प्रभार की आड़ में लूट का तंत्र: योग्य बाहर, सेटिंगधारी भीतर..
बृजराज सिंह, 14 जनवरी 2026। मध्यप्रदेश के प्रशासनिक ढांचे में प्रभार और अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था आज सुशासन नहीं, बल्कि कुप्रशासन और भ्रष्टाचार की नर्सरी बन चुकी है। आरोग्य, सुपात्र और योग्य अधिकारियों को उनके कौशल के अनुरूप जिम्मेदारी न मिल पाने से जहां प्रशासनिक दक्षता कमजोर होती है, वहीं एक ही व्यक्ति पर कई-कई पदों का बोझ डालकर निगरानी, गुणवत्ता और जवाबदेही—तीनों को तिलांजलि दे दी जाती है।
यह सर्वविदित है कि निरंतर और स्वतंत्र निरीक्षण ही गुणवत्ता की रीढ़ और प्रशासनिक तंत्र की मजबूती का आधार है। लेकिन जब एक अफसर के पास एक साथ कई प्रभार होंगे, तो न निरीक्षण संभव है और न ही निष्पक्ष निर्णय। परिणामस्वरूप कागजों पर विकास और ज़मीन पर अव्यवस्था जन्म लेती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के “सबका साथ, सबका विकास” और योग्यता के अनुसार पदभार जैसे संवैधानिक व नैतिक सिद्धांतों की यह खुली अवहेलना है। प्रदेश के लगभग हर विभाग में यह विसंगति अब व्यापक और विकराल रूप ले चुकी है।
प्रभार–अतिरिक्त प्रभार: भ्रष्टाचार की असली जड़
इस व्यवस्था में पदस्थापना कोई प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सौदेबाजी का खेल बन गई है। आरोग्य अथवा अपात्र व्यक्ति पद पाने के लिए सक्षम अधिकारी, प्रभावशाली नेता/मंत्री या उनके एजेंट–बिचौलियों से सांठगांठ करता है। खर्चा-पानी और पेशगी के आधार पर ‘गोटी सेट’ होती है।
पोस्टिंग मिलते ही इन्वेस्टमेंट रिकवरी मोड चालू—पद का दुरुपयोग, ठेकेदारी गठजोड़, फाइलों की खरीद-फरोख्त और अंततः भ्रष्टाचार का विस्तार।
एक व्यक्ति, कई प्रभार: दलालों की सहूलियत
आज के दौर में दलालों की भूमिका इसलिए बढ़ी है क्योंकि एक व्यक्ति पर कई प्रभार होने से सौदे आसान और सस्ते हो जाते हैं। अलग-अलग अफसरों से सेटिंग करने के बजाय एक मास्टर-की काफी होती है।
नतीजा—योग्य अफसर ‘लूप लाइन’ में, जबकि सेटिंगधारी अधिकारी एक साथ कई कुर्सियों पर बैठकर मलाई काटते हैं। कार्य-गुणवत्ता रसातल में और विभागीय साख तार-तार।
लोक निर्माण विभाग का ताज़ा उदाहरण
इसी कड़ी में मध्यप्रदेश लोक निर्माण विभाग से जुड़ी सुर्खियां बीते दिनों इलेक्ट्रॉनिक गलियारों में गूंज रही हैं। जिसमें विभाग के मंत्री से गहरी पैठ रखने वाले तथाकथित राहुल और सूरज की भूमिका पर सवाल खड़े हुए साथ ही कई पदों का अतिरिक्त प्रभार वाले ग्वालियर परिक्षेत्र के मुख्य अभियंता वी के झा एवं पीडब्ल्यूडी के अन्य अधीक्षण यंत्री एवं कार्यपालन यंत्री सुर्खियों में सुमार रहे। जिसे युग क्रांति मीडिया ने प्रमुखता से उजागर किया। यह उदाहरण बताता है कि कैसे अतिरिक्त प्रभार की संस्कृति व्यवस्था को खोखला कर रही है।
क्या यही है सुशासन? क्यों योग्य अधिकारियों को उनके अधिकार से वंचित किया जा रहा है?
क्यों एक ही व्यक्ति को कई पदों का प्रभार देकर निगरानी को कमजोर किया जा रहा है?
क्यों अतिरिक्त प्रभार अस्थायी व्यवस्था न रहकर स्थायी धंधा बन गया है?
जब तक प्रभार–अतिरिक्त प्रभार की इस विसंगति पर प्रहार नहीं होगा, तब तक भ्रष्टाचार पर लगाम सिर्फ बयानबाज़ी ही रहेगी। यद्यपि यह जहर हमारी राजनीतिक व्यवस्था एवं प्रजातांत्रिक प्रणाली में तथाकथित शिष्टाचार का रूप लेता हुआ जड़ों तक समता जा रहा है ।
