ग्वालियर 17 फरवरी2026। भले ही मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री एवं मुख्य प्रशासनिक अमला समीक्षा बैठकों में बड़े-बड़े दावे करता हो मकर जमीनी हकीकत कुछ और ही है। शासन की जनसुनवाई प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े हो गए हैं? सीएम हेल्पलाइन पर तमाम शिकायतें L-1 /L-2 स्तर अथवा वरिष्ठ अधिकारीयों को गुमराह करते हुए बिना निराकरण के बंद कर दी जाती है। इस क्रम में बिजली/ ऊर्जा विभाग एवं नियामक आयोग से जुड़ा मामला सामने आया है।
ग्वालियर निवासी उपभोक्ता गीता तोमर ने आरोप लगाया है कि उनकी दर्ज शिकायत को संबंधित बिजली वितरण कंपनी (MPMKVVCL – MPCZ) के L-3 अधिकारी द्वारा बिना कारणयुक्त आदेश के मनमाने तरीके से “Force Close” कर दिया गया।
“डिमांड बेस्ड टैरिफ संभव नहीं” कहकर बंद की शिकायत
प्राप्त शिकायत के अनुसार, उपभोक्ता ने SARAL SANYOJAN पोर्टल के माध्यम से 4.91 kW की Contract Demand के साथ Demand Based Tariff लागू करने का आवेदन किया था। पोर्टल पर आवेदन “Paid” स्थिति में स्वीकृत दर्शाया गया है। साथ ही, उपभोक्ता का दावा है कि वे (MPERC) के टैरिफ आदेश 2025-26 के अनुसार पात्र हैं।
इसके बावजूद—L-1 स्तर पर केवल “IT Cell को संदर्भित” कर औपचारिक टिप्पणी की गई, समाधान नहीं।
L-3 अधिकारी ने यह कहते हुए शिकायत बंद कर दी कि “Demand Based Tariff संभव नहीं है”,
जबकि कोई लिखित, कारणयुक्त या टैरिफ-आधारित आदेश पारित नहीं किया गया।
बिलों में अब भी ‘0.0 kW’ Contract Demand
जनवरी 2026 और फरवरी 2026 के बिजली बिलों में आज भी Contract Demand 0.0 kW दर्शाई जा रही है। इससे स्पष्ट है कि न तो टैरिफ लागू किया गया और न ही शिकायत का वास्तविक निराकरण हुआ।
यह मामला केवल एक उपभोक्ता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रश्न उठाता है कि क्या वरिष्ठ स्तर (L-3) पर शिकायतों का निस्तारण यांत्रिक और औपचारिकता निभाने के लिए किया जा रहा है?
हेल्पलाइन की साख पर सवाल ?
यदि बिना किसी वैधानिक आधार, बिना आदेश और बिना नियामकीय प्रावधान का उल्लेख किए शिकायतें बंद की जाएंगी, तो क्या केवल “शिकायत निपटाने का आंकड़ा सुधारने” का माध्यम बनकर रह जाएगी?
विशेषज्ञों का मानना है_ टैरिफ संबंधी विवाद में नियामक आयोग के आदेश का उल्लेख अनिवार्य होता है। L-3 स्तर पर कारणयुक्त (Speaking Order) पारित किए बिना शिकायत बंद करना प्रशासनिक जवाबदेही पर प्रश्नचिह्न है।इससे उपभोक्ता अधिकारों का प्रत्यक्ष उल्लंघन होता है।
शासन से मांग..
शिकायत में शासन से मांग की गई है कि—*शिकायत क्रमांक 36015164 को पुनः खोला जाए। * L-3 अधिकारी द्वारा की गई Force Closure की प्रशासनिक जांच हो। *CM Helpline पर शिकायतों का निस्तारण केवल लिखित एवं कारणयुक्त आदेश से ही किया जाए। *जिम्मेदारी तय कर प्रणाली की पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
यह प्रकरण बताता है कि यदि शिकायत निवारण तंत्र ही पारदर्शी न रहे, तो आम उपभोक्ता न्याय के लिए कहां जाए? अब देखना यह है कि शासन इस गंभीर आरोप पर क्या रुख अपनाता है और क्या मुख्यमंत्री हेल्पलाइन की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।
