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युवाओं को सड़क पर आने के लिए मजबूर करती सरकारें, क्या अगली लड़ाई चुनाव के मैदान में होगी?

जंतर-मंतर के CJP आंदोलन से धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा, अब झारखंड में युवाओं का उबाल; Gen-Z की एकजुटता ने सरकारों को दिया बड़ा राजनीतिक संकेत

नई दिल्ली 10 अगस्त 2026। दिल्ली के जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में NEET-UG और परीक्षा व्यवस्था की अनियमितताओं के खिलाफ हुआ युवा आंदोलन और उसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा अब सिर्फ एक आंदोलन की कहानी नहीं रह गया है।

इसके बाद अब झारखंड में JPSC/JSSC भर्ती परीक्षाओं की कथित गड़बड़ियों और पेपर लीक के खिलाफ युवाओं का आंदोलन तेज होना सरकारों के लिए एक बड़ा सवाल है—क्या देश का युवा अपनी जायज मांगों के लिए हर बार सड़क पर उतरने के बाद ही सरकारों को दिखाई देगा?

मांगें असंभव नहीं हैं। युवा सिर्फ परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता, दोषियों पर कार्रवाई और निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं। फिर उन्हें आंदोलन की नौबत तक पहुंचने क्यों दिया जाता है?

दिल्ली ने दिखाया-युवा एकजुट हुआ तो सत्ता को जवाब देना पड़ा

जुलाई में दिल्ली के जंतर-मंतर पर CJP का आंदोलन लगातार सरकार पर दबाव बनाता रहा। धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में शामिल था और 25 जुलाई को उन्होंने इस्तीफा दे दिया।

यह घटना देश की राजनीति के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसने एक नया संदेश दिया है—सोशल मीडिया पर असंतोष जताने वाला युवा जब सड़क पर उतरकर संगठित हो जाता है, तो उसकी राजनीतिक ताकत को नजरअंदाज करना आसान नहीं है।

और अब झारखंड में फिर वही तस्वीर दिखाई दे रही है। यानी मुद्दा किसी एक परीक्षा, एक राज्य या एक सरकार तक सीमित नहीं रह गया है। रोजगार, भर्ती और परीक्षा की विश्वसनीयता अब युवा राजनीति का बड़ा मुद्दा बनते जा रहे हैं।

38% का युवा वर्ग अगर वोट की ताकत समझ गया तो चुनावी गणित बदल सकता है

भारत में Gen-Z की संख्या दुनिया में सबसे बड़ी है। उपलब्ध अनुमानों के अनुसार करीब 50 करोड़ भारतीय Gen-Z आयु समूह में आते हैं और लगभग 35% आबादी 14-29 वर्ष के आयु वर्ग में है; कुछ अध्ययनों में Gen-Z का हिस्सा करीब 38% तक बताया गया है।

यही वह वर्ग है जिसे सरकारें चुनाव के समय रोजगार, भर्ती, परीक्षा, छात्रवृत्ति और अन्य वादों के ‘लॉलीपॉप’ से प्रभावित करने की कोशिश करती हैं। लेकिन यदि यही युवा वर्ग मुद्दों के आधार पर संगठित होकर मतदान करने लगा, तो जाति, क्षेत्र और पारंपरिक चुनावी समीकरणों से बने गणित को चुनौती मिल सकती है।

और यदि असंतोष इतना बढ़ा कि बड़ी संख्या में युवा NOTA को राजनीतिक विरोध के प्रतीक के रूप में चुनने लगे, तो उसका असर भले ही मौजूदा कानून के तहत चुनाव परिणाम को सीधे नहीं बदले, लेकिन वह राजनीतिक दलों के लिए बेहद बड़ा जनादेश-संदेश और राजनीतिक संकट जरूर बन सकता है। वर्तमान व्यवस्था में NOTA के सर्वाधिक वोट आने पर भी सबसे अधिक वोट पाने वाला उम्मीदवार ही निर्वाचित होता है लेकिन नोटा को सर्वाधिक वोट मिलना_संविधान सशोधन की दिशा में एक नई मांग को जन्म जरूर देगा!

इसलिए सरकारों के लिए फिलहाल असली खतरा NOTA नहीं, बल्कि वह जागता हुआ युवा मतदाता है जो किसी दल का स्थायी समर्थक बनने के बजाय अपने मुद्दों के आधार पर मतदान करने का फैसला करेगा।

जंतर-मंतर और झारखंड के आंदोलन शायद इसी बदलती युवा राजनीति की शुरुआती दस्तक हैं। सवाल सिर्फ इतना है—सरकारें इस दस्तक को समय रहते सुनेंगी या फिर अगली बार युवा सड़क पर नहीं, सीधे मतदान केंद्र पर जवाब देगा?