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मध्य प्रदेश में आरटीओ चेकिंग की नई व्यवस्था फेल का दूसरा सच

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तकनीकी खामियों, दबाव तंत्र और सिंडिकेट राज ने खोली पोल

भोपाल 31 जनवरी 2026। जुलाई 2024 में इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट बंद होने के बाद लागू किए गए “गुजरात मॉडल” की जमीनी हकीकत अब खुलकर सामने आ रही है। व्यवस्था बदलने की जल्दबाजी में न तो तकनीकी ढांचा तैयार हुआ और न ही अमले को प्रशिक्षित किया गया—नतीजा, पूरा सिस्टम अब अव्यवस्था, विवाद और दबाव की भेंट चढ़ता दिख रहा है।

फ्लाइंग स्क्वॉड/चेकिंग पॉइंट बना ‘फेल मॉडल’: बिना संसाधन चेकिंग से विवाद ही विवाद

पहले चेक पोस्टों पर ओवरलोडिंग जांच के लिए पर्याप्त जगह, वजन मापने के कांटे और ऊंचाई मापने की व्यवस्थाएं उपलब्ध थीं। लेकिन अब फ्लाइंग स्क्वॉड के जरिए सड़क किनारे चेकिंग की जा रही है, जहां न तो वाहनों को सुरक्षित रोकने की जगह है और न ही माप उपकरण।

परिणाम यह कि एक वाहन की जांच में एक्ट के अनुसार लगने वाले 10 मिनट भी भारी पड़ रहे हैं और मौके पर जाम जैसी स्थिति बन रही है। ओवरलोडिंग का आकलन “अनुमान” से करने पर चालान विवादों में बदल रहे हैं, जिससे न केवल विभाग की साख गिर रही है बल्कि कानून की विश्वसनीयता भी सवालों में है।

अमले की कमी और ‘प्राइवेट कटर’ राज: नेताओं और दलालों का सीधा दखल

विभाग के पास पर्याप्त प्रशिक्षित अमला नहीं है। सिपाही और होमगार्ड इस नई व्यवस्था को समझने में असमर्थ हैं, जिसका फायदा दोनों ओर से उठाया जा रहा है। एक ओर चेकिंग अधिकारी अपने “प्राइवेट कटर” तैनात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर स्थानीय नेता अपने करिंदों को चेकिंग पॉइंट्स पर जबरन बैठवाकर वसूली का नया नेटवर्क खड़ा कर रहे हैं।

यह वही परंपरा है, जिसकी जड़ें 2019-23 के काले दौर में पड़ी थीं और आज भी सिस्टम का पीछा नहीं छोड़ रही हैं। इसी दौर की देन हैं—ब्लैकमेलिंग पत्रकार, फर्जी यूट्यूबर और दबाव बनाने वाले दलाल, जो अब खुलेआम हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अधिकारियों पर दबाव बना रहे हैं।

सोशल मीडिया का ‘हथियार’: फर्जी खबरों से दबाव, कर्मचारी बन रहे बलि का बकरा

जब दबाव काम नहीं करता, तो यही तत्व सोशल मीडिया का सहारा लेकर झूठी-सच्ची खबरें, फोटो-वीडियो वायरल कर देते हैं। इन वायरल खबरों के दबाव में उच्च अधिकारी और राजनीतिक तंत्र अक्सर बिना पूरी जांच के निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई कर देते हैं—चाहे गलती हो या नहीं।

नतीजतन, ईमानदार कर्मचारी “सैंडविच” बनकर पिस रहे हैं, जबकि असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे सुरक्षित बने हुए हैं।

सूत्र बताते हैं कि कुछ कथित पत्रकार वल्लभ भवन एवं बड़े नेताओं और अधिकारियों के आसपास मंडराकर चुगलखोरी के जरिए अपना व्यावसायिक हित साध रहे हैं। स्थिति यह है कि परिवहन विभाग में कर्मचारियों से ज्यादा इन चुगलखोरो का प्रभाव दिखाई दे रहा है, जो निर्णयों को भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

ड्राइवर संघ और कथित नेता भी ‘खेल’ में शामिल: पारदर्शिता के नाम पर सेटिंग

नई व्यवस्था का विरोध कर “पारदर्शिता” की मांग करने वाले कुछ तथाकथित ड्राइवर संगठन और नेता भी इस खेल का हिस्सा बनते दिख रहे हैं।

सूत्रों के अनुसार, ये लोग वाहनों की लंबी “सेटिंग लिस्ट” और मासिक बंधी के जरिए अपनी हिस्सेदारी तय कर रहे हैं। यदि उनकी शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो यही लोग अपने “मीडिया नेटवर्क” के जरिए खबरें चलवाकर दबाव बनाने का काम करते हैं। यहां तक कि एक सक्रिय चेहरा, जो खुद को अवैध वसूली के खिलाफ लड़ने वाला बता रहा है, उसके राजनीतिक उद्देश्य और भविष्य की फंडिंग को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

आरक्षक स्तर पर सिंडिकेट: वर्षों से जमे कर्मचारी चला रहे समानांतर सिस्टम

अराजकता की इस पूरी कड़ी में कुछ आरक्षकों की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है। वर्षों से एक ही जिले/ गृह जिला में जमे ये कर्मचारी स्थानीय स्तर पर सिंडिकेट बनाकर समानांतर व्यवस्था चला रहे हैं और अपने प्रभाव के दम पर किसी भी कार्रवाई को प्रभावित करने की स्थिति में हैं।

हाल ही में जबलपुर में सामने आई घटना भी दो आरक्षकों की अंदरूनी लड़ाई का परिणाम बताई जा रही है, जो इस सड़े हुए तंत्र की गहराई को उजागर करती है। जबकि नियम स्पष्ट है कि प्रवर्तन अमले का हर 6 महीने में ट्रांसफर होना चाहिए—तो फिर इन मामलों में नियमों की अनदेखी क्यों?

अब निर्णायक हस्तक्षेप की जरूरत: वरना व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त

स्पष्ट है कि नई व्यवस्था बिना मजबूत आधार और सख्त नियंत्रण के लागू की गई, जिसका खामियाजा पूरा सिस्टम भुगत रहा है। अब जरूरी है कि परिवहन आयुक्त, परिवहन मंत्री और मुख्यमंत्री स्वयं इस पूरे तंत्र पर सख्त संज्ञान लें।

यदि पारदर्शिता और राजस्व बढ़ाना लक्ष्य है, तो केवल प्रयोग नहीं, बल्कि जड़ से सुधार की आवश्यकता है—चाहे इसके लिए संशोधित रूप में पुरानी व्यवस्था को ही क्यों न लागू करना पड़े। अन्यथा, यह “नई व्यवस्था” भी उसी अंधेरे का हिस्सा बन जाएगी, जिससे बाहर निकलने का दावा किया गया था।

खबर का पहला भाग..

मध्य प्रदेश में आरटीओ चेकिंग की नई व्यवस्था फेल? (Part 1)