₹15 की थाली में_ रेलवे का 15 साल का छल !

महंगाई में ‘जनता भोजन’ बना दिखावा, स्टेशन-स्टेशन बोर्ड लगे हैं_ पर थाली नदारद..
झांसी से ग्वालियर, आगरा से प्रयागराज तक युग क्रांति की पड़ताल में बड़ा खुलासा..

युगक्रांति विशेष रिपोर्ट। भारतीय रेलवे की बहुचर्चित “जनता भोजन” आज अपने नाम और उद्देश्य दोनों से भटक चुकी है। वर्ष 2009-10 में तय की गई ₹15 की दर, आज 15 साल बाद भी जस-की-तस बनी हुई है, जबकि इसी अवधि में महंगाई कई गुना बढ़ चुकी है। नतीजा_₹15 में 7 पुरी और सब्जी देना आज के दौर में व्यावहारिक रूप से नामुमकिन हो चुका है।

यही वजह है कि रेलवे स्टेशनों पर जनता भोजन अब यात्रियों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि कागज़ी खानापूर्ति और बोर्ड पर लिखी इबारत बनकर रह गया है।

बोर्ड पर ‘जनता भोजन’, थाली में सन्नाटा

युग क्रांति की टीम ने झांसी, ग्वालियर, आगरा, प्रयागराज, इंदौर, रतलाम सहित कई प्रमुख स्टेशनों की जमीनी पड़ताल की। लगभग हर स्टेशन पर स्थिति एक जैसी पाई गई_जनता भोजन के बोर्ड और रेट लिस्ट तो मौजूद मगर भोजन नहीं, पूछने पर जवाब— “खत्म हो गया”, “आज बना नहीं”, “सप्लाई नहीं आई”

जनता भोजन स्टॉल संचालकों से सीधी बातचीत में एक ही सच्चाई सामने आई—“इतनी महंगाई में इतना सस्ता भोजन देना संभव नहीं है।”

IRCTC का उदाहरण, जो जनता भोजन की पोल खोलता 

रेलवे की ही सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी IRCTC यात्रियों को
₹70–₹80 में संतुलित, नियमित और गुणवत्तापूर्ण थाली उपलब्ध करा रही है। जिसकी दरों में समय-समय पर महंगाई और लागत के अनुसार संशोधन किया जाता है, इसके विपरीत, जनता भोजन योजना आज भी 15 साल पुरानी ₹15 की अव्यावहारिक दरों पर अटकी हुई है। जिसका सीधा असर सप्लाई की अनुपलब्धता, दिखावे और भ्रष्ट वसूली के रूप में सामने आ रहा है।

दो मॉडल, दो हकीकत..
IRCTC थाली:
दर: ₹70–₹80
नियमित संशोधन
उपलब्धता सुनिश्चित

जनता भोजन:
दर: ₹15 (15 साल पुरानी)
कोई संशोधन नहीं
ज़मीनी स्तर पर अनुपलब्ध

रेलवे बोर्ड की चुप्पी, सवालों के घेरे में मंशा

सबसे गंभीर सवाल यह है कि_क्या रेलवे बोर्ड और रेल मंत्रालय को यह व्यावहारिक सच्चाई नहीं दिखती? या फिर जानबूझकर 15 साल पुरानी दरों को बनाए रखा गया है?
अगर लोककल्याण की मंशा होती, तो अब तक जनता भोजन की दरों में यथोचित संशोधन, गुणवत्ता और उपलब्धता की सख्त निगरानी के साथ यात्रियों को इसका वास्तविक लाभ
सुनिश्चित किया जा चुका होता।

अनदेखी/मिली भगत में पनप रहा है भ्रष्ट तंत्र ?

विशेषज्ञों का मानना है कि रेलवे की अरुचि और अनदेखी पूर्ण रवैया के चलते जनता भोजन की अव्यावहारिक दरें स्थानीय कमर्शियल विभाग के लिए कमाई का जरिया बनती जा रही हैं। सूत्र अनुसार_निरीक्षकों पर वरिष्ठ अधिकारियों की मिलीभगत से स्टॉल संचालकों से सरेआम वसूली के आरोप सामने आए हैं। ग्वालियर जैसे स्टेशन से मंडल तक कमर्शियल विभाग में मीना से वर्मा तक इसकी जड़ें इतनी गहरी है कि बेचारे अकेले डीआरएम कुमार साहब क्या उखाड़ पाएंगे! फिर भी उनके सार्थक प्रयास को युगक्रांति सेल्यूट करता है।

स्टॉल संचालकों की मजबूरी साफ है—घाटा उठाओ या ‘व्यवस्था’ के नाम पर भुगतान करो। यानी साफ तौर पर कहा जा सकता है कि जनता भोजन की विफलता, भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का माध्यम बनती जा रही है।

रेलवे के शुद्ध अंतःकरण और इच्छाशक्ति में निहित है समाधान

रेल भवनजनमत के आधार पर युग क्रांति का स्पष्ट मत है कि_ ₹15 की दर तत्काल समाप्त हो, महंगाई के अनुरूप कम से कम 60% की वृद्धि की जाए और जनता भोजन को कागज़ से निकालकर थाली तक पहुंचाया जाए। इस क्रम में प्रयागराज से उम्मीद की नई किरण नजर आई है, जिसके अनुसरण के साथ उस पर अमल की जरूरत है।

सूत्रों के अनुसार,”प्रयागराज के सीनियर डीसीएम ने हालात की गंभीरता समझते हुए जनता भोजन की कीमत ₹20 से ₹25 करने का प्रस्ताव वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से रेलवे बोर्ड को भेजा है।” यह पहल साबित करती है कि कानूनी प्रावधान तभी सार्थक और लोककल्याणकारी हैं, जब वे व्यवहारिक हों।

अब फैसला रेलवे को करना है। रेलवे बोर्ड तय करे कि “जनता भोजन” यात्रियों के लिए है या फिर सिर्फ दिखावे और वसूली का औजार?