दिन शुक्रवार, 30 जनवरी 1948_प्रार्थना सभा के दौरान चली गोलियों ने थमा दी अहिंसा की धड़कन
नई दिल्ली भोपाल 30 जनवरी 2026। आज से ठीक 78 साल पहले 1948 में, 30 जनवरी के दिन, शुक्रवार, भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की नृशंस हत्या कर दी गई थी। शाम 5 बजकर 17 मिनट, नई दिल्ली स्थित बिरला भवन में प्रार्थना सभा के लिए जाते समय नाथूराम विनायक गोडसे ने गांधीजी पर गोलियां चलाईं, जिससे मौके पर ही उनका निधन हो गया।
यह घटना स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे दुखद और निर्णायक घटनाओं में से एक मानी जाती है। देश अभी विभाजन की पीड़ा, सांप्रदायिक हिंसा और सामाजिक अस्थिरता से जूझ रहा था, और ऐसे समय में गांधीजी शांति, अहिंसा और आपसी सद्भाव के सबसे बड़े प्रतीक बने हुए थे।
गोडसे की सोच और हत्या के पीछे बताए गए कारण
नाथूराम गोडसे ने अपने अदालती बयान में कहा था कि वह महात्मा गांधी की कुछ नीतियों और फैसलों से गहरे असहमत था। गोडसे का दावा था कि गांधीजी की विचारधारा और उनके कुछ कदमों से देश के हितों को नुकसान पहुंचा, विशेष रूप से विभाजन और उससे जुड़े घटनाक्रम को लेकर।
हालांकि, भारत की न्यायिक व्यवस्था ने स्पष्ट रूप से माना कि वैचारिक असहमति के नाम पर हत्या किसी भी रूप में न्यायोचित नहीं हो सकती। इसी आधार पर गोडसे को दोषी ठहराया गया और उसे मृत्युदंड दिया गया।
समाज में मौजूद भिन्न दृष्टिकोण
यह एक ऐतिहासिक और सामाजिक सच्चाई है कि देश में एक सीमित वर्ग ऐसा भी है जो गोडसे के कृत्य को अलग नजरिये से देखता है और उसकी सोच को वैचारिक असहमति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करता है।
लेकिन इसके समानांतर, भारत का बड़ा वर्ग, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्य महात्मा गांधी को सत्य, अहिंसा और मानवता का सर्वोच्च प्रतीक मानते हैं। राष्ट्र के रूप में भारत ने यह स्वीकार किया है कि मतभेद हो सकते हैं, पर हिंसा कभी समाधान नहीं हो सकती।
गांधी की हत्या, एक चेतावनी
महात्मा गांधी की हत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं थी, बल्कि यह उस चेतावनी का प्रतीक बन गई कि जब विचारों की लड़ाई हथियारों से लड़ी जाती है, तो समाज अपनी नैतिक दिशा खो देता है।
आज, जब देश और दुनिया फिर से वैचारिक ध्रुवीकरण और असहिष्णुता के दौर से गुजर रहे हैं, 30 जनवरी 1948 हमें यह याद दिलाता है कि असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, लेकिन अहिंसा उसकी मर्यादा।
