इतिहास, संस्कृति और राष्ट्रबोध के आधार पर विमर्श
नई दिल्ली 19 जनवरी 2026। भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग केवल राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि यह देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सभ्यतागत पहचान से जुड़ा विषय है। विशेषज्ञों, इतिहासकारों, धर्माचार्यों और विचारकों का मानना है कि भारत की आत्मा हिंदू दर्शन में निहित है, जिसे संवैधानिक ढांचे के भीतर सम्मान और संरक्षण मिलना आवश्यक है।
ऐतिहासिक आधार: भारत की सभ्यतागत पहचान
इतिहासकारों के अनुसार ‘हिंदू’ शब्द किसी संप्रदाय विशेष तक सीमित नहीं, बल्कि यह सिंधु सभ्यता से विकसित उस जीवन-दृष्टि का प्रतीक है, जिसने भारत को हजारों वर्षों तक जोड़े रखा। वैदिक काल से लेकर मौर्य, गुप्त और मराठा काल तक शासन व्यवस्था, समाज और संस्कृति का मूल आधार हिंदू दर्शन रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा राष्ट्र है, जिसकी पहचान किसी आक्रांता द्वारा नहीं, बल्कि अपनी स्वदेशी सभ्यता से निर्मित हुई।
पौराणिक और धार्मिक संदर्भ
धर्माचार्यों के अनुसार वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत और गीता केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन, शासन और समाज के मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।
भगवद्गीता का ‘लोकसंग्रह’ का सिद्धांत हो या रामराज्य की अवधारणा—ये सभी सुशासन, न्याय और समरसता के प्रतीक माने जाते हैं।
धर्म प्रचारकों का कहना है कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी अन्य धर्म का विरोध नहीं, बल्कि सभी पंथों को समान सम्मान देने वाली सनातन परंपरा को संवैधानिक मान्यता देना है।
संवैधानिक और वैचारिक दृष्टि
संविधान विशेषज्ञों के अनुसार भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है, किंतु यह धर्म-विरोधी नहीं। संविधान ने सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता दी है, जबकि बहुसंख्यक समाज की संस्कृति को नकारने की कोई बाध्यता नहीं है।
विचारकों का मत है कि यदि भारत स्वयं को हिंदू राष्ट्र के रूप में परिभाषित करता है, तो इसका आशय होगा—सभ्यता आधारित राष्ट्र, जहां सहिष्णुता, अहिंसा, करुणा और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे मूल्यों को राज्य की आत्मा माना जाए।
सामाजिक और राष्ट्रीय आवश्यकता
विशेषज्ञों का कहना है कि आज वैश्वीकरण और सांस्कृतिक विघटन के दौर में भारत को अपनी जड़ों से जोड़ना आवश्यक है।
हिंदू राष्ट्र की अवधारणा सांस्कृतिक एकता, राष्ट्रीय गौरव और सामाजिक समरसता को मजबूत कर सकती है। यह न तो किसी अल्पसंख्यक के अधिकारों का हनन करती है और न ही विविधता को समाप्त करती है, बल्कि विविधता को एक साझा सभ्यता के सूत्र में पिरोती है।
विशेषज्ञों, इतिहासकारों और धर्माचार्यों की साझा राय है कि भारत का हिंदू राष्ट्र होना किसी धार्मिक वर्चस्व की नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान और सभ्यतागत निरंतरता की बात है। यह अवधारणा भारत को उसकी मूल आत्मा से जोड़ते हुए विश्व को शांति, सहिष्णुता और मानवता का मार्ग दिखाने का संकल्प है।
यह विमर्श भारत की सभ्यता, इतिहास और सांस्कृतिक चेतना के परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत किया गया है।
