ब्रेकिंग

ग्वालियर पंजीयन कार्यालय में किसका राज?

कलेक्टर की कार्रवाई के बाद भी नहीं थम रहा ‘प्राइवेट राज’, अब सब रजिस्ट्रार के कक्षों में खुलेआम दबंगई

ग्वालियर। जिला पंजीयन कार्यालय में सब रजिस्ट्रार के कक्ष सरकारी काम के लिए हैं या फिर प्राइवेट सर्विस प्रोवाइडरों और तथाकथित वकीलों के लिए? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि शिकायतें, वीडियो, खबरें और प्रशासनिक कार्रवाई_सब कुछ होने के बावजूद पंजीयन कार्यालय में वही तस्वीर बार-बार सामने आ रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि अब मामला निजी लोगों के कक्षों में बैठकर रजिस्ट्री संबंधी काम करने से आगे बढ़कर सरेआम दबंगई और गुंडागर्दी तक पहुंचता दिखाई दे रहा है।

दो मंजिला जिला पंजीयन कार्यालय की निचली मंजिल पर दो सर्कल के साथ/आठ सब रजिस्ट्रार रजिस्ट्री संपादन का काम करते हैं। ठीक इसी भवन की ऊपरी मंजिल पर डीआईजी और जिला पंजीयक वरिष्ठ जिला पजीयक के कार्यालय हैं और इनका रास्ता सब रजिस्ट्रार ऑप्शन से होकर ही जाता है। वर्तमान में जिला पंजीयक/वरिष्ठ जिला पजीयक के रूप में अशोक शर्मा पदस्थ हैं। यानी जिस व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं, उसकी निगरानी करने वाले अधिकारी उसी भवन में ऊपर मौजूद हैं। इसके बावजूद यदि निजी लोग/सर्विस प्रवाइडर्स सब रजिस्ट्रार के कक्षों में बैठकर रजिस्ट्री संपादन संबंधी काम करते हैं तो सवाल सीधा है—क्या यह सब जिम्मेदार अधिकारियों को दिखाई नहीं देता या फिर दिखाई देने के बावजूद नजरअंदाज किया जा रहा है?

कलेक्टर कार्रवाई बाद भी व्यवस्था फिर जस की तस

ग्वालियर पंजीयन कार्यालय में सर्विस प्रोवाइडरों की मनमानी कोई नया मामला नहीं है। समय-समय पर शिकायतें सामने आईं, वीडियो वायरल हुए और मीडिया में खबरें प्रकाशित हुईं। कलेक्टर और एसडीएम स्तर से संबंधित सर्विस प्रोवाइडरों के खिलाफ कार्रवाई भी की गई, जहां तक कि घर से ऑफिस चलाने वाले एक सब रजिस्ट्रार को निलंबित भी किया जा चुका है। लेकिन हर बार कार्रवाई के कुछ समय बाद वही व्यवस्था लौट आती है। यही सबसे बड़ा सवाल है—जब जिला प्रशासन कार्रवाई कर चुका है तो फिर पंजीयन विभाग के स्तर पर ऐसी व्यवस्था स्थायी रूप से खत्म क्यों नहीं होती?

यदि किसी सर्विस प्रोवाइडर अथवा निजी व्यक्ति को सब रजिस्ट्रार के कक्ष में रजिस्ट्री संबंधी काम करते हुए पाया जाता है तो केवल उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यह भी तय होना चाहिए कि वह व्यक्ति वहां बैठा किसकी अनुमति से था और संबंधित सब रजिस्ट्रार ने उसे रोकने के बजाय वहां काम करने क्यों दिया?

ऊपर डीआईजी और जिला पजीयक_ नीचे ‘प्राइवेट दरबार’

पंजीयन कार्यालय की सबसे विचित्र तस्वीर यही है कि नीचे उप पंजीयकों के जिन कक्षों में कथित रूप से निजी लोग सरकारी रजिस्ट्री प्रक्रिया में दखल देते दिखाई देते हैं, और यहीं से रोजाना निकाल कर उनसे ऊपरी मंजिल पर वरिष्ठ अधिकारी बैठे हैं। फिर भी व्यवस्था पर बार-बार सवाल उठते हैं।

डीआईजी खुमान सिंह से इस संबंध में सवाल किए जाने पर स्पष्ट जवाब के बजाय इधर-उधर के तर्क/बातें देना, जिला पजीयक अक्सर जांच करवाने की बात करते हैं जबकि सरेआम आंखों से सब स्पष्ट दिख रहा है और वरिष्ठ जिला पजीयक तो अपनी टेबल पर गांधीजी के चार बंदर बिठाकर हमेशा अपना दुखड़ा रोते रहे, हालांकि उनका यहां से स्थानांतरण हो चुका है। आंख बंद करके कार्यालय में बैठे ये वरिष्ठ अधिकारी जब सबूत के आधार पर ही एक्शन लेंगे तो वीडियो बनाना स्वाभाविक है, अब चाहे वह पत्रकार हो या आम आदमी। इसी के चलते हाल में पत्रकार के साथ बदशलूकी की गई जिसके पूर्णतया जिम्मेदार यही अधिकारीगण है।

जनता का सवाल अब यह है कि जांच कब तक और स्थाई कार्रवाई कब? इन तथाकथित सर्विस प्रोवाइडर द्वारा रजिस्ट्री संपादन कार्य में अनावश्यक इंवॉल्वमेंट और निज मुनाफे चलते गलत प्रविष्टियां तक की जा रही है जो कि ज़मीनी विवाद के बड़े कारण बन रही हैं।यदि एक ही कार्यालय में बार-बार वही शिकायत हो, वीडियो सामने आएं, कार्रवाई हो और फिर वही स्थिति दोबारा पैदा हो जाए तो समस्या केवल नीचे बैठे किसी निजी व्यक्ति की नहीं रह जाती। यह पूरे निगरानी तंत्र की विफलता बन जाती है।

एक दिन का औचक निरीक्षण बंद कर सकता है पूरा खेल

डीआईजी अथवा जिला पंजीयक चाहें तो इस कथित ‘प्राइवेट राज’ को एक ही दिन में खत्म किया जा सकता है। सभी सब रजिस्ट्रार के कक्षों का औचक निरीक्षण हो। वहां बैठे प्रत्येक व्यक्ति की पहचान और भूमिका की जांच हो। सीसीटीवी फुटेज खंगाले जाएं और यह देखा जाए कि कौन व्यक्ति नियमित रूप से किस अधिकारी के कक्ष में बैठता है और रजिस्ट्री संपादन से जुड़े कार्य में उसकी क्या भूमिका है।

यदि कोई अनधिकृत निजी व्यक्ति मिलता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई के साथ संबंधित सब रजिस्ट्रार की जवाबदेही भी तय हो। एक-दो सख्त कार्रवाई के बाद शायद किसी सर्विस प्रोवाइडर की हिम्मत न हो कि वह सरकारी अधिकारी के कक्ष को अपना निजी कार्यालय समझे।लेकिन सवाल यही है कि यह सरल कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई? सूत्रों की मानें तो वरिष्ठ अधिकारियों की कथित अनदेखी के पीछे वजह केवल लापरवाही नहीं है बल्कि यही तरीका काले धन का कुशल प्रबंधन बताया जाता है। यही तथाकथित लोग पंजीयन कार्यालय के “अधिकारियो और सेवाग्रहीता” के बीच की मजबूत कड़ी/ सेतु है इसीलिए इनका हटाया जाना नामुमकिन सा प्रतीत होता है!

इस तरह के आरोपों की शासन स्तर पर निष्पक्ष जांच जरूरी है। यदि आरोप गलत हैं तो जांच से स्थिति साफ हो जाएगी और यदि सही हैं तो यह पता चलना चाहिए कि आखिर किसके संरक्षण या मौन स्वीकृति से पंजीयन कार्यालय में यह कथित ‘प्राइवेट सिस्टम’ चल रहा है। जिसके लिए जिम्मेदारी तय करना भी अनिवार्य है। क्योंकि कलेक्टर कार्रवाई कर सकते हैं, एसडीएम कार्रवाई कर सकते हैं और पुलिस तक शिकायत पहुंच सकती है, लेकिन जिस कार्यालय में यह सब हो रहा है वहां बैठे आला अधिकारी इसे रोक क्यों नहीं पा रहे और तो और कलेक्टर द्वारा की गई करवाई से बहाली तक इन्हीं अधिकारियों के द्वारा किए जाने का आरोप सामने आ रहे हैं, यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल है।

पंजीयन कार्यालय में अब सिर्फ सर्विस प्रोवाइडरों पर कार्रवाई से काम नहीं चलेगा। यह पता लगाना होगा कि नीचे ‘प्राइवेट राज’ चलाने वालों के सिर पर ऊपर किसका हाथ है—और अगर किसी का हाथ नहीं है तो फिर जिम्मेदार अधिकारी अपनी आंखों के सामने चल रही इस व्यवस्था को रोक क्यों नहीं पा रहे हैं?