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भोपाल की सीलिंग पर सुप्रीम कोर्ट सख्त: दिन में सील, रात में खुलती दुकानें तो कार्रवाई किस बात की?

मास्टर प्लान की आड़ में मौजूदा अवैधता को संरक्षण नहीं_शासन ने सीलिंग में हस्तक्षेप न करने का दिया आश्वासन, उच्चस्तरीय समिति भी वापस

भोपाल। आवासीय क्षेत्रों में व्यावसायिक गतिविधियों और अवैध निर्माण के खिलाफ भोपाल नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई अब सीधे सुप्रीम कोर्ट की निगरानी के दायरे में है। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और आर. महादेवन की पीठ के समक्ष भोपाल में कार्रवाई की प्रभावशीलता, पहले सील किए गए परिसरों की सील हटाए जाने और राज्य सरकार द्वारा बनाई गई उच्चस्तरीय समिति का मुद्दा पहले ही गंभीरता से उठ चुका है। न्यायालय के 5 अगस्त के आदेश में दर्ज है कि भोपाल नगर निगम ने करीब 100 परिसरों को सील किया था, लेकिन बाद में उन्हीं परिसरों की सील हटाए जाने की बात सामने आई थी।

अब रहवासियों की ओर से यह सवाल उठाया जा रहा है कि यदि किसी परिसर को दिन में सील किया जाता है और रात में वहां फिर व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं, तो ऐसी सीलिंग का वास्तविक उद्देश्य क्या रह जाता है?

सिर्फ सील की फोटो नहीं, जमीन पर दिखे कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता अजीत कुमार सिन्हा की ओर से भोपाल सहित भवन नियमों और आवासीय संपत्तियों के व्यावसायिक उपयोग से जुड़े मामलों में अनुपालन की स्थिति रखी गई है। न्यायालय के रिकॉर्ड में भोपाल के संबंध में नोटिस, सीलिंग तथा बाद में सील हटाए जाने का मुद्दा दर्ज है।

रहवासी प्रतिनिधि एवं याचिका कर्ता विवेक त्रिपाठी का कहना है कि केवल सील लगाने की कार्रवाई की तस्वीरें खींचना पर्याप्त नहीं है। यदि सील किए गए परिसर दोबारा खुल जाते हैं तो निगरानी और अमल की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं।

त्रिपाठी का कहना है कि कानून का आधार यह होना चाहिए कि किस भूखंड का लैंड यूज क्या है, भवन अनुज्ञा में क्या स्वीकृत है और मौके पर वास्तविक उपयोग क्या हो रहा है। जहां आवासीय भूखंड का गंभीर और पूर्ण व्यावसायिक उपयोग हो रहा है तथा स्वीकृत मानचित्र और भवन अनुज्ञा का उल्लंघन है, वहां नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए।

बड़े अवैध कारोबार और छोटे व्यापारियों के बीच फर्क जरूरी

लवनिश भाटी ने कहा कि कार्रवाई का उद्देश्य केवल अधिक से अधिक दुकानों को सील करके आंकड़े बढ़ाना नहीं होना चाहिए। उनका कहना है कि प्रशासन को उन मामलों पर विशेष ध्यान देना चाहिए जहां आवासीय भूखंडों का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग हो रहा है और भवन अनुज्ञा तथा निर्धारित भू-उपयोग का गंभीर उल्लंघन है।

विवेक त्रिपाठी के अनुसार, कानून सबके लिए समान होना चाहिए। उनका आरोप है कि कार्रवाई में छोटे व्यापारियों को निशाना बनाने के बजाय बड़े और गंभीर उल्लंघनों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

यह बहस ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब भोपाल नगर निगम की कार्रवाई के दौरान हजारों नोटिस जारी किए जाने और बड़ी संख्या में प्रतिष्ठानों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट सामने आई है। विभिन्न रिपोर्टों में नोटिस और सील किए गए प्रतिष्ठानों के आंकड़ों में अंतर भी सामने आया है, इसलिए आधिकारिक आंकड़ों को ही अंतिम आधार माना जाना चाहिए।

नया मास्टर प्लान पुराने उल्लंघनों की ढाल नहीं

भोपाल के प्रस्तावित मास्टर प्लान को लेकर भी मामला महत्वपूर्ण है। राज्य सरकार की ओर से मास्टर प्लान से जुड़ी समस्याओं को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने की बात पहले सामने आ चुकी है। रहवासी पक्ष का कहना है कि भविष्य में नियम बदलने या भू-उपयोग की नई व्यवस्था प्रस्तावित होने का अर्थ यह नहीं हो सकता कि वर्तमान में लागू नियमों, स्वीकृत भवन मानचित्र या मौजूदा भू-उपयोग का उल्लंघन स्वतः वैध हो जाए।

सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों में भी भवन नियमों, अनधिकृत निर्माण और भू-उपयोग उल्लंघन के मामलों में तत्काल और प्रभावी कार्रवाई, जिसमें सीलिंग या विध्वंस जैसी कार्रवाई भी कानून के अनुसार शामिल हो सकती है, पर जोर दिया गया है।

सरकार की समिति पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए थे सवाल

भोपाल सीलिंग मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम 2 अगस्त 2026 को सामने आया था, जब मध्य प्रदेश सरकार ने 10 सदस्यीय उच्चस्तरीय समिति गठित की थी। सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त की सुनवाई में इस प्रशासनिक आदेश को तत्काल प्रभाव से स्थगित करते हुए समिति गठन से संबंधित मूल फाइलें तलब की थीं। न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि प्रशासनिक समिति के माध्यम से उसके निर्देशों के अनुपालन को रोका नहीं जा सकता। इसके बाद राज्य सरकार को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए समय दिया गया था।

अब राज्य सरकार की ओर से यह आश्वासन दिए जाने की बात सामने आई है कि नगर निगम की सीलिंग कार्रवाई में शासन की ओर से हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा और विवादित उच्चस्तरीय समिति को वापस ले लिया गया है।

रहवासियों का कहना है कि यदि यह स्थिति है तो अब कार्रवाई की वास्तविक परीक्षा मैदान में होगी—कितने गंभीर अवैध भू-उपयोग मामलों की जांच होती है, कितने मामलों में कार्रवाई अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचती है और सील किए गए परिसरों पर दोबारा गतिविधियां रोकने के लिए क्या निगरानी व्यवस्था बनाई जाती है।

भोपाल के रहवासियों की मांग—हर शिकायत की हो निष्पक्ष जांच

रहवासियों ने मांग की है कि अरेरा कॉलोनी सहित भोपाल के सभी आवासीय क्षेत्रों में शिकायतों की मौके पर जांच कराई जाए। प्रत्येक मामले में भवन अनुज्ञा, स्वीकृत मानचित्र, वास्तविक निर्माण, भू-उपयोग और संचालित व्यावसायिक गतिविधि का मिलान किया जाए। उनका कहना है कि जहां उल्लंघन प्रमाणित हो वहां कानून के अनुसार समान कार्रवाई हो, चाहे संबंधित परिसर छोटा हो या बड़ा।

भोपाल में अब सवाल यह नहीं है कि कितनी दुकानों पर सील लगी—सवाल यह है कि कितनी अवैध गतिविधियां वास्तव में बंद हुईं और कितनी सीलें कायम रहीं। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और नगर निगम की कार्रवाई की विश्वसनीयता का असली पैमाना यही होगा।