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अनिवार्य शिक्षा में ‘लॉ’ को शामिल करने की मांग

तथ्यात्मक भूल क्षम्य, पर कानूनी भूल नहीं—तो कानून की शिक्षा सबके लिए क्यों नहीं?

ग्वालियर/भोपाल। देश में कानून का मूल सिद्धांत है _ ‘Ignorance of Law is no excuse’ अर्थात कानून की अज्ञानता कोई बहाना नहीं है। जब विधि स्वयं यह मानती है कि हर नागरिक को कानून की जानकारी है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी नहीं बनती कि नागरिकों को बुनियादी कानूनी ज्ञान व्यवस्थित रूप से उपलब्ध कराया जाए?

विधि आधारित तथ्य है कि भूल दो प्रकार की होती है—तथ्यात्मक भूल और कानूनी भूल। तथ्यात्मक भूल कई परिस्थितियों में क्षम्य हो सकती है, परंतु कानूनी भूल को क्षमा नहीं किया जा सकता क्योंकि कानून स्वयं यह कहता है कि मैं सबको आता हूं। ऐसे में यदि नागरिक को कानून का ज्ञान नहीं है, तो दंड का सामना उसे ही करना पड़ता है, जबकि हमारी शिक्षा प्रणाली में अनिवार्य ज्ञान को “ऐच्छिक एवं व्यवसायिक” पाठ्यक्रम में रखा है। यही कारण है कि अब स्कूल और महाविद्यालय स्तर पर ‘लॉ’ को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग जोर पकड़ रही है।

कानूनी जागृति की लोकतंत्र में अहमियत..

शिक्षाविदों और विधि विशेषज्ञों का तर्क है कि संविधान के मूल अधिकार, मौलिक कर्तव्य, साइबर अपराध, उपभोक्ता अधिकार, महिला एवं बाल सुरक्षा कानून, यातायात नियम, संपत्ति एवं अनुबंध संबंधी बुनियादी प्रावधान—ये सभी विषय सीधे आम नागरिक के जीवन से जुड़े हैं। यदि इन्हें प्रारंभिक शिक्षा में शामिल किया जाए तो समाज में कानून के प्रति जागरूकता बढ़ेगी, अपराधों में कमी आएगी और न्यायिक व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ भी घटेगा।

नीति-निर्माताओं के समक्ष यह प्रश्न भी है कि जब सरकारें विभिन्न कानूनों के प्रावधानों को लागू करने का दायित्व निभाती हैं, तो नागरिकों को उन प्रावधानों की जानकारी देना भी शासन का नैतिक और प्रशासनिक कर्तव्य है। विशेषज्ञों के अनुसार, कक्षा 8 या 9 से “बेसिक लीगल स्टडीज” जैसा विषय शुरू किया जा सकता है, जिसमें व्यावहारिक और जीवनोपयोगी कानूनी ज्ञान दिया जाए।

कानूनी जागरूकता को शिक्षा का हिस्सा बनाने से लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ें मजबूत होंगी और नागरिक अपने अधिकारों व कर्तव्यों के प्रति अधिक सजग बनेंगे। यह केवल पाठ्यक्रम का विस्तार नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और कानूनसम्मत समाज की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

अब अभियान की शुरुआत..

इसी संदर्भ में ‘युग क्रांति’ इस अहम जनहितैषी मांग को केवल समाचार के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक अभियान के रूप में आगे बढ़ा रही है। हमारा स्पष्ट मानना है कि जब सरकारें विभिन्न विधिक प्रावधानों को लागू करने का दायित्व निभाती हैं तो नागरिकों को उन प्रावधानों की जानकारी सुनिश्चित करना भी उनका कर्तव्य है। ‘युग क्रांति’ नीति-निर्धारकों से आग्रह करती है कि शिक्षा नीति में आवश्यक संशोधन कर “बेसिक लीगल स्टडीज” को अनिवार्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, ताकि ‘कानून सबको आता है’ की धारणा वास्तविकता का रूप ले सके। यह केवल पाठ्यक्रम विस्तार का विषय नहीं, बल्कि एक जागरूक, जिम्मेदार और विधि-सम्मत समाज की नींव रखने का प्रश्न है।

हम इस मुद्दे पर जनमत एकत्रित करने, विशेषज्ञों की राय सामने लाने और सरकार का ध्यान आकर्षित करने हेतु निरंतर लेख, संवाद और विचार-विमर्श प्रकाशित करेंगे। लोकतंत्र की मजबूती के लिए कानून की समझ हर नागरिक तक पहुँचना आवश्यक है। अब निगाहें सरकार पर हैं—क्या वह शिक्षा नीति में आवश्यक संशोधन कर “कानून सबको आता है” की धारणा को वास्तविकता में बदलने की पहल करेगी?