मुख्यमंत्री के कार्यक्रम में बिना अनुमति लाखों का खर्च
ढाई से तीन करोड़ की एडी के रूप में फर्जी बिलिंग का भी आरोप
भोपाल/सागर। मध्य प्रदेश भवन विकास निगम (MPBDC) एक बार फिर सुर्खियों में है और इस बार मामला सीधे सागर संभाग से जुड़ा है। एजीएम से डीजीएम बने योगेंद्र प्रताप चौहान की कार्यशैली ने निगम मुख्यालय भोपाल तक हड़कंप मचा दिया है। कथित राजनीतिक संरक्षण और गठजोड़ के दम पर तेज़ी से पदोन्नति पाने वाले चौहान अब अपने मनमाने फैसलों को लेकर विवादों में घिर गए हैं।
सूत्रों के अनुसार, प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और मंत्री गोविंद सिंह राजपूत के सागर में आयोजित एक शासकीय कार्यक्रम में डीजीएम चौहान ने करीब 56 लाख रुपये खर्च कर दिए। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि इतना बड़ा खर्च बिना किसी पूर्व अनुमति के कर दिया गया। जब इस खर्च का बिल भुगतान के लिए भोपाल मुख्यालय भेजा गया, तो वहां बैठे अधिकारियों के हाथ-पांव फूल गए और नियमों का हवाला देते हुए बिल वापस सागर भेज दिया गया।
भवन विकास निगम के DGM ने मंत्री को ख़ुश करने के लिए 56 लाख रुपए खर्च तो कर दिए लेकिन अब स्थिति यह बन गई है कि इस खर्च का भुगतान कैसे हो। बताया जा रहा है कि डीजीएम चौहान ठेकेदारों पर दबाव बना रहे हैं कि टेंट, वाहन और भोजन व्यवस्था में लगे खर्च का भुगतान वे स्वयं करें। ऐसे में साफ तौर पर आशंका जताई जा रही है कि यदि ठेकेदार भुगतान करते हैं तो बदले में वे भी अपने तरीके से वसूली की कोशिश करेंगे, जिससे भ्रष्टाचार की नई परत खुल सकती है।
चौहान को निगम में अपनी दबंगी और राजनीतिक संरक्षण का तथाकथित भोकाल बनाते देखा जा सकता है और कहीं ना कहीं यह भी वजह है कि एजीएम से डीजीएम तक उनका प्रमोशन तेजी से हुआ और सागर संभाग के साथ-साथ छतरपुर संभाग का अतिरिक्त प्रभार भी उन्हें सौंप दिया गया। पूर्व मुख्य अभियंता अनिल श्रीवास्तव द्वारा उनका ट्रांसफर करने की कोशिश भी राजनीतिक दबाव के चलते सफल नहीं हो पाई थी।
ढाई से तीन करोड़ की एडी के रूप में फर्जी बिलिंग का भी आरोप
सूत्रों की माने तो डीजीएम बनते ही चौहान ने सागर के कुछ सीएम राइज स्कूलों के कार्य पूर्ण होकर उसकी बिलिंग के पश्चात_ कुल शेंसन राशि में से बची हुई तकरीबन 2.5 से 3 करोड़ रुपए की राशि का समायोजन (Ad) फर्जी भुगतान के रूप में किया गया और इसका तीन से चार जगह बंदरबांट कर लिया गया जो अपने आप में बड़ी जांच का विषय है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर भोपाल में बैठे वरिष्ठ अधिकारी कार्रवाई करने से क्यों बच रहे हैं। क्या राजनीतिक दबाव इतना हावी है कि नियम-कायदों को दरकिनार कर दिया जाए, या फिर सिस्टम में बैठे लोग जानबूझकर आंखें मूंदे हुए हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि बिना स्वीकृति के हुए इस 56 लाख रुपये के खर्च का भुगतान आखिर किस आधार पर किया जाएगा। यदि नियमों को ताक पर रखकर बिल पास होते हैं, तो यह पूरे सिस्टम की पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करेगा और यदि ठेकेदारों से कराया जाता है तो उसके बदले में ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए फर्जी भुगतान के रूप में कितनी ‘AD’ होती है यह देखने वाली बात होगी! अगर कार्रवाई होती है, तो यह देखना होगा कि क्या वास्तव में जिम्मेदारों पर शिकंजा कसता है या मामला फिर ठंडे बस्ते में चला जाता है।
