सागर के बंडा कांड के बाद सरकार की सख्ती का असर, प्रदेशभर में अवैध शराब पर कार्रवाई तेज; सवाल—बड़े हादसे के बाद ही क्यों जागता है सिस्टम?
भोपाल 15 सितंबर 2026। सागर के बंडा में जहरीली शराब से हुई मौतों के बाद उठे सवालों और सरकार पर बढ़े दबाव के बीच आबकारी विभाग अब प्रदेशभर में सक्रिय नजर आ रहा है। अवैध एवं नकली शराब के निर्माण, भंडारण और परिवहन के खिलाफ कार्रवाई तेज हुई है। इसी क्रम में आज मंगलवार को मंत्रालय में आबकारी मंत्री एवं उपमुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा ने विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर राजस्व संग्रहण, विभागीय कार्यों की प्रगति और प्रशासनिक व्यवस्थाओं की समीक्षा की तथा अवैध शराब के खिलाफ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए।
बैठक में विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर, आबकारी आयुक्त दीपक सक्सेना, संभागीय उपायुक्त सहित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। सरकार की इस सक्रियता के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आबकारी विभाग को अपना पूरा तंत्र सक्रिय करने के लिए हर बार किसी बड़े शराब कांड और मौतों का इंतजार क्यों करना पड़ता है?
सख्ती बढ़ी तो सामने आने लगा अवैध शराब का नेटवर्क
विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर के सख्त रुख के बाद प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में अवैध और नकली शराब के खिलाफ जिस तरह कार्रवाई और बरामदगी सामने आ रही है, वह निःसंदेह काबिले तारीफ है, लेकिन इसने विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
एक तरफ कार्रवाई में तेजी यह संकेत देती है कि आबकारी अमले के पास जमीनी स्तर पर अवैध शराब के नेटवर्क की जानकारी जुटाने के पर्याप्त स्रोत और तंत्र मौजूद हैं। लेकिन दूसरी तरफ यही सवाल और गंभीर हो जाता है कि यदि यह सूचना तंत्र इतना सक्षम है तो सामान्य दिनों में अवैध शराब का कारोबार आबकारी विभाग की नजरों से कैसे बचा रहता है?
क्या कार्रवाई के लिए ऊपर से सख्त निर्देश जरूरी हैं, या फिर मैदानी अमले की जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था में ही कोई ऐसी कमजोरी है, जिसके कारण सामान्य परिस्थितियों में कार्रवाई की गति सुस्त पड़ जाती है?
वर्षों की पदस्थापना पर हो व्यापक समीक्षा
यदि सरकार वास्तव में मध्यप्रदेश को अवैध और जहरीली शराब से मुक्त करने के लक्ष्य को गंभीरता से आगे बढ़ाना चाहती है, तो केवल छापामार कार्रवाई बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। आबकारी विभाग के कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक लंबे समय से एक ही क्षेत्र में जमे मैदानी अमले की पदस्थापना और स्थानांतरण व्यवस्था की भी व्यापक समीक्षा जरूरी है।
नियमों के विपरीत वर्षों तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहना, अथवा स्थानांतरण के कुछ ही समय बाद दोबारा उसी क्षेत्र में लौट आना—यदि ऐसे मामले मौजूद हैं—तो यह जांच का विषय होना चाहिए कि कहीं लंबे समय की पदस्थापना स्थानीय स्तर पर ऐसे प्रभाव और नेटवर्क तो नहीं बना रही, जो विभागीय कार्रवाई को प्रभावित कर सकते हैं।
दस-दस साल से अधिक समय तक एक ही जगह जमे रहने वाले अमले की भूमिका और पदस्थापना का रिकॉर्ड खंगालना इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि किसी भी नियामक विभाग में लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में बने रहने से स्थानीय स्तर पर मजबूत संपर्क विकसित होने की आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
अब सरकार के सामने चुनौती केवल अवैध शराब पकड़ने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई किसी कांड के बाद शुरू होने वाला अभियान न बने, बल्कि आबकारी विभाग की स्थायी कार्यप्रणाली का हिस्सा हो। सवाल यही है—क्या बंडा कांड के बाद शुरू हुई सख्ती स्थायी व्यवस्था में बदलेगी, या कुछ समय बाद आबकारी का वही पुराना तंत्र फिर सुस्त पड़ जाएगा?
