अस्पताल नियोजकों के चयन और भुगतान में ₹5.05 करोड़ की भारी अनियमितता
भोपाल, एसबी राज। मध्यप्रदेश भवन विकास निगम (MPBDC) में अस्पताल परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये के कथित भ्रष्टाचार और भारी अनियमितता का मामला सामने आया है। महालेखाकार (ऑडिट) की ताजा निरीक्षण रिपोर्ट ने निगम के अधिकारियों और चुनिंदा चहेते सलाहकारों के बीच साठगांठ को उजागर करते हुए इसे सीधे तौर पर “₹5.05 करोड़ की बंदरबांट” करार दिया है।
ऑडिट जांच के दौरान गंभीर आपत्तियां जताते हुए ऑडिटर ने (पैरा 02, OBS-2336898) में तीन मुख्य बिंदुओं पर निगम को घेरा है, जो भ्रष्टाचार की ओर स्पष्ट इशारा करते हैं:
डीपीआर प्रावधानों का उल्लंघन और दोहरा भुगतान
MPPWD के 2017 के परिपत्र के अनुसार अस्पताल निर्माण की मूल डीपीआर (DPR) में ही प्लानर का प्रावधान पहले से है। लेकिन रीवा मेडिकल कॉलेज और सुल्तानिया अस्पताल (भोपाल) जैसे प्रोजेक्ट्स में अलग से प्लानर नियुक्त कर प्रोजेक्ट लागत का 0.15% से 0.50% अतिरिक्त भुगतान किया गया। जिन कार्यों (बाउंड्री वॉल, सीसीटीव्ही, सिविल वर्क) के लिए प्लानर को भुगतान हुआ, वे पहले से ही मुख्य प्रोजेक्ट का हिस्सा थे।
चहेते को ‘खुला चेक’ देने का आरोप, पारदर्शिता की उड़ी धज्जियां
नियमों के मुताबिक, भुगतान केवल ‘मेडिकली फंक्शनल एरिया’ के आधार पर होना था लेकिन निगम ने बिना किसी तकनीकी गणना के डॉ. मोहित अग्रवाल को पूरी प्रोजेक्ट लागत पर भुगतान कर सरकारी खजाने को चूना लगाया। ऑडिट ने इसे अनुचित भुगतान की श्रेणी में रखा है।
पैनल में डॉ. बिधान दास और डॉ. विनय कोठारी जैसे विशेषज्ञ होने के बावजूद, बिना किसी प्रतिस्पर्धा या पारदर्शी चयन प्रक्रिया के सारा काम अकेले डॉ. मोहित अग्रवाल को थमा दिया गया। ऑडिट ने इसे चयन प्रक्रिया में पक्षपात और निष्पक्षता की कमी बताया है।
महाप्रबंधक (आर्किटेक्ट) गोले की भूमिका संदिग्ध
रिपोर्ट के अनुसार_ इस पूरे नियम विरुद्ध अनुबंध और करोड़ों के संदिग्ध भुगतान के पीछे महाप्रबंधक (आर्किटेक्ट) नितिन गोले की भूमिका मुख्य रूप से जांच के घेरे में है। इन पर जानबूझकर नियम विरुद्ध अनुबंध बनाने का आरोप है। इन्होंने कथित तौर पर डीपीआर कंसल्टेंट के साथ हुए अनुबंध की टर्मस एंड कंडीशंस को जानते हुए भी नियमों के विपरीत अनुबंध किए और भुगतान सुनिश्चित किया।
एक ही कार्य, दो अनुबंध: सबसे गंभीर आरोप यह है कि एक ही कार्य को करने हेतु दो अलग-अलग अनुबंध किए गए। एक ही अनुबंधकर्ता द्वारा एक ही कार्य को दो बार करने का अनुबंध करना सीधे तौर पर ‘दोहरे भुगतान’ (Double Payment) की साजिश की ओर इशारा करता है। मेडीकल काउंसिल की गाइड लाइन अनुसार प्लानिंग हेतु_ मेडीकल कॉलेज, क्रिटिकल केयर हेल्थ भवन, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ईत्यादि भवनों में प्लानर का डीपीआर कंसल्टेंट के साथ अनुबंध का प्रावधान पहले से है, ऐसे में अतिरिक्त मेडीकल प्लानर की नियुक्ति करना शासन की धनराशि का दुरुपियोग या यू कहे शासकीय धनराशि की बंदरबांट करने जैसा है!
सिर्फ बड़े अस्पताल नहीं, छोटे केंद्रों में भी ‘खेल’
यह खेल केवल बड़े मेडिकल कॉलेजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। ऑडिट में पाया गया है कि 17 क्रिटिकल केयर हॉस्पिटल ब्लॉक (CCHBs), 20 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHCs) और 05 अस्पतालों के उन्नयन (Upgradation) की परियोजनाओं में भी इसी तरह से परामर्श शुल्क के नाम पर सरकारी खजाने में सेंध लगाई गई।
निगम की सफाई और ऑडिट की फटकार
एमपीबीडीसी प्रबंधन ने तकनीकी जरूरतों और स्वास्थ्य विभाग के पुराने आदेशों का हवाला देकर बचाव की कोशिश की है लेकिन ऑडिट विभाग ने उनके दावों को सिरे से खारिज कर दिया है। रिपोर्ट में स्पष्ट कहा गया है कि पीएसी पर कार्य आवंटन में हास्पिटल प्लानर को अनुचित लाभ दिया गया और इस प्रकार एक ही हॉस्पिटल प्लानर को ₹ 5.05 करोड का अनुचित लाभ हुआ, जिससे परियोजना निष्पादन में पारदर्शिता और निष्पक्षता से समझौता हुआ है।
ऑडिट रिपोर्ट के इन कड़े खुलासों से विभाग में हलचल मच गई है। ₹5.05 करोड़ का यह अनुचित लाभ अब सरकार के लिए गले की हड्डी बन गया है। अब देखना यह है कि क्या दोषियों पर कोई कड़ी कार्रवाई होगी या भ्रष्टाचार की यह फाइल भी फाइलों के ढेर में दबा दी जाएगी।
