20 महीने में 5 बार उखड़ी सड़क, अब सरकार जागी तो रिटायरमेंट और सेटिंग का खेल
भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी का बहुचर्चित जीजी फ्लाईओवर… नाम जीजी, काम चीची! लोक निर्माण विभाग ने 154 करोड़ फूंककर ऐसा फ्लाईओवर बनवाया कि 20 महीने में ही उसकी सड़क उखड़ने लगी। जनता के पैसों से बनी इस सड़क पर गड्ढे नहीं, जवाबदेही के सवाल हैं।
अब जाकर सरकार की नींद टूटी है। विभाग के उप सचिव ए.आर. सिंह ने ईएनसी को पत्र लिखकर दो टूक कहा है कि इस घटिया निर्माण के जिम्मेदार इंजीनियरों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई का प्रस्ताव भेजो। लेकिन असली खेल तो अब शुरू हुआ है।
ठेकेदार किसका? मंत्री के सगे भाई का!
सूत्रों का कहना है कि इस बदनाम फ्लाईओवर को बनाने वाली कंपनी एसकेएवाईएस इंफ्रा प्रोजेक्ट एक प्रभावशाली मंत्री के ठेकेदार भाई की है। इसलिए निर्माण के दौरान आंखें मूंदे रहे अफसर अब रिटायर होकर मलाईदार कुर्सियों पर सेट हो गए।
देखिए इंजीनियरों की लीलाः
- निर्माण के दौरान ईएनसी रहे आर.के. मेहरा रिटायर होते ही सीधे MPRDC में सलाहकार बन गए।
- दूसरे ईएनसी के.पी.एस. राणा को PWD से हटाकर MPRDC में ईएनसी बना दिया गया—मतलब एक खिड़की से निकले, दूसरी से घुस गए।
- ब्रिज सेक्शन के प्रभारी चीफ इंजीनियर रहे संजय खांडे और जी.पी.वर्मा—ये वही अधिकारी हैं जो ऐशबाग में 90 डिग्री वाले अजूबा आरओबी के मामले में निलंबित हुए थे। बहाल तो हो गए, पर जांच में अभी भी फंसे हैं।
- एग्जीक्यूटिव इंजीनियर रहे जावेद शकील रिटायर होकर निकल लिए।
- और एसडीओ रहे रवि शुक्ला तो पहले से ही निलंबित चल रहे हैं।
तकनीकी गड़बड़ी की जड़ क्या है?
सबसे बड़ा सवाल फ्लाईओवर की उस तकनीकी व्यवस्था को लेकर है, जिस पर विभाग को अब सार्वजनिक जवाब देना चाहिए। फ्लाईओवर के कंक्रीट बेयरिंग/वेयरिंग कोर्स के ऊपर बिटुमिनस यानी डामर का बेयरिंग कोर्स किस स्वीकृत तकनीकी प्रावधान के तहत डाला गया? यदि यह तकनीकी रूप से सही और स्वीकृत डिजाइन का हिस्सा था तो फिर उसकी परत, मोटाई, बॉन्डिंग और निर्माण गुणवत्ता के बावजूद सड़क बार-बार क्यों उखड़ी? और यदि स्वीकृत डिजाइन में ऐसा प्रावधान नहीं था तो 154 करोड़ के इस फ्लाईओवर पर यह काम किसकी अनुमति से हुआ?
चिंता की बात यह है कि लोक निर्माण मंत्री राकेश सिंह की नाक के नीचे बने इस फ्लाईओवर के निर्माण और गुणवत्ता की निगरानी में विभाग के शीर्ष अधिकारी, मुख्य अभियंता, तकनीकी अमला और गुणवत्ता जांच की पूरी व्यवस्था मौजूद थी। फिर इतनी बड़ी तकनीकी खामी या निर्माण संबंधी गड़बड़ी किसी की नजर में क्यों नहीं आई? यदि सड़क की परत 20 महीने में बार-बार उखड़ रही है तो यह सवाल सिर्फ ठेकेदार से नहीं, पूरे तकनीकी तंत्र से पूछा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट की फटकार के बाद भी बचाने का खेल!
सबसे बड़ा सवाल_जब हाईकोर्ट ने ब्रिज सेक्शन के नव नियुक्त प्रभारी चीफ इंजीनियर गोपाल सिंह को मरम्मत के नाम पर भ्रष्टाचार का नया खेल खेलने पर कड़ी फटकार लगाई है, तो सरकार सीधे इन दोषी इंजीनियरों पर कार्रवाई क्यों नहीं करती? सूत्र बताते हैं कि विभाग के प्रशासनिक कार्यालय के अफसर जानबूझकर फाइल को लटका रहे हैं। मकसद एक ही—कार्रवाई से पहले बचने-बचाने के खेल में अपनी मलाई पक्की कर ली जाए।
अब सबकी नजर मौजूदा ईएनसी पर है। देखना होगा कि उप सचिव ए.आर. सिंह के पत्र पर वह कितने नाम सरकार को भेजते हैं और मंत्री के भाई के ठेकेदार को बचाने के लिए किस-किस को क्लीन चिट देते हैं। जीजी फ्लाईओवर अब सिर्फ एक खराब सड़क का मामला नहीं है। यह सवाल है कि लोक निर्माण विभाग का पूरा तकनीकी अमला आखिर काम कर रहा है या सिर्फ फाइलों और पदस्थापनाओं का मैनेजमेंट? 154 करोड़ की परियोजना में जनता को सड़क नहीं, जवाब चाहिए—जिम्मेदार कौन है?
