” ई-फाइलिंग” बनी नया हथियार, पारदर्शिता के नाम पर पुराना खेल जारी
भोपाल 30 जनवरी 2026। मध्य प्रदेश की मोहन यादव सरकार जहां प्रशासनिक कार्यप्रणाली में पारदर्शिता, गति और जवाबदेही लाने के उद्देश्य से 1 जुलाई 2025 से पूरे प्रदेश में ई-फाइलिंग व्यवस्था लागू कर चुकी है तो वहीं वाणिज्य कर विभाग सहित कई विभागों के कुछ अधिकारियों ने इस व्यवस्था को अपने निजी हितों के अनुसार तोड़-मरोड़ कर लागू करने का नया तरीका इजाद कर लिया है।
सरकार की मंशा थी कि टेबल दर टेबल, सैंक्शन दर सैंक्शन और विभाग दर विभाग महीनों-सालों तक भटकने वाली फाइलों की परंपरा समाप्त हो, लेकिन हकीकत यह है कि ई-फाइलिंग भी अब “मिल्क थ्रू सिस्टम” बनकर रह गई है, जहां लाभ वाले काम तेजी से निपटाए जा रहे हैं और बिना लाभ वाले प्रकरण अनावश्यक आपत्तियों व क्वेरियों में उलझाकर लटकाए जा रहे हैं।
“ई-फाइलिंग” का सच: मेल खोली ही नहीं, तो काम कैसे होगा?
ई-फाइलिंग व्यवस्था के तहत प्रक्रिया स्पष्ट है_संबंधित कर्मचारी अपनी अनुशंसा सहित फाइल ई-मेल के माध्यम से अपनी आईडी से वरिष्ठ अधिकारी को भेजता है और यही क्रम अंतिम स्तर तक चलता है।
लेकिन वाणिज्य कर विभाग में स्थिति यह है कि कई अधिकारी अपनी मेल आईडी खोलकर देखना तक जरूरी नहीं समझते, जिससे फाइलें सप्ताहों और महीनों तक जस की तस पड़ी रहती हैं।
पेंडेंसी जीरो दिखाने का खेल
सूत्रों के अनुसार विभाग में कई वरिष्ठ अधिकारी अपनी ई-मेल आईडी पर पेंडेंसी शून्य दिखाने के लिए_कार्य संबंधी ई-फाइलें जानबूझकर अधीनस्थ बाबुओं की आईडी पर ट्रांसफर कर देते हैं।
परिणाम यह होता है कि अधिकारी की आईडी “क्लीन” (जीरो पेंडेंसी) नजर आती है, जबकि फाइल बाबू की तथाकथित ई-टोकरी में कचरे की तरह पड़ी रहती है, जब तक कि उसमें “लाभ” का तत्व न जुड़ जाए।
मुख्यमंत्री की मंशा पर खुला प्रहार
मुख्यमंत्री मोहन यादव द्वारा लागू किए गए इस पारदर्शी सिस्टम को रौंदने के प्रमाण_अधिकारियों की ई-मेल आईडी में साफ देखे जा सकते हैं, जहां एक-एक, दो-दो महीने से फाइलें बिना किसी कार्यवाही के पेंडिंग पड़ी हैं।
यह स्थिति केवल विभागीय कार्यालयों तक सीमित नहीं, बल्कि सचिवालय स्तर तक साफ तौर पर जा सकती है।
समय-सीमा तय नहीं, तो ‘ई-फाइलिंग’ का औचित्य क्या?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार ने ई-फाइलिंग लागू की, तो फाइल निपटारे की समय-सीमा तय क्यों नहीं की गई? यदि कोई समयबद्ध जिम्मेदारी नहीं है, तो फिर ई-फाइलिंग और उसके उद्देश्य की प्रासंगिकता ही क्या रह जाती है?
पारदर्शी व्यवस्था केवल आदेशों से नहीं, बल्कि इच्छाशक्ति और सख्त निगरानी से लागू होती है। लिहाजा सरकार को चाहिए कि ई-फाइल निपटारे की स्पष्ट समय-सीमा तय करे,
मेल लॉग एवं पेंडेंसी की नियमित मॉनिटरिंग हो और जानबूझकर फाइलें लटकाने वाले अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
अन्यथा, ई-फाइलिंग भी वही पुरानी फाइल संस्कृति बनकर रह जाएगी, बस फर्क इतना होगा कि पहले फाइल धूल खाती थी, अब वह ई-मेल इनबॉक्स में सड़ रही है।
