इंदौर से जबलपुर और भोपाल तक PWD संपत्तियों पर राजनीतिक कब्जे का आरोप
इंदौर, जबलपुर, भोपाल। ब्रिटिश काल से लेकर आज तक लोक निर्माण विभाग (PWD) में इंजीनियरों को विशेष महत्व दिया जाता रहा है। सड़क, पुल और भवन निर्माण जैसे महत्वपूर्ण कार्यों को देखते हुए उस दौर में इंजीनियरों के लिए उनके कार्यस्थल के आसपास विशेष रूप से सरकारी बंगले बनाए गए थे। इन बंगलों को इंजीनियरों के पद और नाम से चिन्हित किया गया था ताकि वे निर्माण कार्यों की निगरानी आसानी से कर सकें।
यह व्यवस्था पिछली शताब्दी भर चलती रही और इस शताब्दी के शुरुआती वर्षों तक भी कायम रही। लेकिन पिछले कुछ दशकों में इन सरकारी बंगलों पर राजनीतिक नजरें पड़ गईं और धीरे-धीरे इंजीनियरों के लिए बनाए गए ये आवास राजनीतिक ठिकानों में बदलने लगे।
ओल्ड पलासिया के बंगले बने राजनीतिक शक्ति केंद्र
आरोप है कि इस प्रक्रिया की शुरुआत उस समय हुई जब तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री कैलाश वजयवर्गी ने इंदौर के ओल्ड पलासिया स्थित D-1 चिन्हित बंगले में रह रहे मुख्य अभियंता (पश्चिम परिक्षेत्र) का स्थानांतरण इंदौर से जबलपुर करवा दिया। इसके बाद यह सरकारी बंगला अपनी पत्नी आशा वजयवर्गी की संस्था “आशा” को आवंटित कर दिया गया। बाद में यही बंगला उनके करीबी विधायक रमेश मेंदोला को दिलवाया गया।
इसी तरह ओल्ड पलासिया का D-2 बंगला, जो लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों के लिए चिन्हित था, इंदौर के सांसद शंकर लालवानी को आवंटित कर दिया गया। वहीं F-3 बंगला, जो विभागीय इंजीनियर के लिए निर्धारित था, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को दिया गया। बाद में राजनीतिक हस्तक्षेप के बाद इसे एक निजी डॉक्टर को आवंटित कर दिए जाने की भी चर्चा है। इसी श्रृंखला में F-1 बंगला भी इंजीनियर आवास के बजाय अजाक्स कार्यालय के लिए दे दिया गया।
सिर्फ इंदौर नहीं, जबलपुर और भोपाल में भी वही कहानी
यह मामला केवल इंदौर तक सीमित नहीं बताया जाता। जबलपुर में भी लोक निर्माण विभाग के इंजीनियरों के लिए बनाए गए दो सरकारी बंगलों को राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिए तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष ईश्वर दास रोहाणी और वर्तमान लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह को आवंटित कर दिया गया।
भोपाल चार इमली स्थित प्रमुख अभियंता के लिए आरक्षित आवास क्रमांक: E-9/7A लोक निर्माण विभाग में प्रमुख अभियंता और एमपीआरडीसी में तकनीकी सलाहकार रहे अखिलेश अग्रवाल को सन 2010 में आवंटित हुआ था। पीडब्ल्यूडी से सेवानिवृत्ति उपरांत एमपीआरडीसी में तकनीकी सलाहकार पद पर संविदा नियुक्ति के दौरान रेरा में अस्थाई तौर पर नियुक्त हुई अपनी पत्नी के नाम यह बंगला आवंटित करा दिया और केपीएस राणा जैसे प्रमुख अभियंता को अपने आधिकारिक बंगले की बजाय अन्य से संतोष करना पड़ रहा है।
इन घटनाओं से यह सवाल उठ रहा है कि सुशासन और प्रशासनिक नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए इंजीनियरों के लिए निर्धारित सरकारी आवास आखिर नेताओं को क्यों और कैसे दिए जा रहे हैं?
डाक बंगले पर कब्जा.. की कहानी अगले एपिसोड में
