UGC, आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट जैसे मुद्दों से सामान्य वर्ग में बढ़ती बेचैनी—क्या भाजपा इसे समय रहते पढ़ पाएगी?
नई दिल्ली/भोपाल। भारतीय राजनीति में चुनाव जीतने के लिए सामाजिक समीकरण साधना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इतिहास गवाह है कि जब कोई राजनीतिक दल अपने मूल समर्थक वर्ग की बेचैनी को नजरअंदाज करके नए सामाजिक समीकरण बनाने में जरूरत से ज्यादा ऊर्जा लगाता है, तो वही रणनीति कभी-कभी उसके लिए उलटी भी पड़ सकती है। आज भाजपा के सामने भी कमोबेश यही सवाल खड़ा हो रहा है।
पिछले कुछ समय से आरक्षण, UGC के नए नियमों और एससी-एसटी एक्ट जैसे मुद्दों को लेकर सामान्य वर्ग के एक हिस्से में असंतोष की आवाजें तेज हुई हैं। UGC के 2026 के जाति-भेदभाव संबंधी नियमों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक दिए जाने और केंद्र द्वारा उन पर पुनर्विचार की बात कहे जाने के बाद यह विवाद और राजनीतिक हुआ है।
इसे केवल किसी एक वर्ग की नाराजगी मानकर खारिज करना भाजपा के लिए राजनीतिक भूल साबित हो सकती है। सवाल यह नहीं है कि विरोध कितना बड़ा है, सवाल यह है कि जिस वर्ग ने लंबे समय तक भाजपा को अपना स्वाभाविक राजनीतिक विकल्प माना, उसके भीतर पैदा हो रही बेचैनी कितनी गहरी है।
मायावती से भाजपा को सीखना चाहिए_सोशल इंजीनियरिंग सफल भी होती है, उलटी भी
उत्तर प्रदेश का 2007 का विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति में सोशल इंजीनियरिंग का सबसे चर्चित उदाहरण है। बहुजन समाज पार्टी की राजनीति लंबे समय तक दलित केंद्रित मानी जाती रही, लेकिन मायावती ने 2007 में इस राजनीतिक आधार को व्यापक बनाते हुए ब्राह्मणों और दूसरे सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई। BSP ने 51 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया, जिनमें 20 चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। परिणाम सामने आया तो मायावती की पार्टी ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। लेकिन आगे चलकर यही सामाजिक गठजोड़ स्थायी राजनीतिक आधार में नहीं बदल सका बल्कि उल्टा पड़ गया और बसपा सत्ता से हमेशा के लिए फिलहाल बाहर हो गई।
यही भाजपा के लिए सबसे बड़ा सबक हो सकता है_याद्दापि सोशल इंजीनियरिंग चुनाव जिताने का औजार हो सकती है, लेकिन वह अपने मूल समर्थक वर्ग का विकल्प नहीं बन सकती। आज भाजपा यदि नए सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़ने के लिए लगातार नई राजनीतिक रणनीतियां बना रही है, तो उसे यह भी देखना होगा कि इस प्रक्रिया में उसका अपना परंपरागत समर्थक वर्ग कहीं खुद को उपेक्षित तो महसूस नहीं कर रहा।
भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल: नए वोटर मिलेंगे, लेकिन पुराने कितने बचेंगे?
भाजपा के सामने चुनौती केवल जातीय समीकरण की नहीं है बल्कि उससे भी बड़ा सवाल युवा मतदाता का है। आज का युवा आरक्षण, प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार, शिक्षा, भर्ती प्रक्रिया और अवसरों के सवाल पर पहले से कहीं ज्यादा मुखर है। UGC-NET को लेकर भी 2026 में छात्रों के विरोध और परीक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे हैं; तीन विषयों की पुनर्परीक्षा का फैसला भी लिया गया। ऐसे वातावरण में भाजपा को केवल यह मानकर नहीं चलना चाहिए कि उसका पारंपरिक वोटर अंततः उसके साथ ही रहेगा।
लोकतंत्र में कोई वोटर स्थायी नहीं होता
यही वह तथ्य है जहां भाजपा को गंभीर आत्ममंथन की आवश्यकता है। दूसरे सामाजिक वर्गों को अपने साथ जोड़ना राजनीति की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन अपने मूल समर्थक वर्ग की राजनीतिक और सामाजिक चिंताओं को नजरअंदाज करके कोई भी दल लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकता।
भाजपा को यदि इस बात पर भरोसा है कि उसका परंपरागत सामान्य वर्ग उसके साथ मजबूती से खड़ा है, तो उसे किसी प्रचार या राजनीतिक बयान के बजाय निष्पक्ष आंतरिक सर्वेक्षण कर लेना चाहिए। खासकर मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह पता लगाया जाना चाहिए कि अलग-अलग सामाजिक वर्गों में भाजपा का वास्तविक समर्थन कितना है और सरकार की नीतियों को लेकर किस वर्ग में कितनी संतुष्टि या नाराजगी है। जहां तक कि जिस वर्ग से सरकार के मुखिया है उस वर्ग का भाजपा को वास्तविक कितना समर्थन है!
चुनावी राजनीति में सबसे खतरनाक गलती विरोधी के वोट बढ़ने की नहीं, अपने वोट के खिसकने की होती है..
भाजपा आज देश की सबसे शक्तिशाली राजनीतिक मशीन है। लेकिन शक्ति के इसी दौर में उसे सबसे ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। नए वोटरों को जोड़िए, नए सामाजिक समीकरण बनाइए_लेकिन अपने कोर वोटर को खोकर नहीं। क्योंकि यदि कभी ऐसा हुआ कि पुराने समर्थक ने यह महसूस करना शुरू कर दिया कि पार्टी को उसकी जरूरत नहीं रही, तो इतिहास बताता है कि राजनीति में विकल्प बनने में ज्यादा समय नहीं लगता।
भाजपा के लिए यही संक्रमण काल का सबसे बड़ा संदेश है-सोशल इंजीनियरिंग से सत्ता मिल सकती है, लेकिन सत्ता की स्थिरता का आधार अपने समर्थकों का विश्वास ही होता है।
