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आधी रोटी, पानीपत की जंग और पांच पीढ़ियों का आशीर्वाद: सिंधिया राजघराने में आज भी क्यों होती है मंसूर शाह की पूजा?

300 साल पुरानी परंपरा में छिपी है युद्ध, घायल महादजी सिंधिया और एक सूफी संत के आशीर्वाद की कहानी

बृजराज सिंह, ग्वालियर। ग्वालियर के ऐतिहासिक महाराज बाड़े के गोरखी परिसर स्थित देवघर में केंद्रीय मंत्री और सिंधिया राजपरिवार के वंशज (मुखिया) ज्योतिरादित्य सिंधिया ने मंसूर शाह की पूजा-अर्चना कर आशीर्वाद लिया। देखने में यह एक धार्मिक परंपरा है, लेकिन इसके पीछे सिंधिया राजघराने की करीब तीन शताब्दियों पुरानी ऐसी कथा जुड़ी है, जिसमें पानीपत का युद्ध, घायल महादजी सिंधिया, एक मुस्लिम सूफी संत और आधी रोटी—चारों एक साथ दिखाई देते हैं।

राजपरिवार की परंपरा के अनुसार मंसूर शाह का आशीर्वाद सिंधिया परिवार के लिए इतना महत्वपूर्ण रहा कि आज भी उनके स्मृति-चिह्नों को देवघर में सुरक्षित रखकर पूजा की जाती है। लेकिन इस कहानी का एक हिस्सा इतिहास के दस्तावेजों से ज्यादा राजपरिवार की पीढ़ियों से चली आ रही मान्यता और स्थानीय परंपरा के रूप में सामने आता है।

पानीपत में घायल हुए महादजी और फिर जुड़ी मंसूर शाह की कहानी

पानीपत के युद्ध के दौरान महादजी सिंधिया14 जनवरी 1761 को तीसरा पानीपत युद्ध हुआ। मराठा सेना की हार के बाद भारी तबाही मची। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार महादजी सिंधिया भी इस युद्ध में घायल हुए और उनकी टांग में ऐसी चोट आई जिसका असर जीवनभर रहा। कुछ ऐतिहासिक विवरण बताते हैं कि भागते समय वे घायल होकर रह गए थे और बाद में एक मुस्लिम व्यक्ति ने उनकी जान बचाने में मदद की। और यहीं से मंसूर शाह से जुड़ी परंपरागत कथा शुरू होती है।

सिंधिया परिवार से जुड़ी मान्यता के अनुसार, महादजी की मां और पत्नी उनकी सलामती को लेकर चिंतित थीं। इसी दौरान वे सूफी संत मंसूर शाह के पास पहुंचीं। मान्यता है कि संत ने महादजी के जीवित लौटने का भरोसा दिलाया। बाद में जब घायल महादजी जीवित लौटे तो इस घटना को मंसूर शाह के आशीर्वाद से जोड़कर देखा गया। कथा यहीं खत्म नहीं होती।

आधी रोटी और पांच पीढ़ियों का आशीर्वाद

परंपरा के अनुसार, मंसूर शाह ने महादजी को अपनी आधी रोटी दी और उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनका परिवार पांच पीढ़ियों तक राज करेगा और यही आधी रोटी आज सिंधिया राजपरिवार की महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक मानी जाती है।

ग्वालियर के देवघर में मंसूर शाह से जुड़ी आधी रोटी का अवशेष, अंगवस्त्र और अन्य वस्तुएं सुरक्षित रखे जाने की जानकारी विभिन्न स्थानीय ऐतिहासिक विवरणों में मिलती है।यानी जिस परंपरा की शुरुआत पानीपत के बाद महादजी से जुड़ी एक मान्यता से मानी जाती है, वह आज भी राजपरिवार के धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है।

देवघर में आज भी निभाई जाती है परंपरा

देवघर में पूजागोरखी परिसर का देवघर केवल हिंदू देवी-देवताओं की पूजा का स्थान नहीं है। यहां सिंधिया परिवार के कुलदेवता के साथ मंसूर शाह से जुड़ी स्मृतियां भी सुरक्षित रखी गई हैं। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार राजपरिवार का मुखिया विशेष अवसरों पर यहां पारंपरिक पूजा करता है।

पूजा की एक अनोखी परंपरा भी बताई जाती है। फूलों से सजे प्रतीकात्मक स्थल पर राजपरिवार का मुखिया चंवर डुलाता है और जब फूल नीचे गिरता है, तब उसे आशीर्वाद का संकेत माना जाता है। इसके बाद उस फूल को राजमहल के पूजा स्थल पर ले जाकर सुरक्षित रखने की परंपरा बताई जाती है।ज्योतिरादित्य सिंधिया भी कई अवसरों पर इस परंपरा का निर्वहन कर चुके हैं।

इतिहास, आस्था और एक असाधारण रिश्ता

मंसूर शाह और सिंधिया परिवार की कहानी इसलिए भी अलग है क्योंकि यह केवल किसी संत और राजपरिवार के रिश्ते की कथा नहीं है। यह 18वीं सदी के उस दौर की याद दिलाती है जब युद्धों और सत्ता संघर्षों के बीच धार्मिक और सामाजिक रिश्तों की कई परतें एक-दूसरे से जुड़ी हुई थीं।

दिलचस्प बात यह भी है कि महाराष्ट्र के बीड में मंसूर शाह की दरगाह से सिंधिया परिवार का संबंध बताने वाले ऐतिहासिक संदर्भ भी मिलते हैं। Archaeological Survey of Western India की सामग्री में बीड स्थित मंसूर शाह की दरगाह के निर्माण को महादजी सिंधिया से जोड़ा गया है। वहीं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस के एक अध्ययन में बीड के मंसूर अली शाह की दरगाह और मराठा शासकों के संरक्षण के संबंध का उल्लेख मिलता है।

यद्यपि आधी रोटी की कहानी चाहे आस्था और परंपरा की श्रेणी में आती हो, लेकिन मंसूर शाह की दरगाह और सिंधिया सत्ता के बीच ऐतिहासिक संबंध का एक अलग दस्तावेजी आधार भी दिखाई देता है।

कहानी से बड़ा है उसका संदेश

ज्योतिरादित्य सिंधिया का बयानआज जब ग्वालियर के राजपरिवार का मुखिया मंसूर शाह के सामने सिर झुकाता है तो यह सिर्फ एक पुराने अनुष्ठान की पुनरावृत्ति नहीं है। यह उस परंपरा का निर्वहन है, जिसे सिंधिया परिवार पीढ़ियों से अपने इतिहास और आस्था का हिस्सा मानता आया है। पानीपत की रक्तरंजित धरती से शुरू हुई यह कहानी ग्वालियर के देवघर तक पहुंचती है—जहां आज भी एक आधी रोटी, एक अंगवस्त्र और एक सूफी संत की स्मृति राजपरिवार की परंपरा में सुरक्षित है।

इतिहास इसकी हर कड़ी को एक समान प्रमाणित करे या न करे, लेकिन सिंधिया राजपरिवार की परंपरा में मंसूर शाह का स्थान आज भी कायम है_और यही इस कहानी को ग्वालियर के इतिहास की सबसे अनोखी परंपराओं में शामिल करता है।