युग क्रांति की पड़ताल में नुकीले किनारे, टूटते प्रीकास्ट स्लैब और निर्माण सामग्री की गुणवत्ता पर उठे गंभीर सवाल; स्वतंत्र तकनीकी जांच की मांग..
ग्वालियर 18 जुलाई 2026। शहर में गोले का मंदिर चौराहे से एयरपोर्ट रोड तिराहे तक करीब 4 करोड़ रुपये की लागत से बनाए जा रहे प्रीकास्ट डिवाइडर की गुणवत्ता निर्माण के दौरान ही सवालों के घेरे में आ गई है। युग क्रांति की पड़ताल में ऐसे कई तथ्य सामने आए हैं जो इस पूरी परियोजना की इंजीनियरिंग, गुणवत्ता और सरकारी धन के उपयोग पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।
युग क्रांति टीम ने इस निर्माण कार्य का मौके पर निरीक्षण कर वीडियो सहित ऐसे दृश्य दर्ज किए हैं जिनमें कई स्थानों पर नुकीले और खतरनाक किनारे, निर्माण सामग्री का बिखरना तथा बिना किसी बाहरी दबाव के स्लैबों में दरारें और टूट-फूट दिखाई दे रही हैं। इन तथ्यों को नगर निगम आयुक्त के संज्ञान में भी लाया गया, लेकिन अब तक न तो निर्माण सामग्री की स्वतंत्र जांच कराई गई और न ही खतरनाक डिजाइन संबंधी कमियों को दूर करने की पहल हुई।
पहले मजबूत डिवाइडर तोड़ा, अब करोड़ों खर्च कर नया विवाद
जानकारी के अनुसार यह निर्माण मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) की सड़क पर किया जा रहा है।परियोजना के लिए धनराशि स्मार्ट सिटी ग्वालियर द्वारा उपलब्ध कराई गई है, जबकि निर्माण का जिम्मा नगर निगम के माध्यम से ठेकेदार को दिया गया है।
सूत्रों के अनुसार प्रारंभिक स्वीकृति 2.50 करोड़ रुपये की थी, जिसे बाद में बढ़ाकर करीब 3.55 करोड़ रुपये कर दिया गया और वर्तमान लागत लगभग 4 करोड़ रुपये बताई जा रही है। नगर निगम ने दावा किया था कि नया डिवाइडर अत्याधुनिक, आकर्षक और अत्यंत गुणवत्तापूर्ण बनाया जाएगा, जबकि पहले से मौजूद डिवाइडर मजबूत और उपयोगी स्थिति में था। ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या बिना पर्याप्त तकनीकी आवश्यकता के पुराने निर्माण को तोड़कर सरकारी धन की अनावश्यक बर्बादी की गई?
निर्माता तक पहुंची पड़ताल, गुणवत्ता पर और गहरे सवाल
युग क्रांति की टीम जब प्रीकास्ट स्लैब तैयार करने वाली इकाई तक पहुंची तो वहां भी कई गंभीर सवाल सामने आए। निरीक्षण के दौरान देखा गया कि बड़े आकार के स्लैबों में केवल 6 मिमी सरिया/तार का उपयोग किया जा रहा है। साथ ही प्रयुक्त रेत, गिट्टी और सीमेंट की गुणवत्ता भी प्रथम दृष्टया मानकों के अनुरूप नहीं लगी। यदि यह तथ्य तकनीकी जांच में सही पाए जाते हैं तो पूरी परियोजना की गुणवत्ता पर गंभीर प्रश्न खड़े होना स्वाभाविक है। बताया जाता है कि परियोजना के सहायक यंत्री की गठजोड़ से यह सब चल रहा है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है।
‘आज नहीं चेते तो दो-चार साल में बिखर सकती है पूरी परियोजना’
निर्माण विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की समय रहते निष्पक्ष जांच नहीं कराई गई तो यह परियोजना आने वाले 2 से 4 वर्षों में गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो सकती है। यदि ऐसा होता है तो करोड़ों रुपये की सार्वजनिक राशि व्यर्थ चली जाएगी और इसकी जिम्मेदारी निर्माण की निगरानी करने वाले अधिकारियों पर तय होना चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यह होगा_नगर निगम आयुक्त के संज्ञान में पूरा मामला आने के बावजूद यदि न तो सामग्री की जांच कराई जाती है और न ही निर्माण की गुणवत्ता का स्वतंत्र परीक्षण कराया जाता है, तो यह केवल एक निर्माण परियोजना का मामला नहीं रहेगा, बल्कि करदाताओं के करोड़ों रुपये की जवाबदेही का प्रश्न बन जाएगा।
आमजन की ओर से युग क्रांति की मांग है कि इस परियोजना की उच्चस्तरीय तकनीकी जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए, निर्माण सामग्री के नमूनों की लैब जांच हो, डिजाइन की सुरक्षा का परीक्षण कराया जाए और जांच पूरी होने तक संदिग्ध गुणवत्ता वाले कार्यों पर रोक लगाई जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और ठेकेदार के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

