अर्थव्यवस्था बढ़ी, बजट बढ़ा, अधोसंरचना का विस्तार हुआ… लेकिन बेरोजगारी, नशाखोरी, भ्रष्टाचार, अपराध और सामाजिक मूल्यों के मोर्चे पर सरकार को खुद से कुछ कठिन सवाल पूछने होंगे
बृजराज सिंह, 10 अगस्त 2026। मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की राजनीतिक यात्रा सामान्य राजनीतिक पृष्ठभूमि से अलग रही है। विद्यार्थी परिषद से छात्र राजनीति तक, विश्वविद्यालयीन नेतृत्व से लेकर राजनीतिक विज्ञान में शोध तक और उच्चशिक्षा मंत्री से मुख्यमंत्री तक की उनकी यात्रा में अध्ययन, संगठन और सार्वजनिक जीवन का लंबा अनुभव शामिल रहा है।
किसान परिवार और मध्यमवर्गीय सामाजिक परिवेश से आने वाले मुख्यमंत्री से इसलिए अपेक्षा भी सामान्य राजनीतिक अपेक्षा से कुछ अधिक है। क्योंकि जिस व्यक्ति ने राजनीति को केवल सत्ता के गलियारों से नहीं, बल्कि विद्यार्थी जीवन, संगठन, शिक्षा और अकादमिक अध्ययन के स्तर पर भी देखा हो, उससे यह उम्मीद स्वाभाविक है कि वह प्रदेश के विकास को केवल सकल घरेलू उत्पाद, सड़कों, पुलों और निवेश के आंकड़ों से नहीं मापेगा।
विकास का असली पैमाना यह भी है कि प्रदेश का युवा किस भविष्य की ओर देख रहा है, परिवार किस सामाजिक वातावरण में जी रहा है, किसान की आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत हुई है, आम आदमी सरकारी व्यवस्था में कितना भरोसा करता है और समाज के नैतिक मूल्य किस दिशा में जा रहे हैं। यही वह आईना है जिसे मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री के सामने रखने की जरूरत है।
आर्थिक विकास हुआ, लेकिन क्या विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचा?
पिछले दो दशकों में मध्य प्रदेश की अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ा है। गरीबी के पुराने आधिकारिक आंकड़ों में भी उल्लेखनीय कमी दिखाई देती है। राज्य की प्रति व्यक्ति आय और सकल राज्य घरेलू उत्पाद में भी बड़ा विस्तार हुआ है।लेकिन इसी के साथ एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—
क्या आर्थिक विकास की रफ्तार के अनुरूप गुणवत्तापूर्ण रोजगार भी पैदा हुआ?
कम बेरोजगारी दर को देखकर समस्या समाप्त मान लेना आसान है। लेकिन कृषि, स्वरोजगार और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की बड़ी संख्या के बीच यह देखना भी जरूरी है कि कितने युवाओं को स्थायी, सम्मानजनक और उनकी योग्यता के अनुरूप रोजगार मिला। विशेषकर उच्च शिक्षा प्राप्त युवाओं के सामने सरकारी नौकरी की सीमित संभावनाएं और निजी क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम अवसर एक अलग चुनौती हैं।
मुख्यमंत्री को प्रदेश की बेरोजगारी का आंकड़ा ही नहीं, रोजगार की गुणवत्ता का भी रिपोर्ट कार्ड देखना होगा।
नशे का बढ़ता प्रभाव—क्या आर्थिक विकास सामाजिक विकास की गारंटी है?
मध्य प्रदेश के सामने सबसे गंभीर सामाजिक चुनौतियों में से एक नशाखोरी है। शराब की खपत, अवैध मादक पदार्थों की उपलब्धता, युवाओं में नशे का बढ़ता प्रभाव और इसके साथ अपराध तथा पारिवारिक विघटन की आशंकाएं केवल कानून-व्यवस्था का विषय नहीं हैं। यह प्रदेश के सामाजिक स्वास्थ्य का प्रश्न है।
यदि एक ओर सरकार निवेश, उद्योग और आर्थिक विकास की बात कर रही है और दूसरी ओर प्रदेश की युवा पीढ़ी का एक हिस्सा नशे की गिरफ्त में जा रहा है, तो विकास की परिभाषा पर पुनर्विचार जरूरी है।
सवाल यह नहीं कि शराब से सरकार को कितना राजस्व मिला। सवाल यह है कि नशे की सामाजिक कीमत प्रदेश कितना चुका रहा है?
भ्रष्टाचार_सरकार की कार्रवाई पर्याप्त है या व्यवस्था में बदलाव जरूरी है?
लोकायुक्त, आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ और अन्य एजेंसियों की कार्रवाई समय-समय पर भ्रष्टाचार के मामलों को सामने लाती रही है। लेकिन यहां भी एक बुनियादी सवाल है—क्या भ्रष्टाचार के कुछ अधिकारियों को पकड़ लेना पर्याप्त है, या ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिसमें भ्रष्टाचार करने की गुंजाइश ही कम हो जाए?
निर्माण कार्य, सरकारी खरीद, स्थानांतरण, पदस्थापन, परमिशन, ठेके, स्थानीय निकाय, राजस्व और अन्य विभागों में भ्रष्टाचार की शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं।मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के लिए चुनौती केवल भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार के अवसरों को समाप्त करना है।
अपराध का आंकड़ा केवल पुलिस का नहीं, समाज का रिपोर्ट कार्ड भी है
महिलाओं, बच्चों और कमजोर वर्गों के विरुद्ध अपराध के आंकड़े किसी भी सरकार के लिए गंभीर चिंता का विषय होने चाहिए। कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल अपराध होने के बाद एफआईआर और गिरफ्तारी नहीं है।
एक संवेदनशील शासन व्यवस्था का लक्ष्य यह होना चाहिए कि अपराध होने से पहले सामाजिक और प्रशासनिक तंत्र उन परिस्थितियों को पहचान सके जिनसे अपराध पैदा होते हैं।क्या मध्य प्रदेश में पुलिस व्यवस्था मजबूत होने के साथ सामाजिक सुरक्षा का भाव भी मजबूत हुआ है? यह प्रश्न सरकार को अपने स्तर पर पूछना होगा।
मुख्यमंत्री की असली परीक्षा—मध्य प्रदेश के नैतिक मूल्यों को मजबूत करना
मध्य प्रदेश का विकास केवल एक्सप्रेस-वे, मेडिकल कॉलेज, उद्योग, निवेश और जीडीपी से नहीं होगा। विकास तब पूर्ण माना जाएगा जब—
- युवा नशे के बजाय रोजगार और नवाचार की ओर जाए;
- किसान कर्ज और अनिश्चितता के बजाय स्थिर आय की ओर बढ़े;
- सरकारी कार्यालय में काम कराने के लिए सिफारिश और रिश्वत की जरूरत न पड़े;
- महिलाएं और बच्चे सुरक्षित महसूस करें;
- शिक्षा केवल डिग्री नहीं, चरित्र और क्षमता निर्माण का माध्यम बने;
- गरीब व्यक्ति सरकारी योजना को अधिकार समझकर प्राप्त कर सके;
- मध्यमवर्ग महंगाई और रोजगार की चिंता से बाहर निकल सके;
- और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी फिर से प्रतिष्ठा का विषय बने।
मोहन यादव के सामने सबसे बड़ा अवसर
डॉ. मोहन यादव के पास इस समय केवल मुख्यमंत्री का पद नहीं है। उनके पास एक ऐसी राजनीतिक पृष्ठभूमि है जिसमें विद्यार्थी जीवन, संगठन, शिक्षा, अकादमिक अध्ययन, किसान परिवार और मध्यवर्गीय सामाजिक अनुभव एक साथ जुड़े हैं। इसलिए उनसे अपेक्षा भी यही है कि वे मध्य प्रदेश के विकास का अगला मॉडल केवल आर्थिक आंकड़ों से नहीं, बल्कि आर्थिक + सामाजिक + नैतिक + मानवीय विकास के चारों स्तंभों पर खड़ा करें।
मुख्यमंत्री यदि मध्य प्रदेश को अगले दशक में देश के अग्रणी राज्यों में देखना चाहते हैं, तो अब समय केवल नई योजनाओं की घोषणा का नहीं है। समय है पुराने सवालों का कठोर मूल्यांकन करने का_
कहां सरकार सफल हुई?
कहां असफल हुई?
कहां आंकड़े बेहतर हैं लेकिन जमीन की तस्वीर अलग है?
और कहां ऐसी समस्या पैदा हो रही है जो अगले दस वर्षों में प्रदेश के भविष्य के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है?
यही आत्ममंथन मध्य प्रदेश को वास्तव में विकसित राज्य बनाने की दिशा में अगला कदम हो सकता है। मोहन जी, मध्य प्रदेश को सिर्फ तेज विकास नहीं चाहिए बल्कि उसे सही दिशा में विकास चाहिए। और इस दिशा का फैसला आंकड़े नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का जीवन करेगा।
