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“क्या MPRDC मुख्यालय ‘नो एंट्री ज़ोन’ है? अधिकारी की अनुमति के बिना अधिमान्य पत्रकार तक नहीं कर सकते प्रवेश”

ठेकेदारों, शिकायतकर्ताओं और आम नागरिकों के लिए अफसरों तक पहुंच मुश्किल; क्या यह व्यवस्था पारदर्शिता के अनुरूप है?

भोपाल। म प्र सड़क विकास निगम (MPRDC) का भोपाल स्थित मुख्यालय आखिर किस श्रेणी का सरकारी कार्यालय है? क्या यह कोई सुरक्षा एजेंसी, रक्षा प्रतिष्ठान या संवेदनशील खुफिया संस्थान है, जहां आम नागरिक तो दूर, अधिमान्य पत्रकारों को भी बिना संबंधित अधिकारी की अनुमति के प्रवेश नहीं दिया जाता?

एमपीआरडीसी मुख्यालय की वर्तमान प्रवेश व्यवस्था कई गंभीर सवाल खड़े करती है। यहां किसी भी व्यक्ति को सबसे पहले रिसेप्शन पर अपना पूरा परिचय देना होता है, फिर यह बताना पड़ता है कि किस अधिकारी से मिलना है और किस उद्देश्य से मिलना है। इसके बाद रिसेप्शन से संबंधित अधिकारी को फोन किया जाता है। यदि अधिकारी अनुमति दे, तभी आगंतुक को अंदर प्रवेश मिलता है; अन्यथा उसे लौटा दिया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रदेश के दूरदराज़ जिलों से अपनी समस्या लेकर आने वाला कोई ठेकेदार, शिकायतकर्ता या आम नागरिक आखिर वरिष्ठ अधिकारियों तक कैसे पहुंचे? स्वाभाविक है कि अधिकांश अधिकारी उसे व्यक्तिगत रूप से नहीं जानते होंगे। ऐसे में यदि अनुमति ही न मिले तो उसकी शिकायत कौन सुनेगा और उसे न्याय कैसे मिलेगा?

यह व्यवस्था केवल आम नागरिकों की पहुंच को सीमित नहीं करती, बल्कि सूचना प्राप्त करने और जनसुनवाई जैसी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। आलोचकों का कहना है कि यदि किसी सरकारी कार्यालय में अधिकारी तक पहुंच ही अधिकारी की इच्छा पर निर्भर हो जाए, तो जवाबदेही और पारदर्शिता का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इस व्यवस्था को “सूचना के अधिकार की हत्या” करने वाली कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगा!

हैरानी की बात यह है कि मध्य प्रदेश में राज्य और केंद्र सरकार के अधीन निर्माण कार्य करने वाली 175 से अधिक विभाग, निगम और संस्थान कार्यरत हैं, लेकिन इस प्रकार की प्रतिबंधात्मक प्रवेश व्यवस्था विरले ही देखने को मिलती है। सामान्यतः सरकारी कार्यालयों में आगंतुक पर्ची बनवाकर संबंधित शाखा या जनसुनवाई कक्ष तक पहुंच सकते हैं, जबकि एमपीआरडीसी में पूरी प्रक्रिया अधिकारी की पूर्व स्वीकृति पर निर्भर दिखाई देती है।

एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी भरत यादव हैं, जिन्हें एक सक्षम और कुशल प्रशासक माना जाता है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह प्रवेश व्यवस्था उनकी जानकारी और स्वीकृति से संचालित हो रही है? यदि हां, तो इसका औचित्य क्या है? और यदि नहीं, तो क्या इस व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी?

अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या एमपीआरडीसी का मुख्यालय आम जनता की समस्याओं के समाधान के लिए खुला सरकारी कार्यालय है, या फिर ऐसा संस्थान जहां अधिकारियों तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन गया है? प्रदेश के ठेकेदार, शिकायतकर्ता, जनप्रतिनिधि और अधिमान्य पत्रकार यह जानना चाहते हैं कि आखिर ऐसी कौन-सी संवेदनशीलता है, जिसके कारण प्रवेश को इस हद तक नियंत्रित किया गया है।