अधिकृत वेंडर तकरीबन 12, लेकिन प्लेटफॉर्मों पर दर्जनों अनाधिकृत वेंडरों के सक्रिय होने का दावा; बोगियों के अंदर तक पहुंचकर मनमाने दामों पर खाद्य पदार्थ बेचने का आरोप, स्टॉल संचालकों से लेकर रेलवे पुलिस तक की भूमिका जांच के दायरे में
ग्वालियर। रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की सुरक्षा, खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता और निर्धारित दरों पर बिक्री सुनिश्चित करना रेलवे प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन ग्वालियर रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्मों पर जिस तरह कथित अवैध वेंडरों की भीड़ ट्रेन के आते ही बोगियों के अंदर-बाहर दौड़ती और यात्रियों तक पहुंचने के लिए एक-दूसरे से होड़ करती दिखाई देती है, उससे रेलवे की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि डीआरएम एवं सीनियर डीसीएम की सख्त निगरानी के बावजूद यदि स्टेशन पर अनाधिकृत वेंडरों का कथित कारोबार लगातार संचालित हो रहा है, तो आखिर जिम्मेदारों की निगरानी का असर जमीन पर क्यों दिखाई नहीं दे रहा?
स्टेशन पर मंडल से अधिकृत वेंडरों की संख्या तकरीबन 12 बताई जाती है, जबकि सूत्रों का दावा है कि वास्तविकता में प्लेटफॉर्मों पर 4 से 5 दर्जन तक अनाधिकृत वेंडर सक्रिय हैं। यदि यह दावा सही है, तो यह महज नियमों के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि रेलवे की अधिकृत वेंडिंग व्यवस्था के समानांतर एक ऐसे नेटवर्क के संचालन का संकेत है, जिसकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
हर स्टाल पर चार की अनुमति, 15 से 20 वेंडरों के संचालन का दावा!
रेलवे के निर्धारित नियमों के अनुसार, एक स्टॉल पर अधिकतम दो से चार वेंडर होने चाहिए। वैध वेंडर के पास काम के दौरान विधिवत आईडी कार्ड होना आवश्यक बताया जाता है। साथ ही, अधिकृत वेंडरों के लिए ट्रेन में चढ़कर बोगियों के भीतर खाद्य सामग्री बेचने की अनुमति नहीं होने और निर्धारित दूरी से ही बिक्री किए जाने की बात सामने आई है। ऐसे में स्टेशन पर कथित रूप से बोगियों के भीतर तक पहुंचकर खाद्य पदार्थ बेचने वाले लोगों की वैधता और उनके प्रवेश की अनुमति की जांच जरूरी है।
सूत्रों के अनुसार, ग्वालियर स्टेशन पर लगभग हर स्टॉल संचालक के पास डेढ़ से दो दर्जन तक वेंडर होने का दावा किया जा रहा है। यदि अधिकतम चार वेंडरों की अनुमति के मुकाबले 15 से 20 लोगों से काम कराया जा रहा है, तो सवाल उठता है कि इन लोगों का सत्यापन कौन करता है? इनके पहचान पत्र कहां हैं? इन्हें प्लेटफॉर्म और ट्रेन के भीतर तक पहुंचने से कौन रोकता है? और सबसे महत्वपूर्ण, रेलवे के जिम्मेदार अधिकारी इस स्थिति से अनजान कैसे रह सकते हैं?
‘केजी फूड’, ‘कमलाबाई’ और ‘एनजे फूड’ के संचालन पर सवाल
सूत्रों के मुताबिक, प्लेटफॉर्म नंबर 2 और 3 पर स्थित ‘केजी फूड’ तथा ‘कमलाबाई’ स्टॉलों का संचालन पेटी कॉन्ट्रैक्टर अनुराग राजावत द्वारा किया जाता है। वहीं प्लेटफॉर्म नंबर 1 पर ‘एनजे फूड’ का संचालन पेटी कॉन्ट्रैक्टर पवन चौहान द्वारा किए जाने की जानकारी सामने आई है।
दावा है कि इन सभी के पास अधिकतम 4-4 अधिकृत वेंडरों की अनुमति है, लेकिन इसके विपरीत प्रत्येक के यहां अलग-अलग 15 से 20 वेंडरों के काम करने की बात कही जा रही है। यदि यह संख्या सही है, तो अतिरिक्त लोगों को किसकी अनुमति से काम कराया जा रहा है? क्या सभी के पास वैध पहचान पत्र और वेंडिंग संबंधी दस्तावेज हैं? क्या स्टॉल संचालकों के रिकॉर्ड और मौके पर काम कर रहे लोगों की संख्या का कभी मिलान किया गया है? इन सवालों का जवाब संबंधित स्टॉल संचालकों और रेलवे प्रशासन की जांच से ही सामने आ सकता है।
एसीएम वर्मा, डीसीआई मीणा और सीसीआई अग्रवाल की निगरानी पर प्रश्नचिह्न
इस कथित अवैध वेंडिंग व्यवस्था को लेकर एसीएम वर्मा, डीसीआई रूप सिंह मीणा, सीसीआई सुशील अग्रवाल और रेलवे पुलिस की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि संबंधित जिम्मेदारों की मौजूदगी के बावजूद प्लेटफॉर्मों पर अनाधिकृत वेंडरों की गतिविधियां बेधड़क जारी हैं।
सूत्रों का यह भी दावा है कि सीसीआई सुशील अग्रवाल का मुख्यालय ग्वालियर होने के बावजूद वे लगभग 4 से 4:30 बजे झेलम/पातालकोट ट्रेन से अपने घर झांसी चले जाते हैं। इस संबंध में उनकी वास्तविक ड्यूटी, उपस्थिति और निरीक्षण संबंधी रिकॉर्ड की पुष्टि आवश्यक है।
यहां मूल सवाल किसी अधिकारी पर बिना जांच दोष तय करने का नहीं, बल्कि यह है कि जब स्टेशन पर कथित तौर पर दर्जनों अनाधिकृत वेंडर सक्रिय हैं, तो उनकी पहचान, अनुमति, खाद्य सामग्री की गुणवत्ता और बिक्री के निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? यदि संबंधित अधिकारी नियमित निरीक्षण कर रहे हैं, तो अनाधिकृत वेंडरों की संख्या और उनकी गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण क्यों नहीं दिखाई देता?
रेलवे पुलिस के संरक्षण का दावा, एक दर्जन से अधिक वेंडरों पर भी सवाल
सूत्रों ने यह भी दावा किया है कि एक दर्जन से अधिक ऐसे वेंडर हैं, जिन्हें रेलवे पुलिस का ‘चरण सेवक’ बताया जाता है। यदि इस दावे में तथ्य हैं, तो यह जांच का गंभीर विषय है कि क्या किसी अनाधिकृत वेंडर को पुलिसकर्मियों का संरक्षण प्राप्त है और क्या इसके बदले किसी प्रकार का अनुचित लाभ लिया जाता है। हालांकि, इस आरोप की पुष्टि स्वतंत्र साक्ष्यों, संबंधित लोगों के बयान और विभागीय जांच से होना आवश्यक है।
ग्वालियर स्टेशन पर कथित तौर पर सक्रिय 4 से 5 दर्जन अनाधिकृत वेंडरों में मुख्य रूप से हेमंत, डालचंद, हरि किशोर, बाबू चांद, नितेश, हरीश, बनवारी, राममिलन, अकील, शकील और रवि सहित कुछ अन्य लोगों की पहचान किए जाने का दावा किया गया है। इन नामों के आधार पर संबंधित व्यक्तियों की वास्तविक भूमिका, पहचान-पत्र, अधिकृत सूची और स्टॉल संचालकों से उनके संबंधों का सत्यापन किया जाना चाहिए।
DRM और सीनियर DCM की निगरानी की असली परीक्षा
डीआरएम अनिरुद्ध कुमार सिंह एवं सीनियर डीसीएम अमन वर्मा की सख्त निगरानी के बावजूद यदि ग्वालियर स्टेशन पर अनाधिकृत वेंडरों का यह कथित नेटवर्क फल-फूल रहा है, तो यह केवल निचले स्तर की निगरानी का प्रश्न नहीं रह जाता। यह देखने की जरूरत है कि निरीक्षण व्यवस्था कितनी प्रभावी है, शिकायतों पर क्या कार्रवाई होती है और अधिकृत वेंडरों की सूची का वास्तविक स्थिति से मिलान कितनी बार किया जाता है।
रेलवे प्रशासन को चाहिए कि प्लेटफॉर्म नंबर 1, 2 और 3 पर अचानक संयुक्त निरीक्षण कराकर प्रत्येक स्टॉल के अधिकृत वेंडरों की संख्या, पहचान-पत्र, ठेके एवं उपठेके संबंधी दस्तावेजों और खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच कराए। ट्रेन के भीतर अनधिकृत बिक्री, निर्धारित दरों से अधिक वसूली और रेलवे पुलिस के कथित संरक्षण के आरोपों की भी अलग-अलग जांच होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों और जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
अब देखना यह होगा कि ग्वालियर रेलवे स्टेशन पर कथित तौर पर चल रहे इस समानांतर वेंडिंग नेटवर्क पर रेलवे प्रशासन कब निर्णायक कार्रवाई करेगा? क्या डीआरएम और सीनियर डीसीएम स्वयं इस पूरे मामले की जांच कराकर अधिकृत वेंडरों की वास्तविक संख्या सार्वजनिक करेंगे, या यात्रियों को इसी तरह मनमानी कीमतों, खाद्य गुणवत्ता और अनधिकृत बिक्री की समस्या का सामना करना पड़ेगा?
नोट: इस खबर में उल्लिखित अनियमितताओं, व्यक्तियों की भूमिका और संरक्षण संबंधी आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि तथा संबंधित पक्षों का आधिकारिक पक्ष प्राप्त किया जाना शेष है। आरोपों की पुष्टि होने पर ही जिम्मेदारी निर्धारित की जानी चाहिए।
