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अनाधिकृत वेंडरों पर ‘एक्शन’ या ‘मैनेजमेंट’? कार्रवाई भी, ढिलाई भी… मिलीभगत के संकेत

ग्वालियर 1 अप्रैल 2026। युग क्रांति में “ग्वालियर स्टेशन पर अवैध वेंडरों का साम्राज्य” के खुलासे के बाद शुरू हुआ अभियान दूसरे दिन ही सवालों के घेरे में आ गया। झांसी मंडल से आए सहायक वाणिज्यिक प्रबंधक अनिल श्रीवास्तव की अगुवाई में कार्रवाई तो हुई लेकिन उसका तरीका ही संदेह खड़ा कर रहा है। सख्ती के साथ-साथ ‘सेटिंग’ की झलक साफ नजर आई।

आधिकारिक सूत्र अनुसार मंगलवार को 7 वेंडरों को पकड़कर आरपीएफ के हवाले किया गया। इनमें 2 बिना ऑर्डर के खाना बेचते पकड़े गए, जबकि 5 बेस किचन वेंडर बिना प्लेटफॉर्म परमिशन के ट्रेन में खाना चढ़ाने पहुंचे थे। लेकिन अंदरखाने की तस्वीर अलग है।

₹325 का ‘पास’ और हर्जाने व साठ- गांठ का खेल

प्लेटफार्म पर केडी फूड, एनजे फूड, कमलाबाई जैसे स्टॉल संचालक खुलेआम आइसक्रीम, बिरयानी एवं अन्य खाद्य सामग्री अवैध रूप बेच रहे हैं मगर इन्हें पूरी तरह से नजर अंदाज करते हुए ऑनलाइन वालों पर फॉकस रहा।

सूत्र अनुसार करीब 20-22 अनाधिकृत वेंडर पकड़े गए, जिनमें से सिर्फ 7 को RPF के हवाले कर दिया गया, बांकी को कार्रवाई के नाम पर जुर्माने की औपचारिकता या फिर “कोने की रस्म अदायगी” अर्थात साठ- गांठ  के बाद छोड़ दिया गया। यहीं से कार्रवाई की नीयत पर सवाल खड़े होने लगे हैं।

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह रहा कि 5 वेंडरों को सिर्फ बिना टिकट यात्रा का (₹325 प्रति व्यक्ति) जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया। यानी अवैध वेंडरिंग जैसे गंभीर मामले को सिर्फ टिकट उल्लंघन तक सीमित कर दिया गया, शेष को अवैधानिक आर्थिक दंड (उगाई) के साथ छोड़ दिया गया।

दिखावा या बचाव? कार्रवाई के पीछे का ‘असल मकसद’

इस दोहरे रवैये ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं—
अगर सभी 20-22 वेंडरों पर सख्त कार्रवाई होती, तो आरपीएफ के मंडल एवं जॉन स्तर के वरिष्ठ अधिकारी द्वारा ग्वालियर स्टेशन के जिम्मेदार अधिकारियों से यह पूछा जाता कि आखिर उनकी नांक के नीचे इतना बड़ा खेल कैसे चल रहा था? इस पर सवाल-जवाब होते?

सूत्रों का यह भी दावा है कि कुछ स्टाल संचालक झांसी वाले श्रीवास्तव जी के बेहद करीब बताए जाते हैं, लिहाजा कार्यवाही के साथ-साथ इस अभियान में करीबी का फर्ज भी निभाया जा रहा है!

यही वे वजह मानी जा रही है_ जिसके चलते सीमित कार्रवाई कर मामले को ‘कंट्रोल और मैनेज’ करने की कोशिश की गई, ताकि ऊपर तक सवाल न पहुंचे। नतीजा साफ है_ ऊपर से सख्ती का प्रदर्शन और नीचे से मिलीभगत का संरक्षण

ग्वालियर स्टेशन पर चल रहा यह अभियान साफ संकेत देता है कि व्यवस्था सुधारने से ज्यादा जोर ‘मैनेजमेंट’ पर है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, तब तक ऐसे अभियान सिर्फ दिखावा बनकर रहेंगे-और अवैध वेंडरों का नेटवर्क यूं ही फलता-फूलता रहेगा।