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100 साल की संघ पाठशाला के सामने चरित्र और समाज निर्माण की बड़ी चुनौती

संघ से भाजपा तक पहुंचे नेताओं के आचरण पर सवाल, लाखों स्वयंसेवकों की सामाजिक भूमिका के बावजूद बढ़ते वर्ग-संघर्ष पर भी मंथन जरूरी

भोपाल। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को विशेष रूप से व्यक्तित्व निर्माण और चरित्र निर्माण की पाठशाला  माना जाता है। संघ अपने गठन के 100 वर्ष पूरे कर चुका है और देशभर में शताब्दी वर्ष के कार्यक्रम चल रहे हैं। संघ पृष्ठभूमि के अनेक नेता आज भाजपा शासित 16+ राज्यों की सत्ता में हैं और केंद्र सहित भाजपा शासित सभी राज्यों में महत्वपूर्ण पदों पर बैठे हुए हैं। देश के मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या सत्ता की राजनीति में प्रवेश के लिए संघ की पृष्ठभूमि अब एक तरह का ‘एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया’ बनती जा रही है?

संघ से जुड़े करीब 32 प्रमुख अनुसांगिक संगठन के माध्यम से लाखों स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में अपनी-अपनी महत्वपूर्ण एवं सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। कोई शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय है तो कोई श्रमिक, किसान, विद्यार्थी, सामाजिक सेवा, संस्कृति और समाज निर्माण के क्षेत्र में काम कर रहा है। ऐसे में संघ के 100 वर्ष पूरे होने का अवसर केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर भी माना जा सकता है।

100 साल की पाठशाला, फिर ये सवाल क्यों?

संघ से भाजपा में पहुंचे कितने नेताओं का व्यक्तित्व और चरित्र वास्तव में वैसा है, जैसा संघ की पाठशाला में निर्माण का दावा किया जाता है? यदि वैसा ही है, जैसा निर्माण संघ ने किया है, तो फिर इस पाठशाला की गुणवत्ता क्या और कैसी है—यह जनता भली-भांति देख रही है।

और यदि संघ से निकले नेता सत्ता में पहुंचने के बाद सीखा हुआ सब भूल जाते हैं, तो सवाल और भी गंभीर हो जाता है। आखिर 100 साल पुरानी व्यक्तित्व एवं चरित्र निर्माण की यह प्रक्रिया इतनी कमजोर और उथली क्यों है कि सत्ता के प्रभाव के सामने उसका असर समाप्त हो जाए? आखिर सत्ता में पहुंचने के बाद आचरण बदलने और मूल संस्कारों से विचलन की स्थिति पैदा कैसे हो जाती है?

यह सवाल किसी एक नेता या किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी विचारधारा और प्रशिक्षण व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जिसे व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण की पाठशाला के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।

समाज निर्माण के दावों के बीच बढ़ता सामाजिक संघर्ष

एक दूसरा बड़ा सवाल भी संघ के सामने है। जब संघ के लाखों स्वयंसेवक देश के अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार सामाजिक समरसता, समाज निर्माण, सहिष्णुता और सेवा जैसे गंभीर एवं महत्वपूर्ण विषयों पर काम कर रहे हैं, तो फिर मध्य प्रदेश सहित देश के तमाम हिस्से किस दिशा में जा रहे हैं?

सामाजिक और वर्गीय तनाव, आपसी अविश्वास तथा विभाजन की घटनाएं लगातार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन रही हैं। ऐसे माहौल में यह संघ के लिए गहन चिंतन और उस चिंतन पर प्रभावी ढंग से अमल का विषय होना चाहिए कि जमीनी स्तर पर वर्षों से चल रहे समाज निर्माण के प्रयासों का व्यापक सामाजिक वातावरण पर अपेक्षित प्रभाव क्यों दिखाई नहीं दे रहा है।

शताब्दी के बाद ‘पंच परिवर्तन’ की चुनौती

हालांकि स्वयंसेवकों की मानें तो संघ के भीतर इन परिस्थितियों को लेकर चिंता है और शताब्दी वर्ष के बाद इसी दिशा में रणनीति पर काम की प्रक्रिया तेज होने जा रही है। संघ ने इसके लिए ‘पंच परिवर्तन’ की अवधारणा को आगे बढ़ाने की बात कही है।

अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि 100 वर्षों में संघ ने कितने स्वयंसेवक तैयार किए, कितने संगठन खड़े किए या कितने लोग सत्ता के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचे। असली सवाल यह है कि व्यक्तित्व और चरित्र निर्माण की इस 100 साल पुरानी पाठशाला का प्रभाव समाज और सत्ता के आचरण में कितना दिखाई देता है? शताब्दी वर्ष के बाद शुरू होने वाला ‘पंच परिवर्तन‘ इसी कसौटी पर संघ के लिए सबसे बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।