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जन-विश्वास शिविर में 126 फरियादें: सवाल यह कि समस्याएं शिविर तक पहुंचीं क्यों?

बिलौआ में अफसरों ने मौके पर निपटाईं शिकायतें, लेकिन निरीक्षण में स्कूल, आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य केंद्र की व्यवस्थाओं ने खोल दी सरकारी तंत्र की पोल

ग्वालियर 29 अगस्त 2026। सरकार आमजन का विश्वास जीतने के लिए “मुख्यमंत्री जन-विश्वास अभियान” चला रही है, लेकिन बिलौआ में शनिवार को लगे जिला स्तरीय शिविर ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया—अगर सरकारी व्यवस्थाएं अपने स्तर पर ठीक से काम कर रही हैं तो 126 समस्याओं के साथ लोगों को जिला स्तरीय शिविर तक क्यों पहुंचना पड़ा?

बिलौआ में आयोजित शिविर में संभागीय आयुक्त मनोज खत्री, कलेक्टर रुचिका चौहान, एसएसपी धर्मवीर सिंह सहित जिला एवं खंड स्तरीय अधिकारियों की मौजूदगी में अधिकांश शिकायतों का मौके पर निराकरण किया गया। जमीन के लंबित मामलों में अमल कराकर खसरे की प्रतियां दी गईं, आयुष्मान कार्ड बनाए गए और लंबे समय से दिव्यांगता प्रमाण-पत्र का इंतजार कर रहे लोगों को घर के नजदीक ही प्रमाण-पत्र उपलब्ध कराया गया।

लेकिन शिविर की उपलब्धियों से ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल उन व्यवस्थाओं का है, जिनके कारण लोगों को अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए ऐसे शिविर का इंतजार करना पड़ा।

126 आवेदन और अधिकांश का मौके पर निराकरण—फिर रोजमर्रा की व्यवस्था कितनी जवाबदेह?

जन विश्वास शिविरशिविर में लगभग 126 समस्याएं और आवेदन प्राप्त हुए। इनमें अधिकांश का मौके पर निराकरण किया गया, जबकि शेष शिकायतें सीएम हेल्पलाइन पर दर्ज की गईं। प्रशासन के लिए यह तत्काल राहत और समाधान की तस्वीर है, लेकिन दूसरी तरफ यह आंकड़ा स्थानीय प्रशासन की नियमित कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़ा करता है।

हरचरण कुशवाह, द्रोपदी, छुटिया और ग्यासोबाई के जमीन संबंधी मामले लंबे समय से लंबित थे। शिविर में इनका निराकरण हुआ और राजस्व रिकॉर्ड में अमल के बाद खसरे की प्रतियां भी दी गईं। सूर्य प्रकाश और सूबेदार कुशवाह को दिव्यांगता प्रमाण-पत्र मिले। मिजाजीलाल, ज्योति और कमलेश के आयुष्मान कार्ड बनाए गए। सवाल यह है कि जिन कामों के लिए सरकार ने विभाग, अधिकारी और पोर्टल जैसी पूरी व्यवस्था बना रखी है, उनके लिए आम नागरिकों को विशेष शिविर तक क्यों आना पड़ा?

शिविर शुरू होने से पहले ही कलेक्टर को मिल गईं व्यवस्थाओं की खामियां

जन-विश्वास शिविर का सबसे अहम पहलू केवल शिकायतों का निराकरण नहीं रहा, बल्कि शिविर से पहले कलेक्टर रुचिका चौहान द्वारा किए गए सरकारी संस्थानों के निरीक्षण ने भी प्रशासनिक व्यवस्था की जमीनी तस्वीर सामने रख दी।

प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र में पानी की निकासी और रोशनी की व्यवस्था सुधारने के निर्देश दिए गए। सरकारी स्कूल परिसर में अतिक्रमण और अनाधिकृत रास्ते को बंद कराने के निर्देश तहसीलदार को दिए गए। सातवीं कक्षा की छात्राओं को संस्कृत की पुस्तकें नहीं मिलने पर कलेक्टर ने नाराजगी जताई और बीआरसी का तीन दिन का वेतन काटने के निर्देश दिए।

आंगनबाड़ी केन्द्र की व्यवस्थाएं भी ठीक नहीं मिलीं। इसके बाद सीडीपीओ और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता को नोटिस जारी करने के निर्देश दिए गए। छात्रावासों के नियमित निरीक्षण के निर्देश भी दिए गए।यानी शिविर में जनता की शिकायतें सामने आईं तो निरीक्षण में सरकारी संस्थाओं की कमियां भी सामने आ गईं।

अब असली परीक्षा यह होगी कि शिविर में दिए गए निर्देश और की गई कार्रवाई कागजों तक सीमित रहती है या अगले निरीक्षण तक इन व्यवस्थाओं में वास्तविक सुधार दिखाई देता है।

जन-विश्वास सिर्फ शिविर से नहीं, स्थायी समाधान से बनेगा

शिविर में स्थानीय उद्यमियों ने भी अपनी सफलता की कहानी साझा की। सोनू कुशवाह ने मुख्यमंत्री उद्यम क्रांति योजना से दो लाख रुपए का ऋण लेकर ऑटो पार्ट्स की दुकान शुरू की और अब दो लोगों को रोजगार दे रहे हैं। अनुराग पांडे ने 10 लाख रुपए के ऋण से आरओ प्लांट स्थापित कर आधा दर्जन लोगों को रोजगार दिया। मुद्रा योजना से गोपाल यादव ने दौना-पत्तल इकाई, भागीरथ चौरसिया ने एमपी ऑनलाइन कियोस्क और पवन आर्या ने फोटो स्टूडियो शुरू किया।

ये उदाहरण निश्चित रूप से सरकार की योजनाओं की उपयोगिता दिखाते हैं। लेकिन “जन-विश्वास” की असली कसौटी यह नहीं कि एक दिन में कितने प्रमाण-पत्र बांटे गए, बल्कि यह है कि आम आदमी को अगले दिन वही काम कराने के लिए फिर किसी शिविर या अधिकारी के दरवाजे पर न जाना पड़े।

बिलौआ का शिविर तत्काल समाधान की तस्वीर जरूर पेश करता है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी छोड़ जाता है—क्या जन-विश्वास शिविर सरकारी व्यवस्था की कमियों का स्थायी समाधान बनेगा या फिर हर बार समस्याओं के समाधान के लिए जनता को ऐसे शिविरों का इंतजार करना पड़ेगा?