नई दिल्ली/भोपाल 20 जनवरी 2026। देश में बार-बार होने वाले चुनावों से उत्पन्न राजनीतिक अस्थिरता, प्रशासनिक बाधाओं और बढ़ते चुनावी खर्च के बीच “एक राष्ट्र–एक चुनाव” की अवधारणा एक बार फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है। एक राष्ट्र -एक चुनाव भारत सरकार द्वारा विचाराधीन एक प्रस्ताव है, जिसका उद्देश्य चुनाव लागत को कम करने के लिए देश के सभी चुनावों को एक ही दिन या एक निश्चित समय सीमा के भीतर एक साथ कराना है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्र-हित की यह वैश्विक सोच दिल्ली से भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, उज्जैन सहित अन्य शहरों से होकर गांवों तक पहुंच रही है और सिलसिला सिर्फ मध्य प्रदेश में ही नहीं बल्कि समूचे राष्ट्र जोरों पर है।
इस क्रम में लगातार जगह-जगह विमर्श, संगोष्ठी, सेमिनार वर्कशॉप आदि सामाजिक चेतना के विस्तार का दौर चल रहा है। यह व्यवस्था न केवल चुनावी प्रक्रिया को सुव्यवस्थित करने की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है, बल्कि इसे लोकतंत्र की मजबूती, नीति निरंतरता और सुशासन से भी जोड़ा जा रहा है।
क्या है एक राष्ट्र–एक चुनाव की अवधारणा
एक राष्ट्र–एक चुनाव का तात्पर्य लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ या एक निश्चित समय-सीमा में कराए जाने से है। इससे देश में हर कुछ महीनों में लागू होने वाली आदर्श आचार संहिता से मुक्ति मिलेगी और सरकारें पूरे कार्यकाल में विकास कार्यों पर निर्बाध ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।
ऐतिहासिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि_भारत में 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ होते रहे। बाद में राजनीतिक अस्थिरता, विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने और गठबंधन राजनीति के चलते यह क्रम टूट गया।
संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172 और 356 में आवश्यक संशोधनों तथा वैधानिक सुधारों के माध्यम से इस व्यवस्था को पुनः लागू किया जा सकता है। विधि आयोग, नीति आयोग और विभिन्न संसदीय समितियाँ भी इस दिशा में सकारात्मक राय दे चुकी हैं।
आर्थिक और प्रशासनिक लाभ
विशेषज्ञों के अनुसार बार-बार होने वाले चुनावों पर हजारों करोड़ रुपये खर्च होते हैं। एक राष्ट्र–एक चुनाव लागू होने से—चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी।
सुरक्षा बलों और प्रशासनिक मशीनरी पर अनावश्यक दबाव घटेगा
सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में निरंतरता बनी रहेगी
नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, समवर्ती चुनावों से विकास कार्यों की गति 15–20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है।
लोकतंत्र को कैसे मिलेगी मजबूती
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एक राष्ट्र–एक चुनाव से—मतदाता जागरूकता और भागीदारी बढ़ेगी,
क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों पर समग्र बहस संभव होगी,
चुनावी लोकलुभावन घोषणाओं पर अंकुश लगेगा,
शासन और विपक्ष दोनों की भूमिका अधिक जवाबदेह बनेगी।
यह व्यवस्था लोकतंत्र को केवल चुनाव तक सीमित न रखकर, नीति, विकास और जनहित के व्यापक मंच पर ले आएगी।
चुनौतियाँ और समाधान
हालाँकि इस अवधारणा को लागू करने में संघीय ढांचे, क्षेत्रीय दलों की आशंकाओं और संवैधानिक संशोधनों जैसी चुनौतियाँ हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापक राजनीतिक सहमति, चरणबद्ध क्रियान्वयन और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के माध्यम से इनका समाधान संभव है।
एक राष्ट्र–एक चुनाव केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को अधिक सशक्त, पारदर्शी और विकासोन्मुख बनाने की दूरदर्शी पहल है। यदि इसे संवैधानिक मर्यादाओं और संघीय भावना के साथ लागू किया जाए, तो यह भारतीय लोकतंत्र को नई मजबूती प्रदान कर सकता है।
