युग क्रांति की चेतावनी बनी आदेश, हाईकोर्ट ने 30 दिन में चेक पोस्ट शुरू करने को कहा
भोपाल, बृजराज सिंह तोमर। नेक नियत और मजबूत इरादों का साथ देती है पूरी कायनात_यह पंक्ति अब मध्य प्रदेश की व्यवस्था में घटित एक सजीव उदाहरण बन चुकी है। युग क्रांति के संपादक बृजराज सिंह तोमर की चिंता में डूबी निरंतर अभिव्यक्ति, जमीनी हकीकत पर आधारित खुलासे और बेबाक पत्रकारिता आखिरकार न्यायपालिका तक पहुंची—और अब मध्य प्रदेश हाईकोर्ट, जबलपुर खंडपीठ ने सरकार को स्पष्ट आदेश दिया है कि प्रदेश के सभी आरटीओ चेक पोस्ट 30 दिनों के भीतर पुनः शुरू किए जाएं और इसकी रिपोर्ट कोर्ट में प्रस्तुत की जाए।
बात निकली… और दूर तलक गई
“बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी…”—ग़ज़ल की यह पंक्ति इस पूरे घटनाक्रम पर सटीक बैठती है। युग क्रांति ने जिस मुद्दे को गंभीरता से उठाया, वही चिंता अब अदालत के आदेश में दिखाई दे रही है।
लगातार प्रकाशित खबरों में युग क्रांति ने साफ चेताया था कि_ इंटीग्रेटेड चेक पोस्ट बंद करके गुजराती मॉडल लागू करने का निर्णय जल्दबाजी में लिया गया, किसी अन्य राज्य का मॉडल अपनाने के लिए जरूरी है दोनों राज्यों की प्रकृति, प्रवृत्ति और भौगोलिक समानता
नई व्यवस्था लागू करने से पहले न तकनीकी तैयारी हुई, न अमले का प्रशिक्षण
और यही जल्दबाजी अब व्यवस्था पर भारी पड़ती दिखी।
मुख्यमंत्री का निर्णय और जमीनी सच्चाई
जुलाई 2024 में मुख्यमंत्री ने प्रदेश के 45 आरटीओ चेक पोस्ट बंद कर दिए थे। इस निर्णय के पीछे अवैध वसूली रोकने और परिवहन को सरल बनाने की मंशा बताई गई थी। केंद्रीय मंत्री भी पूर्व में इन चेक पोस्टों को “वसूली के अड्डे” बता चुके थे।
लेकिन युग क्रांति ने अपने खुलासों में पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि_ “यदि पारदर्शिता और राजस्व बढ़ाना लक्ष्य है, तो केवल प्रयोग नहीं, बल्कि जड़ से सुधार आवश्यकता है _चाहे इसके लिए संशोधित रूप में पुरानी व्यवस्था को ही क्यों न लागू करना पड़े।अन्यथा नई व्यवस्था भी उसी अंधेरे का हिस्सा बन जाएगी।”
जो युग क्रांति ने लिखा, वही अदालत में मुद्दा बना
युग क्रांति की रिपोर्टिंग में जिन बिंदुओं को लगातार उठाया गया, वही अब जनहित याचिका में मुख्य आधार बने—
- चेक पोस्ट बंद होने के बाद ओवरलोडिंग बेलगाम
- वाहनों की फिटनेस की अनदेखी
- मनमानी स्पीड और नियमों की धज्जियां
- सड़क दुर्घटनाओं में बढ़ोतरी
याचिकाकर्ता रजनीश त्रिपाठी ने इन्हीं तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने फैसला सुनाया।
जस्टिस विशाल मिश्रा की अदालत ने स्पष्ट कहा—
* 30 दिनों के भीतर सभी चेक पोस्ट पुनः चालू किए जाएं
* सरकार इसकी रिपोर्ट कोर्ट में पेश करे
एडवोकेट भानु प्रकाश विश्वकर्मा के अनुसार, यदि आदेश का पालन नहीं हुआ तो मामला पुनः कोर्ट में उठेगा।
“गुजरात मॉडल” की जमीनी हकीकत उजागर
युग क्रांति ने अपने खुलासों में नई व्यवस्था को लेकर जो सवाल उठाए थे, वे अब सच साबित होते दिखे—
* तकनीकी ढांचा अधूरा, * वाहन चेकिंग के लिए पर्याप्त स्थान की कमी, * वेजब्रिज (वजन जांच) का अभाव *पुलिस की अनुपस्थिति * फील्ड में असुरक्षा और अव्यवस्था *काले अतीत की परछाई
नतीजा यह हुआ कि कई जिलों में— परिवहन कर्मियों के साथ गाली-गलौज, हाथापाई, चक्का जाम, आगजनी,
दलालों और अराजक तत्वों की सक्रियता। यानी नियंत्रण हटते ही सिस्टम अराजकता की ओर बढ़ गया।
युग क्रांति ने अपने मंच से: हर चेक पोस्ट पर वजन और ऊंचाई मापने वाले वेजब्रिज, चेकिंग के दौरान स्थायी पुलिस तैनाती, शासकीय कार्य में बाधा डालने वालों पर तत्काल कार्रवाई जैसे स्पष्ट सुझाव भी दिए।
काले अतीत की परछाईं अब भी मौजूद
2019 से 2023 के बीच चेक पोस्टों पर जो “सिंडिकेट राज” चला, उसने व्यवस्था की जड़ों को कमजोर किया। यद्यपि परिवहन आयुक्त की कार्यशैली में बेहतरीन पुलिसिंग और विभागीय अनुभव शामिल है, मगर फिर भी पारदर्शिता के साथ नए सिरे से चेक पोस्टों की सुचारु व्यवस्था के क्रम में विभाग के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती है।
- अवैध वसूली
- राजनीतिक संरक्षण
- कथित पत्रकार/यूट्यूबर की भूमिका
यह वही दौर था जिसने सिस्टम को भीतर तक खोखला किया और आज भी उसके अवशेष चुनौती बने हुए हैं।
अब सरकार के सामने असली परीक्षा है। चेक पोस्ट फिर शुरू करना एक आदेश है, लेकिन उन्हें पारदर्शी, सुरक्षित और प्रभावी बनाना असली चुनौती है। परिवहन आयुक्त उमेश जोगा के सामने अब यह दोहरी जिम्मेदारी है_पुरानी गलतियों को दोहराने से बचना और व्यवस्था को सख्ती के साथ पटरी पर लाना
जब पत्रकारिता नियति बन जाए
यह पूरा घटनाक्रम इस बात का प्रमाण है कि यदि पत्रकारिता निरंतर, निर्भीक और जनहित में हो तथा यदि उसमें “नेक नियत” और “साहस” हो तो उसकी गूंज सिर्फ खबरों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि न्यायपालिका तक पहुंचकर व्यवस्था बदलने का कारण बनती है।
युग क्रांति की यह पहल अब एक उदाहरण है_जहां एक आवाज़ ने सवाल उठाया, चेताया, समाधान दिया… और अंततः वही आवाज़ हाईकोर्ट के आदेश के रूप में गूंज उठी।
