एक तरफ बड़े न्यूज चैनलों पर सत्ता के पक्ष में झुकाव के आरोप, दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर आधे-अधूरे तथ्यों और भ्रामक दावों की भरमार; आखिर आम आदमी सच्चाई पहचाने तो कैसे?
* बृजराज सिंह तोमर*
नई दिल्ली/भोपाल। देश में आज एक ऐसा सूचना-संकट गहराता दिख रहा है, जिसमें किसी बड़े राष्ट्रीय मुद्दे पर लोगों के सामने केवल अलग-अलग विचार नहीं, बल्कि सच्चाई के दो परस्पर विरोधी संस्करण खड़े हो जाते हैं। एक वर्ग प्रमुख न्यूज चैनलों की खबरों और उनके विश्लेषण पर भरोसा करता है, तो दूसरा वर्ग इन्हीं चैनलों को ‘गोदी मीडिया’ कहकर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाता है और सोशल मीडिया को सच्चाई का विकल्प मानता है। नतीजा यह है कि देश में बहस का केंद्र धीरे-धीरे मुद्दों से हटकर इस सवाल पर आ गया है कि किसकी बात मानी जाए और किसकी नहीं।
सबसे गंभीर स्थिति तब पैदा होती है, जब किसी घटना पर टीवी चैनलों की रिपोर्टिंग और सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो, दावे तथा विश्लेषण एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत दिखाई देते हैं। एक पक्ष टीवी पर दिखाई जा रही खबर को प्रमाण मानता है, जबकि दूसरा पक्ष उसे छिपाई गई सच्चाई का हिस्सा बताता है। दोनों पक्ष अपने-अपने तर्कों के समर्थन में सामग्री साझा करते हैं, लेकिन आम नागरिक के सामने यह तय करने की चुनौती खड़ी हो जाती है कि तथ्य कहां हैं और प्रचार कहां?
टीवी मीडिया पर सवाल, सोशल मीडिया भी दूध का धुला नहीं
देश के प्रमुख न्यूज चैनलों की पहुंच, संसाधन और रिपोर्टिंग नेटवर्क व्यापक हैं। इसके बावजूद जब किसी चैनल की बहस में एक ही पक्ष को लगातार प्रमुखता मिलती दिखाई देती है, विपक्ष के सवालों को पर्याप्त जगह नहीं मिलती या किसी गंभीर मुद्दे की पड़ताल से ज्यादा राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को प्रसारित किया जाता है, तो उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। ‘गोदी मीडिया’ शब्द इसी अविश्वास और सत्ता के प्रति कथित झुकाव की आलोचना के रूप में प्रचलित हुआ है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया पर प्रसारित हर वीडियो, हर पोस्ट और हर वायरल संदेश को सच मान लेना भी खतरनाक है। यहां वास्तविक घटनाओं के वीडियो के साथ पुराने फुटेज, अधूरी क्लिप, भ्रामक कैप्शन, अपुष्ट दावे और राजनीतिक हितों से प्रेरित सामग्री भी फैल सकती है। कई बार किसी घटना का एक हिस्सा दिखाकर पूरे घटनाक्रम की अलग तस्वीर बना दी जाती है।
इसलिए यह मान लेना कि टीवी पर दिखाया गया सब कुछ झूठ है और सोशल मीडिया पर सामने आया हर दावा सच है, उतना ही गलत है जितना किसी बड़े चैनल की हर खबर को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेना। मीडिया का मूल्यांकन उसके नाम, लोकप्रियता या राजनीतिक पहचान से नहीं, उसके तथ्यों, प्रमाणों और पत्रकारिता के मानकों से होना चाहिए।
खबर से पहले तय हो जाती है पक्षधरता?
इस संकट का एक बड़ा कारण दर्शकों की बदलती मानसिकता भी है। अनेक मामलों में लोग खबर देखने से पहले ही तय कर लेते हैं कि कौन सही है और कौन गलत। जिस चैनल या सोशल मीडिया अकाउंट की विचारधारा उनसे मेल खाती है, उसकी बात उन्हें विश्वसनीय लगती है। विरोधी पक्ष की सामग्री सामने आते ही उसे झूठ, प्रोपेगेंडा या साजिश बताने की प्रवृत्ति दिखाई देती है।
यहीं से एक ही देश के नागरिकों के बीच सूचना की दो अलग-अलग दुनिया बनने लगती हैं। एक समूह अपनी पसंद के चैनल और अकाउंट से मिलने वाली जानकारी के आधार पर राय बनाता है, जबकि दूसरा समूह दूसरे स्रोतों से मिली सामग्री को अंतिम सच मान लेता है। दोनों के बीच संवाद की जगह अविश्वास और बहस की जगह आरोप लेने लगते हैं।
लोकतंत्र में सरकार का समर्थन करना गलत नहीं है और सरकार की आलोचना करना भी गलत नहीं है। समस्या तब पैदा होती है, जब समर्थन के कारण सवाल पूछना बंद हो जाए और विरोध के कारण प्रमाणों की अनदेखी होने लगे। पत्रकारिता का काम किसी राजनीतिक खेमे को खुश करना नहीं, बल्कि सत्ता, विपक्ष और व्यवस्था—सभी से सवाल पूछना है।
सच की पहचान का पैमाना क्या हो?
किसी भी महत्वपूर्ण खबर पर राय बनाने से पहले कुछ बुनियादी सवाल पूछना जरूरी है। खबर का मूल स्रोत क्या है? क्या संबंधित दस्तावेज, पूरा वीडियो या आधिकारिक बयान उपलब्ध है? क्या दूसरे स्वतंत्र स्रोत भी उसी तथ्य की पुष्टि करते हैं? क्या खबर में आरोप और प्रमाण के बीच अंतर रखा गया है? और क्या नई जानकारी सामने आने पर संबंधित मीडिया संस्थान ने अपनी गलती सुधारी है?
यदि किसी टीवी चैनल पर कोई आरोप लगाया जाता है, तो उसका मूल बयान और उपलब्ध दस्तावेज देखे जाने चाहिए। यदि सोशल मीडिया पर कोई वीडियो वायरल होता है, तो उसकी तारीख, स्थान और पूरा संदर्भ जांचना चाहिए। सरकारी आंकड़ों को भी बिना पड़ताल अंतिम सत्य नहीं मानना चाहिए; उनकी तुलना अन्य उपलब्ध रिकॉर्ड और स्वतंत्र विश्लेषण से की जा सकती है।
यह भी समझना होगा कि किसी खबर का वायरल होना उसकी सत्यता का प्रमाण नहीं है और किसी खबर का किसी बड़े चैनल पर प्रसारित होना भी उसकी सटीकता की गारंटी नहीं है।
मीडिया की लड़ाई में सबसे बड़ा नुकसान जनता का
मीडिया का यह टकराव केवल पत्रकारिता तक सीमित नहीं है। इसका असर नागरिकों की राजनीतिक समझ, सामाजिक संबंधों और लोकतांत्रिक निर्णयों पर पड़ता है। जब लोग तथ्यों के बजाय अपनी पसंद के स्रोत के आधार पर सच्चाई तय करने लगते हैं, तो वास्तविक समस्याएं पीछे छूट जाती हैं। बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर गंभीर चर्चा की जगह यह विवाद हावी हो जाता है कि किसने किसके पक्ष में खबर दिखाई।
इसका समाधान न तो टीवी मीडिया को पूरी तरह खारिज करने में है और न सोशल मीडिया को सच्चाई का एकमात्र मंच घोषित करने में। जरूरत ऐसे मीडिया की है जो सत्ता से सवाल पूछ सके, विपक्ष के दावों की भी जांच करे, अपनी गलतियां स्वीकार करे और खबर तथा विचार के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखे। साथ ही, नागरिकों को भी अपनी पसंद के विपरीत आने वाले तथ्यों को सुनने और प्रमाणों के आधार पर राय बदलने के लिए तैयार रहना होगा।
आखिर में सवाल यही है—क्या हम सच जानना चाहते हैं, या केवल वही सुनना चाहते हैं जो हमारी पहले से बनी राय को सही साबित करे? जब तक इस सवाल का ईमानदारी से सामना नहीं किया जाएगा, तब तक मीडिया के अलग-अलग खेमों की लड़ाई चलती रहेगी और वास्तविक मुद्दे पीछे छूटते रहेंगे। लोकतंत्र को किसी एक मीडिया माध्यम के अंधसमर्थन की नहीं, बल्कि स्वतंत्र पत्रकारिता, प्रमाण-आधारित विमर्श और जागरूक नागरिकों की जरूरत है। क्योंकि सच किसी चैनल, पार्टी या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की निजी संपत्ति नहीं है; उसकी कसौटी प्रमाण, संदर्भ और निष्पक्ष जांच ही होनी चाहिए।
