इंदौरआबकारी विभाग की जांच और कार्रवाई पर उठे गंभीर सवाल
भोपाल/इंदौर। तुलसी नगर में संचालित अवैध शराब फैक्ट्री पर कार्रवाई के दिन सहायक आबकारी अधिकारी अभिषेक तिवारी मीडिया के सामने कारखाने के तार अंतर-राज्यीय शराब तस्करी गिरोह से जुड़े होना बताते हुए इसके तार केवल इंदौर तक सीमित नहीं हैं, बल्कि दूसरे राज्यों तक फैले होने का दावा कर रहे थे, तो वहीं आबकारी नियंत्रक एवं उप नियंत्रक पूरे शराब सिंडिकेट, उसकी सप्लाई चेन, वितरण नेटवर्क और आर्थिक लेन-देन की तह तक पहुंचने की बात कही थी। लेकिन कुछ ही दिनों में विभाग के दावे हवा होते नजर आने लगे हैं।
हैरानी की बात यह है कि जिन अधिकारियों ने करोड़ों रुपये के अवैध कारोबार और अंतरराज्यीय नेटवर्क का दावा किया था, वही अधिकारी अब मामले से जुड़े बुनियादी सवालों पर चुप्पी साधे हुए हैं। जांच अधिकारी न तो एफआईआर उपलब्ध करा रहे हैं और न ही जांच की दिशा को लेकर स्पष्ट जानकारी दे रहे हैं। इससे यह संदेह गहराता जा रहा है कि कहीं जांच को जानबूझकर सीमित तो नहीं किया जा रहा। पूरे मामले में जांच अधिकारी से आबकारी आयुक्त तक की यह खामोशी “दाल में कुछ काला नहीं_ बल्कि पूरी दाल काली” होने का संकेत दे रही है!
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मामले को अंतरराज्यीय शराब सिंडिकेट से जुड़ा बताया गया, उसमें अब तक केवल एक ही आरोपी क्यों बनाया गया? सूत्रों के अनुसार, कोर्ट में पेशी के बाद मुख्य आरोपी विनोद बिना किसी विशेष बाधा के जमानत पर रिहा हो गया। यदि मामला वास्तव में इतना गंभीर था, तो आरोपी का इतनी आसानी से जमानत पा जाना विभागीय विवेचना, अभियोजन और कानूनी तैयारी—तीनों पर सवाल खड़े करता है।
सूत्रों के अनुसार 25-26 जून की दरमियानी रात कलेक्टर के निर्देश पर इंदौर के तुलसी नगर स्थित अवैध शराब फैक्ट्री पर कार्रवाई को इसी कॉलोनी के निवासी आबकारी नियंत्रक देवेश चतुर्वेदी इसे अपना सर्चिंग ऑपरेशन बता रहे हैं। लेकिन जांच की दिशा पर उठ रहे सवालों का कोई जवाब देने को तैयार नहीं है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि “दाल में कुछ काला नहीं, बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आ रही है।”
विभागीय उत्तर की प्रतीक्षा में दम तोड़ते सवाल
जांच अधिकारी/उप निरीक्षक सुनील मालवीय का कहना है कि आरोपी के विरुद्ध आबकारी अधिनियम की धारा 34(1)(क), 34(2) एवं 49(क) के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है। लेकिन यदि वास्तव में ये धाराएं लगाई गई हैं तो एफआईआर सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट क्यों है? कानूनी जानकारों का मानना है कि यदि धारा 49(क) प्रभावी रूप से लगाई गई है, तो आरोपी को इतनी शीघ्र जमानत मिलना कई गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
इतना ही नहीं, यदि विभाग का दावा था कि यह एक बड़े नेटवर्क का मामला है, तो मुख्य आरोपी की पुलिस रिमांड क्यों नहीं ली गई, अथवा यदि ली गई तो उससे क्या महत्वपूर्ण खुलासे हुए? यदि आरोपी से पूछताछ हुई, तो उसके निशानदेही पर अब तक कितनी गिरफ्तारियां हुईं और पूरे नेटवर्क तक जांच क्यों नहीं पहुंची? यदि कोई खुलासे हुए हैं, तो उन्हें सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
विभाग के सामने बड़े सवाल
अब इस पूरे मामले में जांच अधिकारी सुनील मालवीय और आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने कई ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब जनता जानना चाहती है—
- क्या मुख्य आरोपी की पुलिस रिमांड ली गई थी? यदि हां, तो उससे क्या खुलासे हुए?
- अवैध शराब बनाने में इस्तेमाल होने वाली स्पिरिट कहां से आई और उसे सप्लाई करने वाले व्यक्ति पर क्या कार्रवाई हुई?
- लेबल छापने वाले, बोतल और ढक्कन उपलब्ध कराने वाले तथा तैयार शराब खपाने वाले नेटवर्क के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई? क्या उन्हें आरोपी बनाया गया?
- जब विभाग स्वयं अंतरराज्यीय शराब सिंडिकेट की बात कर रहा था, तो पूरे मामले में सिर्फ एक ही आरोपी कैसे रह गया?
- आरोपी के विरुद्ध वास्तव में कौन-कौन सी धाराएं लगाई गई हैं? क्या धारा 34(2) और 49(क) प्रभावी रूप से लागू की गई हैं? यदि हां, तो जमानत इतनी आसानी से कैसे मिल गई?
- आरोपी अब तक कितनी अवैध शराब बनाने और बेचने की जानकारी दे चुका है? उस आधार पर आगे क्या कार्रवाई हुई?
- यदि अवैध शराब लंबे समय से बाजार में खप रही थी, तो उसे बेचने, खरीदने और सप्लाई करने वाले लोगों में से अब तक कितनों को आरोपी बनाया गया?
इन सवालों का जवाब इसलिए भी जरूरी है क्योंकि यदि विभाग के दावों के अनुसार यह अंतरराज्यीय नेटवर्क का मामला था, तो जांच केवल फैक्ट्री संचालक तक सीमित नहीं रह सकती। स्पिरिट सप्लायर से लेकर पैकेजिंग, लेबल प्रिंटिंग, परिवहन, वितरण और अवैध शराब खपाने वाले पूरे नेटवर्क तक कार्रवाई होना स्वाभाविक अपेक्षा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इस जांच को पूरी गंभीरता, पारदर्शिता और अंतिम छोर तक पहुंचाने से विभाग में किसे खतरा नजर आ रहा है? क्या जांच को जानबूझकर केवल एक आरोपी तक सीमित किया जा रहा है, ताकि पूरे सिंडिकेट पर पर्दा पड़ा रहे? जब तक विभाग इन सवालों के तथ्यात्मक और पारदर्शी जवाब नहीं देता, तब तक इस कार्रवाई की सफलता से अधिक उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहेंगे।
