संघप्रिय को जिम्मेदार मानकर हटाना आसान, लेकिन सड़कें क्यों नहीं सुधरतीं—यह सवाल ज्यादा बड़ा
ग्वालियर 25 अगस्त 2026। ग्वालियर की बद से बदतर होती सड़कों का स्थायी समाधान किसी एक कमिश्नर का तबादला करना नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था की अंदरूनी वजहों को सामने लाना और उनका इलाज करना है, जिसके चलते सड़क बनने के बाद भी उसकी गुणवत्ता सवालों के घेरे में रहती है।
यद्यपि सड़कों की खराब हालत के लिए कमिश्नर संघप्रिय को जिम्मेदार मानते हुए उनका स्थानांतरण कर दिया गया हो, लेकिन उनकी सहजता, कार्यकुशलता और जनसरोकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक अत्यंत जनप्रिय अधिकारी के तौर पर उनका कार्यकाल ग्वालियर लंबे समय तक भुला नहीं पाएगा।
ग्वालियर नगर निगम की सड़कों की दुर्दशा के पीछे के कारणों पर युग क्रांति द्वारा समय-समय पर गंभीर सवाल उठाए जाते रहे हैं। यह सवाल और समस्या संघप्रिय से पहले के कमिश्नरों के कार्यकाल में भी बनी रही और उसका स्थायी समाधान नहीं हो सका, तो क्या समस्या केवल कमिश्नर की कार्यशैली में है?
जब ठेकेदारी से जनप्रतिनिधित्व का आत्मीय जुड़वा हो तो गुणवत्ता पर निगरानी कौन करेगा?
सड़कों की दुर्दशा से जुड़े इसी अहम सवाल को आज नवागत कमिश्नर अभिषेक चौधरी से संपादक बृजराज सिंह तोमर द्वारा पूछा गया।
सवाल सीधा था—ग्वालियर के 66 वार्डों में कम से कम 30 वार्डों के अंतर्गत स्वयं पार्षद सहित निगम में विधायक, पूर्व विधायक, महापौर और पूर्व महापौर से जुड़े लोगों की फर्में ठेकेदारी कर रही हैं, तो ऐसी स्थिति में निगम उनसे गुणवत्ता मेंटेन कैसे कराएगा? और यदि उन्हीं फर्मों के कार्यों में खामियां सामने आती हैं तो उन पर प्रभावी अंकुश कैसे लगाया जाएगा?
नवागत आयुक्त चौधरी ने भले ही दमखम के साथ इसका जवाब देते हुए कहा कि गुणवत्ता के मामले में किसी भी तरह का समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन असली परीक्षा अब बयान की नहीं, बल्कि जमीन पर कार्रवाई की होगी। क्योंकि वार्ड स्तर से लेकर महापौर अथवा विधायक स्तर के जनप्रतिनिधियों से जुड़ी मौजूदा ठेकेदारी व्यवस्था पर अंकुश लगाना निश्चित रूप से साहसिक निर्णय होगा।
चौधरी के सामने चुनौती सिर्फ सड़कें नहीं, पूरी व्यवस्था है

अब देखने वाली बात यह होगी कि नवागत आयुक्त अभिषेक चौधरी इस चुनौती से किस तरह निपटते हैं।
क्या सड़क निर्माण और मेंटेनेंस में गुणवत्ता की निगरानी वास्तव में निष्पक्ष होगी?
क्या खराब काम करने वाली फर्मों पर कार्रवाई होगी, चाहे उनका संबंध किसी भी प्रभावशाली व्यक्ति से क्यों न हो?
क्या सड़क की गुणवत्ता के लिए जिम्मेदारी तय होगी या फिर हर बार किसी अधिकारी के तबादले को ही समाधान मान लिया जाएगा?
ग्वालियर को अब कमिश्नर बदलने से ज्यादा व्यवस्था बदलने की जरूरत है। संघप्रिय चले गए, नए आयुक्त अभिषेक चौधरी आ गए। लेकिन यदि सड़क निर्माण, ठेकेदारी, गुणवत्ता जांच और राजनीतिक प्रभाव की वही पुरानी व्यवस्था कायम रही, तो कमिश्नर बदलते रहेंगे और ग्वालियर की सड़कें बदहाल ही रहेंगी। यही वह असली सवाल है, जिसका जवाब अब ग्वालियर नवागत आयुक्त से चाहता है।
