युग क्रांति: मध्य प्रदेश परिवहन विभाग की व्यवस्था की समीक्षात्मक पड़ताल
चैक पोस्ट बंद करने के फैसले के बाद भी नहीं थमी वसूली की शिकायतें; विभागीय कार्रवाई के बावजूद व्यवस्था में पारदर्शिता बड़ी चुनौती, ड्राइवरों के विरोध की भी हो निष्पक्ष जांच
भोपाल। मध्य प्रदेश में परिवहन चेक पोस्ट बंद करने का फैसला व्यवस्था को पारदर्शी बनाने और कथित अवैध वसूली पर अंकुश लगाने के उद्देश्य से लिया गया था, लेकिन चेकिंग पॉइंटों से लगातार सामने आ रही शिकायतें सवाल खड़े कर रही हैं कि आखिर सरकारी आदेशों और ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की सख्ती का जमीनी असर कितना हुआ है। एक तरफ निजी व्यक्तियों यानी कथित प्राइवेट कटर्स की सक्रियता और वाहन चालकों से पैसे मांगने के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ कुछ वाहन चालकों द्वारा अपनी कमियां छिपाने के लिए विरोध, हंगामे और वीडियो वायरल कर विभाग पर दबाव बनाने की आशंका भी जांच का विषय है। इस पूरे मामले में न तो हर ड्राइवर की शिकायत को झूठा मानना उचित है और न ही हर वायरल वीडियो को अपने आप अवैध वसूली का निर्णायक सबूत माना जा सकता है।
जुलाई 2024 से पुरानी परिवहन चेक पोस्टों का संचालन बंद करने के बाद भी समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई। मार्च 2026 में खिलचीपुर क्षेत्र से कथित वसूली का वीडियो सामने आया, जबकि जुलाई 2026 में ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) ने प्रधानमंत्री, केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर चेकिंग पॉइंटों पर कथित अवैध वसूली तथा गैर-शासकीय व्यक्तियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की। इससे स्पष्ट है कि मामला केवल सोशल मीडिया पर होने वाले आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहा है।
कमिश्नर के निर्देश स्पष्ट, फिर निजी व्यक्तियों की मौजूदगी कैसे?
परिवहन विभाग ने वाहन चेकिंग में अनधिकृत व्यक्तियों की भूमिका रोकने के लिए निर्देश जारी किए थे। अप्रैल 2025 में जारी दिशा-निर्देशों में वर्दीधारी कर्मचारियों, बॉडी कैमरे और निर्धारित प्रक्रिया के तहत जांच पर जोर दिया गया था। वहीं, जुलाई 2026 में AIMTC ने परिवहन आयुक्त की 16 अप्रैल 2025 की SOP का हवाला देते हुए मांग की कि निजी व्यक्तियों की सक्रियता की जांच हो और यदि किसी नेटवर्क या संरक्षण की पुष्टि होती है तो कार्रवाई केवल मौके पर पैसा लेने वाले व्यक्ति तक सीमित न रहे।
सवाल यह है कि जब विभागीय नियम निजी व्यक्तियों को चेकिंग में शामिल होने की अनुमति नहीं देते, तब कथित प्राइवेट कटर्स अलग-अलग चेकिंग पॉइंटों पर किस हैसियत से सक्रिय दिखाई देते हैं? क्या वे केवल दलाल हैं, क्या वे वाहन चालकों और कर्मचारियों के बीच अनधिकृत मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं, या कहीं उन्हें किसी स्तर पर संरक्षण मिलता है? इन सवालों का जवाब अनुमान से नहीं, बल्कि मौके की जांच, सीसीटीवी और बॉडी कैमरा फुटेज, ड्यूटी रोस्टर, डिजिटल भुगतान के रिकॉर्ड तथा संबंधित कर्मचारियों के बयानों से सामने आना चाहिए।
विभागीय कार्रवाई हुई, लेकिन समस्या खत्म होने का प्रमाण कहां?
परिवहन विभाग में शिकायतों के बाद कार्रवाई के उदाहरण भी सामने आए हैं। फरवरी 2026 में विधानसभा में दिए गए जवाब के अनुसार, पिछले एक साल में शिकायतों के आधार पर एक परिवहन निरीक्षक, तीन परिवहन उप निरीक्षक और दो प्रधान आरक्षकों को चेक पॉइंट से हटाकर मुख्यालय अटैच किया गया तथा विभागीय जांच की गई। इसके अतिरिक्त एक प्रधान आरक्षक और दो परिवहन आरक्षकों को निलंबित कर मुख्यालय अटैच किया गया था।
यह कार्रवाई बताती है कि शिकायतों को पूरी तरह निराधार नहीं माना जा सकता। लेकिन इससे यह निष्कर्ष भी नहीं निकाला जा सकता कि हर चेकिंग पॉइंट पर वसूली हो रही है या हर संबंधित कर्मचारी दोषी है। असली सवाल यह है कि कार्रवाई के बाद व्यवस्था में कितना सुधार हुआ, क्या दोषियों की जिम्मेदारी अंतिम रूप से तय हुई और क्या उन्हीं स्थानों पर दोबारा ऐसी शिकायतें आईं? केवल कर्मचारियों को हटाना या निलंबित करना पर्याप्त नहीं, यदि कथित अवैध वसूली का तरीका और नेटवर्क बना रहता है।
नयागांव चेकिंग पॉइंट को लेकर जुलाई 2026 में AIMTC ने शिकायत उठाई थी। सितंबर 2026 में भी वहां कथित वसूली को लेकर नए आरोप प्रकाशित हुए। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित पक्षों का जवाब जरूरी है, लेकिन बार-बार शिकायतें सामने आना निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल जरूर खड़ा करता है।
हर वायरल वीडियो सच्चाई नहीं, लेकिन हर शिकायत को दबाया भी नहीं जा सकता
इस पूरे विवाद का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। वाहन चेकिंग के दौरान किसी चालक के पास वैध दस्तावेज न होना, परमिट या कर संबंधी गड़बड़ी, ओवरलोडिंग अथवा दूसरे नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर नियमानुसार चालान किया जा सकता है। यदि किसी वाहन चालक पर पहले से चालान लंबित हैं या वह मौजूदा कार्रवाई से बचना चाहता है, तो उसके विरोध और वायरल वीडियो की पृष्ठभूमि की जांच भी जरूरी है। जैसा कि गुजरात- मध्यप्रदेश बोर्डर पर स्थित पिटौल चेकप्वाइंट पर हुआ, जमकर हुए वायरल वीडियो में ₹500-₹500 वसूली के आरोप की सच्चाई यह निकली कि उस वाहन चालक ₹1.30 लाख का चलन बकाया था।
फरवरी 2026 में मऊगंज के हनुमना चेकिंग पॉइंट पर दस्तावेज मांगने के बाद विवाद, विरोध और आगजनी की घटना सामने आई थी। इस मामले में दोनों ट्रक चालकों और एक अन्य व्यक्ति के खिलाफ प्रकरण दर्ज होने की खबर आई। दूसरी तरफ चालकों ने अवैध वसूली के आरोप लगाए, जबकि विभागीय पक्ष ने मोटरयान और कराधान कानूनों के तहत कार्रवाई की बात कही। इस घटना से स्पष्ट है कि केवल वायरल वीडियो का एक हिस्सा देखकर पूरी घटना का फैसला करना उचित नहीं होगा; दस्तावेज, चालान, घटनाक्रम और दोनों पक्षों के बयान भी जांचे जाने चाहिए।
इसलिए ट्रांसपोर्ट कमिश्नर के सामने चुनौती दोहरी है। पहली, यदि कोई निजी व्यक्ति वाहन चालक से नियमों के बाहर पैसा मांगता है तो उसके विरुद्ध तत्काल और निष्पक्ष कार्रवाई हो। दूसरी, यदि कोई चालक वैधानिक जांच में बाधा डालता है, हंगामा करता है या गलत जानकारी के आधार पर विभाग को बदनाम करने का प्रयास करता है, तो उसके मामले में भी कानून के अनुसार कार्रवाई हो। किसी भी पक्ष को केवल उसके पद, वर्दी या वायरल वीडियो के आधार पर सही अथवा गलत घोषित नहीं किया जा सकता।
नयागांव से हनुमना तक, कई चेकिंग पॉइंट सवालों के घेरे में
मध्य प्रदेश के परिवहन चेकिंग पॉइंटों पर कथित अवैध वसूली और निजी व्यक्तियों की भूमिका को लेकर सामने आई शिकायतों में नीमच का नयागांव, मऊगंज का हनुमना, आगर मालवा का सोयत और बड़वानी का बालसमुंद प्रमुख रूप से चर्चा में रहे हैं। नयागांव में स्टिंग वीडियो के बाद विभागीय कार्रवाई हुई, जबकि हनुमना में कथित वसूली के आरोपों के बीच वाहन जांच के दौरान विवाद और आगजनी की घटना सामने आई। सोयत और बालसमुंद को लेकर भी ट्रांसपोर्ट संगठनों ने शिकायतें उठाई हैं। इन घटनाओं से यह सवाल उठता है कि परिवहन चेकिंग की निगरानी, निजी व्यक्तियों की भूमिका और शिकायतों के निस्तारण की व्यवस्था कितनी प्रभावी है। भिंड में भी वाहन चालकों से बंधी की रकम लोकल पर्ची के माध्यम से लेने के लगातार आरोप सामने आ रहे हैं, इसके प्रमाण युग क्रांति के पास है।
हालांकि, प्रत्येक स्थान पर आरोपों की पुष्टि, वर्तमान स्थिति और विभागीय जांच के निष्कर्ष अलग-अलग सत्यापित किए जाने जरूरी हैं।
अब जरूरी है जवाबदेही की वास्तविक परीक्षा
मध्य प्रदेश के परिवहन विभाग को चेकिंग पॉइंटों पर ऐसी व्यवस्था स्थापित करनी होगी, जिसमें वाहन रोकने का कारण दर्ज हो, जांच करने वाले कर्मचारी की पहचान स्पष्ट हो, चालान की कार्रवाई डिजिटल रिकॉर्ड में उपलब्ध हो और किसी भी प्रकार की वैधानिक राशि का भुगतान निर्धारित सरकारी माध्यम से ही किया जाए। निजी व्यक्ति यदि चेकिंग में दखल देता है, तो उसकी भूमिका की जांच हो। साथ ही, चालकों की शिकायतों और कर्मचारियों के विरुद्ध आरोपों की जांच समयबद्ध तरीके से पूरी की जाए।
ट्रांसपोर्ट कमिश्नर की सख्ती का वास्तविक मूल्यांकन आदेशों की संख्या से नहीं, बल्कि इस बात से होगा कि चेकिंग पॉइंटों पर अनधिकृत वसूली की गुंजाइश कितनी कम हुई। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई केवल निचले स्तर तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। और यदि कोई आरोप जांच में गलत पाया जाता है, तो विभाग को वह तथ्य भी सार्वजनिक करना चाहिए।
