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ब्रेकिंग

जांच के बीच ही वर्क ऑर्डर! एमपीआरडीसी में ‘खेल’ या खुली साठगांठ ?

8 दिन में पलटी तस्वीर: एक हाथ से जांच, दूसरे हाथ से ठेका_ जांच के बीच ‘एमपीएसडी फोर्स’ को नया टोल

भोपाल, बृजराज सिंह। मध्य प्रदेश सड़क विकास निगम (MPRDC) में टोल संचालन के नाम पर चल रहे कथित काले साम्राज्य की परतें अब इतनी साफ हो चुकी हैं कि सवाल सिर्फ संजय बरनवाल या एमपीएसडी फोर्स प्राइवेट लिमिटेड तक सीमित नहीं रह गया है। अब सीधे-सीधे निगम प्रबंधन की नीयत, भूमिका और ईमानदारी कटघरे में है।

दो आधिकारिक पत्र_एक 22 जनवरी 2026 का और दूसरा 30 जनवरी 2026 का—एमपीआरडीसी के भीतर चल रहे उस विरोधाभासी खेल को उजागर करते हैं, जिसे कानून की भाषा में “Colorable Exercise of Power” कहा जाता है।

पहला आदेश: जांच कमेटी, संगीन आरोप और 15 दिन की समय-सीमा..

दिनांक 22 जनवरी 2026 को एमपीआरडीसी के प्रबंध संचालक भरत यादव के अनुमोदन पर उप महाप्रबंधक (स्थापना) उमेश सिंह द्वारा जारी आदेश अंतर्गत संजय बरनवाल के विरुद्ध एमपीएसडी फोर्स प्राइवेट लिमिटेड की भूमिका एवं अर्हता सहित अन्य मामलों को  लेकर औपचारिक जांच समिति गठित की जाती है

स्पष्ट निर्देश है कि समिति 15 दिन में जांच प्रतिवेदन प्रस्तुत करेगी। अर्थात आरोप गंभीर, कंपनी संदिग्ध एवं जांच लंबित है।

आठ दिन बाद दूसरा आदेश: वही कंपनी, नया टोल और 52 कर्मचारी!

लेकिन चौंकाने वाली बात यह है कि जांच पूरी होने से पहले ही, दिनांक 30 जनवरी 2026 को उसी प्रबंध संचालक के अनुमोदन पर उसी उप महाप्रबंधक द्वारा— एमपीएसडी फोर्स प्राइवेट लिमिटेड को नए टोल प्लाजा (महू-घाटा)के संचालन का वर्क ऑर्डर 52 कर्मचारियों की तैनाती सहित बिना किसी प्रक्रिया और बिना बैंक गारंटी के सौंप दिया जाता है, जबकि नियमानुसार इसके लिए तकरीबन 3 करोड़ की बैंक गारंटी लगनी चाहिए।

आदेश

ये आदेश न सिर्फ जांच प्रक्रिया का मज़ाक है, बल्कि
विजिलेंस, वित्तीय नियमों और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस की खुली अवहेलना है।

समय रहते टेंडर प्रक्रिया क्यों नहीं..

महू -घाटा मार्ग का टोल संचालन 31 जनवरी तक “श्रीजी मैन पावर” फर्म कर रही थी और इस अवधि के समाप्त होने के उपरांत इसके संचालन का जिम्मा बिना किसी प्रक्रिया के एमपीएसडी फोर्स को दे दिया।

यहां बड़ा सवाल यह है कि_ जब किसी टोल संचालन कंपनी का टेंडर समय समाप्त हो रहा है तो उससे पहले ही नए सिरे से यह प्रक्रिया पूरी क्यों नहीं की? और यदि यह कार्य अस्थाई रूप से कुछ दिनों के लिए एमपीएसडी फोर्स को दिया गया है तो अन्य एक दर्जन से अधिक टोल प्लाजाओं का नियमित संचालन इसी कंपनी द्वारा वर्षों से क्यों संचालित कराया जा रहा है। इस पूरे मामले में संलिप्त होने की अहम भूमिका सुनील वर्मा (सीई-टोल) की नजर आ रही है।

कानून क्या कहता है—और यहां क्या हुआ?

General Financial Rules (GFR), CVC Guidelines और Public Probity Doctrine ये तीनों साफ कहते हैं_ जिस कंपनी या व्यक्ति के विरुद्ध
जांच या सतर्कता कार्रवाई लंबित हो, उसे नया आर्थिक लाभ या सरकारी कार्य देना प्रतिबंधित है।

तो सवाल उठता है—*क्या एमपीआरडीसी प्रबंधन कानून से ऊपर है? *क्या जांच सिर्फ दिखावे के लिए थी? *क्या जांच समिति पहले से “मैनेज” थी?

प्रबंध संचालक व उप महाप्रबंधक की भूमिका संदेह के घेरे में
इन दोनों आदेशों के सामने आने के बाद यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रबंध संचालक भरत यादव
उप महाप्रबंधक (स्थापना) उमेश सिंह की भूमिका_ अनभिज्ञता नहीं बल्कि संभावित संलिप्तता की श्रेणी में आती है।
यदि जांच समिति वास्तव में स्वतंत्र थी, तो फिर जांच रिपोर्ट आने से पहले ही उसी संदिग्ध कंपनी को नया टोल सौंपने की जल्दी किस बात की थी?

जांच समिति भी सवालों के घेरे में !
सबसे बड़ा सवाल यही है कि-क्या जांच समिति को पहले से ही पता था कि रिपोर्ट का क्या हश्र होगा? या फिर रिपोर्ट आने से पहले ही ‘क्लीन चिट’ का भरोसा दे दिया गया था?
यदि ऐसा नहीं है, तो यह आदेश पूरी जांच प्रक्रिया को दूषित और अविश्वसनीय बना देता है।

जनता की आवाज बन कर युग क्रांति पूछता है_क्या यह महज़ प्रशासनिक चूक है या संगठित संरक्षण?
क्या एमपीएसडी फोर्स को बचाने के लिए जांच को कमजोर किया जा रहा है?
क्या लोकायुक्त, ईओडब्ल्यू या हाईकोर्ट इस पूरे घटनाक्रम का संज्ञान लेंगे?

एक तरफ जांच कमेटी, दूसरी तरफ नया वर्क ऑर्डर-यही एमपीआरडीसी की असली तस्वीर है। अब सवाल उठ चुके हैं, दस्तावेज सामने हैं_अब जवाब और कार्रवाई दोनों जरूरी हैं।

इनका क्या कहना है..

“तकरीबन 27 किलोमीटर की फोर लाइन पर संचालित महू घाटा टोल का 31 जनवरी तक कॉन्ट्रैक्ट श्रीजी मैनपॉवर के पास था और उसकी अवधि समाप्त होने के बाद अब यह कार्य एमपी एचडी फोर्स को दिया गया है”।
*पूनम कछवाह, डीएम एमपीआरडीसी, धार

“टाइम खत्म होने के बाद श्रीजी मैन पावर को टेंडर एक्सटेंड करने की बोला था मगर वह तैयार नहीं हुआ और नई दरों को लेकर सर्व वगैरह चल रहा था इसलिए समय रहते टेंडर प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी”,
इस पर संपादक तोमर ने अन्य टोलों पर लंबे समय से एमपीएडी फोर्स द्वारा संचालक पर सवाल खड़े किये तो उसका जवाब देने से बच के नजर आए
*सुनील वर्मा, सीई-टोल मप्र

“आपकी बात सही है कि किसी फर्म का समय खत्म होने से पहले ही टेंडर प्रक्रिया पूरी कर लेनी चाहिए मगर यह जिम्मेदारी सुनील वर्मा जी की है, यह उन्हीं का कार्य है। वह जैसा हमें बताते हैं- किस टोल का टेंडर कब लगना है उसी हिसाब से हम टेंडर कॉल करते हैं। फिलहाल मऊ-घाटा वाले वाले टोल नाके का टेंडर हो चुका है और इसकी टेक्निकल बिट खुल चुकी है फाइनेंसियल बिट खुलने शेष है जो जल्द ही खोलकर नया टेंडर अवार्ड हो जाएगा। अन्य टोल पर कौन सी फर्म, कैसे संचालन कर रही है यह सुनील वर्मा साहब अथवा वरिष्ठ प्रबंधन बता सकता है”।
*राकेश जैन ,सीई,ई-टेंडरिंग.भोपाल