मंत्री के ओएसडी और कथित रिश्तेदार के नाम पर बोली लगाकर बांटे जा रहे उच्च पद ?
भोपाल। मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग (PWD) में कथित “प्रभार सिंडीकेट” के सक्रिय होने से प्रशासनिक साख पर गंभीर सवाल फिर खड़े हो गए हैं। युग क्रांति ने पूर्व में
https://yugkranti.org/?p=12342
विभाग में पदस्थापनाओं और प्रभार वितरण में अनियमितताओं की ओर संकेत किया था। अब सामने आ रही नई जानकारियां बताती हैं कि मामला सिर्फ अनियमितता का नहीं, बल्कि संगठित तरीके से “बोली लगाकर” उच्च पदों के प्रभार बांटने का है।
सूत्रों के अनुसार विभागीय मंत्री से जुड़े होने का दावा करने वाले एक कथित रिश्तेदार सूरज कुशवाह (जल संसाधन विभाग से सेवानिवृत्त) और मंत्री के ओएसडी राहुल सिंह के नाम पर इंजीनियरों से धन संग्रह कर उच्च प्रभार दिलाने का खेल खेला जा रहा है। इस पूरे नेटवर्क में ग्वालियर के इंजीनियर वी.के. झा को अहम कड़ी बताया जा रहा है—जो खुद दो रैंक ऊपर के तीन-तीन उच्च प्रभार ले चुके हैं।
रेडिसन में ‘रेट फिक्सिंग’ की बैठकें, हाईएस्ट बिडर को प्रभार !
सूत्र बताते हैं कि ग्वालियर के एक होटल में सूरज सिंह, राहुल सिंह और वी.के. झा की बैठकों में तय होता है कि किस एसडीओ, कार्यपालन यंत्री या अधीक्षण यंत्री को हटाकर किसे कितना पैसा लेकर उच्च प्रभार दिया जाएगा। कथित तौर पर “हाईएस्ट बिड” के आधार पर आदेश तय होते हैं।
तबादलों पर प्रतिबंध के बावजूद जूनियर इंजीनियरों को वरिष्ठ पदों का प्रभार दिया जा रहा है। कई कार्यपालन यंत्रियों को दो-दो, तीन-तीन अधीक्षण यंत्रियों के प्रभार सौंपे गए हैं। हाल ही में मुरैना के एक इंजीनियर को 800 किमी दूर डिंडौरी का अतिरिक्त प्रभार देने का आदेश भी इसी कथित खेल का हिस्सा बताया गया—जो एक न्यूज चैनल द्वारा उजागर किए जाने के बाद निरस्त करना पड़ा।
घोटालों की पृष्ठभूमि, विधानसभा तक गूंज
वी.के. झा का नाम रीवा में 35 करोड़ रुपये के फर्जी बिल प्रकरण में भी सामने आ चुका है, जिसकी गूंज विधानसभा तक हुई। इसके बावजूद उन्हें ग्वालियर में एक्जीक्यूटिव इंजीनियर रहते हुए सुपरीटेंडेंट इंजीनियर (सेतु) और चीफ इंजीनियर (उत्तर परिक्षेत्र) सहित अन्य उच्च प्रभार दिए गए—जिससे विभागीय नियमों पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
इसी क्रम में पीआईयू जबलपुर के एक्जीक्यूटिव इंजीनियर को दो रैंक ऊपर रीवा मुख्य अभियंता का प्रभार, जबलपुर के कार्यपालन यंत्री को अधीक्षण यंत्री का प्रभार, तथा गुना और दमोह में भी एक ही अधिकारी को दो-दो उच्च पदों का अतिरिक्त कार्यभार देने के आदेश चर्चा में हैं।
‘इवेंट मैनेजमेंट’ में करोड़ों का भुगतान भी सवालों में
कथित सिंडीकेट पर यह आरोप भी है कि मंत्री से निकटता का दावा करते हुए भोपाल में एक निजी इवेंट संचालक को चार आयोजनों के एवज में लगभग चार करोड़ रुपये का भुगतान कराया गया। यदि यह सही है तो यह सिर्फ प्रभार वितरण नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमितताओं का भी गंभीर मामला है।
हाईकोर्ट की लताड़ और सरकार की चुप्पी
अष्टाना एसडीओ प्रकरण में उच्च न्यायालय ग्वालियर पीठ द्वारा विभागीय अधिकारियों को फटकार लगाए जाने की चर्चा भी विभाग में है। इसके बावजूद कथित सिंडीकेट पर लगाम न लगना कई सवाल खड़े करता है—क्या यह सब “ऊपर” की जानकारी के बिना संभव है?
राज्य मंत्रिमंडल में संभावित फेरबदल की अटकलों के बीच यदि विदाई से पहले “मौका” भुनाने का खेल चल रहा है, तो यह शासन-प्रशासन की विश्वसनीयता पर सीधा प्रहार है। यदि आरोप सही हैं तो यह सिर्फ पदों की खरीद-फरोख्त नहीं, बल्कि पूरे विभाग की आत्मा को गिरवी रखने जैसा है। सरकार को चाहिए कि तत्काल उच्चस्तरीय, निष्पक्ष जांच कराए और स्पष्ट करे कि क्या पीडब्ल्यूडी में सचमुच ‘प्रभार की नीलामी’ हो रही है?
