ब्रेकिंग

आबकारी विभाग में मनोज अग्रवाल के हाथों में चार-चार जिम्मेदारियां, गुजरात रूट की निगरानी भी उन्हीं के भरोसे!

आंतरिक-1 सर्किल में ADEO और उपनिरीक्षक दोनों का प्रभार एक ही अधिकारी के पास; राजमोहल्ला सर्किल के ADEO और डिप्टी कंट्रोलर की जिम्मेदारी भी संभाल रहे मनोज, आखिर क्यों नहीं हुई उपनिरीक्षक की नियमित पदस्थापना?

इंदौर। मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में अधिकारियों की पदस्थापना और जिम्मेदारियों के बंटवारे का एक ऐसा मामला सामने आया है, जो विभागीय कार्यप्रणाली के साथ अवैध मदिरा परिवहन पर निगरानी की व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा करता है। इंदौर में गुजरात की ओर जाने वाला महत्वपूर्ण बाईपास मार्ग आंतरिक-1 सर्किल के अंतर्गत आता है। खातेगांव थाना प्रभारी हत्याकांड के बाद अवैध शराब के परिवहन से जुड़े संवेदनशील मार्गों पर सशक्त निगरानी की आवश्यकता और अधिक बढ़ गई है, लेकिन इसी महत्वपूर्ण सर्किल में आबकारी विभाग की चार जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी मनोज अग्रवाल के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दे रही हैं।

मनोज अग्रवाल के पास डिप्टी कंट्रोलर, राजमोहल्ला सर्किल के ADEO, आंतरिक-1 सर्किल के ADEO और इसी आंतरिक-1 सर्किल के उपनिरीक्षक का प्रभार भी है। यानी एक ही अधिकारी के पास दो सर्किलों की ADEO जिम्मेदारी, डिप्टी कंट्रोलर का महत्वपूर्ण पद और एक सर्किल में उपनिरीक्षक का दायित्व भी है। सवाल यह है कि आखिर आबकारी विभाग में ऐसी कौन सी प्रशासनिक मजबूरी है कि चार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां एक ही अधिकारी को सौंपकर व्यवस्था संचालित की जा रही है?

खातेगांव हत्याकांड के बाद गुजरात रूट की निगरानी कितनी प्रभावी?

खातेगांव थाना प्रभारी हत्याकांड ने अवैध शराब के कारोबार और उसके परिवहन से जुड़े नेटवर्क की गंभीरता को उजागर किया है। ऐसे घटनाक्रम के बाद उन मार्गों पर विशेष निगरानी की आवश्यकता है, जिनका इस्तेमाल अवैध मदिरा के परिवहन के लिए किया जा सकता है।

इंदौर बाईपास होकर गुजरात की ओर जाने वाला मार्ग भी इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह मार्ग आंतरिक-1 सर्किल के अधिकार क्षेत्र में आता है और इसकी आबकारी निगरानी का दायित्व मनोज अग्रवाल के पास है। ऐसे संवेदनशील मार्ग की निगरानी के लिए अलग से नियमित उपनिरीक्षक की पदस्थापना के बजाय ADEO मनोज अग्रवाल के पास ही उपनिरीक्षक का प्रभार बने रहना कई सवाल खड़े करता है।

बता दें कि देवास होकर आगरा से मुंबई जाने वाला महत्वपूर्ण national highway है और इंदौर bypass जिसका हिस्सा है , वहाँ पर सब इंस्पेक्टर की पदस्थापना न होना_ ये सवाल खड़ा करता है कि गुजरात लाइन की जो अवैध शराब गाड़ियाँ इंदौर बाईपास से निकलती हैं, उन पर प्रभावी नियंत्रण जानबूझकर ख़त्म कर दिया गया है?

जब मुख्यमंत्री और विभाग अवैध मदिरा परिवहन पर सख्ती तथा निगरानी बढ़ाने की बात कर रहे हैं, तब सवाल उठता है कि गुजरात की ओर जाने वाले इस महत्वपूर्ण मार्ग पर पर्याप्त मैदानी अमले की तैनाती क्यों नहीं की गई? क्या एक ही अधिकारी के पास इतने दायित्व होने से निगरानी और कार्रवाई प्रभावित नहीं हो रही?

पदोन्नति के बाद भी उपनिरीक्षक का प्रभार, नियमित पोस्टिंग क्यों नहीं?

मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि मनोज अग्रवाल पदोन्नति प्राप्त कर ADEO बन चुके हैं, लेकिन आंतरिक-1 सर्किल में उपनिरीक्षक का प्रभार भी उन्हीं के पास बना हुआ है। सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था में पदोन्नति के बाद संबंधित पद की जिम्मेदारी के अनुरूप कार्यविभाजन और रिक्त पद पर नई पदस्थापना अपेक्षित होती है।

लेकिन यहां स्थिति इसके उलट नजर आ रही है। एक तरफ मनोज अग्रवाल ADEO के रूप में सर्किल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, दूसरी तरफ उसी सर्किल में उपनिरीक्षक का प्रभार भी उनके पास है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विभाग में उपनिरीक्षक की नियुक्ति के लिए अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं या फिर इस पद को रिक्त रखकर वर्तमान व्यवस्था बनाए रखने के पीछे कोई विशेष वजह है?

प्रभारी सहायक आयुक्त अभिषेक तिवारी (डीईओ) की भूमिका भी सवालों के घेरे में

इस पूरे मामले में इंदौर के प्रभारी सहायक आयक्त अभिषेक तिवारी की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। जानकारी के अनुसार आंतरिक-1 सर्किल में उपनिरीक्षक की नियमित पदस्थापना अब तक नहीं की गई है। आखिर DEO ने इस महत्वपूर्ण सर्किल में उपनिरीक्षक की पोस्टिंग क्यों नहीं की? क्या इस संबंध में कोई प्रस्ताव भेजा गया? यदि नहीं, तो इसकी वजह क्या है?

विभागीय गलियारों में अभिषेक तिवारी और मनोज अग्रवाल की गहरी दोस्ती की चर्चा भी इस व्यवस्था को और सवालों के घेरे में लाती है। जब एक अधिकारी के पास चार जिम्मेदारियां केंद्रित हैं और दूसरे अधिकारी के पास पदस्थापना संबंधी निर्णय की जिम्मेदारी है, तब दोनों के बीच इस व्यवस्था को लेकर किसी विशेष समीकरण की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या अतिरिक्त प्रभार को बनाए रखने के पीछे केवल प्रशासनिक आवश्यकता है या फिर इसके पीछे कोई ऐसा व्यक्तिगत अथवा आर्थिक समीकरण काम कर रहा है, जिसकी वजह से नियमित पदस्थापना नहीं हो रही? क्या अतिरिक्त प्रभार के बदले किसी तरह के आर्थिक लेनदेन का खेल चल रहा है? इन सवालों की निष्पक्ष जांच जरूरी है। हालांकि आर्थिक लेनदेन अथवा अवैध शराब के वाहनों को निकलवाने में दोनों अधिकारियों की संलिप्तता के कोई पुष्ट प्रमाण फिलहाल सामने नहीं हैं।

बाकी ADEO एक सर्किल में, मनोज अग्रवाल के पास चार जिम्मेदारियां!

विभागीय व्यवस्था की तुलना करें तो अन्य ADEO सामान्यतः एक-एक सर्किल की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं, जबकि मनोज अग्रवाल के पास दो सर्किलों का ADEO प्रभार, डिप्टी कंट्रोलर और आंतरिक-1 सर्किल के उपनिरीक्षक की जिम्मेदारी भी है। यह असमानता अपने आप में विभागीय कार्यविभाजन की समीक्षा की मांग करती है।

आखिर ऐसी कौन सी उपक्रत करने वाली विशेष योग्यता अथवा प्रशासनिक आवश्यकता है, जिसके चलते मनोज अग्रवाल को लगातार अतिरिक्त जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं? क्या विभाग में अन्य योग्य अधिकारी उपलब्ध नहीं हैं? और यदि उपलब्ध हैं तो महत्वपूर्ण गुजरात रूट वाले सर्किल में उपनिरीक्षक की नियमित पदस्थापना करने के बजाय एक ही अधिकारी के पास दोनों पदों का प्रभार बनाए रखने की क्या वजह है, जबकि बबीता शिंदे (एडीईओ) खाली बैठी है?

आबकारी आयुक्त बताएं, चार जिम्मेदारियों का यह समीकरण किसके हित में?

आबकारी विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को इस पूरे मामले की समीक्षा करनी चाहिए। मनोज अग्रवाल को चार अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपने के आदेश सार्वजनिक किए जाने चाहिए। आंतरिक-1 सर्किल में उपनिरीक्षक की नियमित पदस्थापना नहीं होने के कारणों की जांच होनी चाहिए और गुजरात की ओर जाने वाले बाईपास मार्ग पर अवैध मदिरा परिवहन की निगरानी व्यवस्था का भी स्वतंत्र परीक्षण होना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि खातेगांव थाना प्रभारी हत्याकांड के बाद संवेदनशील मार्गों पर सशक्त निगरानी की आवश्यकता महसूस की जा रही है, तो फिर गुजरात रूट जैसे महत्वपूर्ण मार्ग की निगरानी के लिए पर्याप्त और स्वतंत्र मैदानी व्यवस्था क्यों नहीं है?

क्या आबकारी विभाग में जिम्मेदारियों का यह केंद्रीकरण प्रशासनिक मजबूरी है या फिर अतिरिक्त प्रभार की आड़ में कोई ऐसा समीकरण चल रहा है, जिसकी कीमत अवैध मदिरा परिवहन पर कमजोर निगरानी के रूप में चुकानी पड़ रही है? क्योंकि मामला केवल एक अधिकारी को अतिरिक्त प्रभार देने का नहीं, बल्कि संवेदनशील अंतरराज्यीय मदिरा परिवहन मार्ग की निगरानी और विभागीय जवाबदेही का है।