुछ महीनों में डॉलर के मुकाबले एक नया स्तर छूता रुपया, फिर उसी पर सामान्य होती चर्चा—और उसके बाद एक खामोशी। यह खामोशी ही सबसे खतरनाक है। क्योंकि यह सिर्फ एक मुद्रा की गिरावट नहीं, बल्कि हमारी आर्थिक सोच, नीतिगत प्राथमिकताओं और सामूहिक उदासीनता का प्रतिबिंब है।

बार-बार एक ही तर्क सामने आता है कि डॉलर मजबूत हो रहा है, इसलिए रुपया कमजोर हो रहा है। यह तर्क आधा सच है और आधा बहाना। सच इसलिए कि वैश्विक परिस्थितियों का असर हर अर्थव्यवस्था पर पड़ता है, लेकिन बहाना इसलिए कि मजबूत अर्थव्यवस्थाएं ऐसे दबावों के बावजूद टिकती हैं, जबकि कमजोर व्यवस्थाएं इन्हीं कारणों के पीछे अपनी कमियों को छिपा लेती हैं। सवाल यह है कि भारत किस श्रेणी में खुद को रखना चाहता है।

आजादी के समय जो रुपया एक डॉलर के मुकाबले रुपया 4 पर खड़ा था, वह आज 80 के पार जा चुका है। यह गिरावट अचानक नहीं आई। यह दशकों की नीतियों, प्राथमिकताओं और चूकों का परिणाम है। हमने सेवा क्षेत्र में तेजी दिखाई, लेकिन उत्पादन के मोर्चे पर वह मजबूती कभी नहीं बना पाए, जो एक स्थिर और मजबूत मुद्रा के लिए जरूरी होती है। “आत्मनिर्भरता” के नारे गूंजते रहे, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि हम तेल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक्स तक, हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में आयात पर निर्भर बने रहे।

आंकड़े जो असहज सच बताते हैं

यही वह बिंदु है जहां आंकड़े एक असहज सच्चाई को सामने रखते हैं। वर्ष 2025–26 के आंकड़े बताते हैं कि भारत का कुल निर्यात लगभग 790 अरब डॉलर के आसपास पहुंच चुका है, जो निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है। लेकिन इसी के साथ यह भी उतना ही बड़ा सच है कि आयात अब भी इससे अधिक है। कई महीनों में आयात निर्यात को लगातार पीछे छोड़ रहा है और फरवरी 2026 जैसे महीनों में भी व्यापार घाटा ($3.96 Billion – ₹34,000 करोड़ लगभग) साफ दिखाई देता है। यानी हम जितना कमा रहे हैं, उससे ज्यादा खर्च कर रहे हैं। यह असंतुलन सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि रुपये की गिरती कीमत की सबसे बड़ी जड़ है।
रुपये की गिरावट का सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ता है, लेकिन इस पर चर्चा हमेशा तकनीकी भाषा में सीमित कर दी जाती है। रुपया गिरता है तो पेट्रोल महंगा होता है, परिवहन महंगा होता है और अंततः हर जरूरी चीज की कीमत बढ़ती है। आम आदमी की आय उसी अनुपात में नहीं बढ़ती, इसलिए यह सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन स्तर पर सीधा आघात है।

नीतिगत स्तर पर भी ईमानदार समीक्षा की जरूरत है। क्या हमने वास्तव में निर्यात को प्राथमिकता दी? क्या हमने घरेलू उद्योगों को उस स्तर तक पहुंचाया, जहां वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक सकें? या फिर हमारी आर्थिक नीतियां अल्पकालिक लाभ और राजनीतिक संदेशों तक सीमित रह गईं? यह सवाल असहज जरूर हैं, लेकिन इन्हें टाला नहीं जा सकता।

चुप्पी सबसे बड़ा संकट है..

सबसे बड़ी चिंता यह है कि इस पूरे मुद्दे पर न तो सत्ता गंभीर बहस करती दिखती है, न विपक्ष कोई ठोस वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है और न ही समाज इस पर लगातार सवाल उठाता है। धीरे-धीरे गिरते हुए रुपये को हमने एक सामान्य स्थिति मान लिया है। यही सामान्यीकरण सबसे खतरनाक है, क्योंकि यह हमें समस्या की गंभीरता का अहसास ही नहीं होने देता।
यह भी सच है कि जिम्मेदारी सिर्फ सरकार की नहीं है। उद्योग जगत में जोखिम लेने की प्रवृत्ति कमजोर हुई है, उपभोक्ता विदेशी उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं और नीति-निर्माण में दीर्घकालिक दृष्टि का अभाव बार-बार सामने आता है। इन सभी का सम्मिलित परिणाम रुपया है, जो हर साल थोड़ा और कमजोर होता जा रहा है।

रुपये की गिरावट को केवल विनिमय दर के रूप में देखना एक बड़ी भूल है। यह देश की उत्पादन क्षमता, निर्यात क्षमता, आर्थिक अनुशासन और नीतिगत ईमानदारी का आईना है। अगर इस आईने में तस्वीर बार-बार धुंधली दिख रही है, तो समस्या आईने में नहीं, उस चेहरे में है जिसे हम देखने से बच रहे हैं। “अगर भारत ‘खरीदने वाली अर्थव्यवस्था’ से ‘बेचने वाली अर्थव्यवस्था’ नहीं बना, तो 2047 का विकसित भारत—कमजोर रुपये (अनुमानित ₹140 – ₹170 प्रति डॉलर) के साथ ही खड़ा होगा। जो कि 1947 में ₹4 पर था”।

अब सवाल यह नहीं है कि रुपया और कितना गिरेगा। सवाल यह है कि क्या हम इसे गिरते हुए देखते रहेंगे, या फिर उस सोच, उन नीतियों और उस उदासीनता को चुनौती देंगे, जिसने इस गिरावट को सामान्य बना दिया है। क्योंकि इतिहास गवाह है—मुद्राएं अचानक नहीं गिरतीं, उन्हें धीरे-धीरे गिरने दिया जाता है।     * संपादक की कलम से..

सनातन नव वर्ष विक्रम संवत 2083 की हार्दिक शुभ कामनाएं !