विकास के दावों के बीच कर्ज, अपराध, सड़कों की बदहाली, भ्रष्टाचार की शिकायतें और सरकारी तंत्र की जवाबदेही_आखिर जनता किस तस्वीर को सच माने?
*बृजराज सिंह*। एक समय था जब “अंधेर नगरी, चौपट राजा” सिर्फ व्यंग्य की कहावत थी। लेकिन आज यह सवाल बनकर सामने खड़ा है—क्या किसी प्रदेश की सरकार को केवल घोषणाओं, उद्घाटनों और बड़े-बड़े विकास दावों से परखा जाएगा, या फिर उसके सामने वे आंकड़े भी रखे जाएंगे जो सरकारी फाइलों, CAG की रिपोर्टों, विधानसभा के जवाबों और आधिकारिक बजट दस्तावेजों से निकलकर सामने आ रहे हैं?
यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक तरफ सत्ता लगातार विकास, रोजगार, निवेश, शिक्षा और कानून-व्यवस्था में सुधार के दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ संवैधानिक ऑडिट संस्था और सरकारी आंकड़े व्यवस्था की कई कमजोर कड़ियों की ओर इशारा कर रहे हैं।
कर्ज बढ़ रहा है, जवाबदेही कितनी बढ़ी?
2026-27 के बजट के मुताबिक राज्य की कुल बकाया देनदारियां वर्ष के अंत तक GSDP की 32.5 प्रतिशत रहने का अनुमान है। इसी बजट में लगभग 71,458 करोड़ रुपये का राजकोषीय घाटा अनुमानित है। 2025-26 में राजकोषीय घाटा संशोधित अनुमान के अनुसार GSDP का 4.5 प्रतिशत था।
और भी महत्वपूर्ण बात यह है कि 2026-27 में सरकार के अनुमान के मुताबिक वेतन, पेंशन और ब्याज जैसे प्रतिबद्ध खर्चों पर 1.37 लाख करोड़ रुपये से अधिक खर्च होना है—जो राजस्व प्राप्तियों का लगभग 45 प्रतिशत है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि सरकार कितना खर्च कर रही है। सवाल यह है कि कर्ज और खर्च के अनुपात में जनता को स्थायी परिसंपत्तियां, गुणवत्तापूर्ण सेवाएं और जवाबदेह शासन कितना मिल रहा है?
सड़कें विकास का आईना हैं या भुगतान की मशीन?
सड़कों को विकास का सबसे प्रत्यक्ष चेहरा कहा जाता है। लेकिन CAG की सड़क संबंधी प्रदर्शन ऑडिट रिपोर्ट ने निर्माण और भुगतान व्यवस्था को लेकर गंभीर टिप्पणियां दर्ज की हैं।
रिपोर्ट में 82 सड़क कार्यों में कुल 22.35 करोड़ रुपये की रॉयल्टी कम वसूलने का मामला सामने आया। एक अन्य मामले में गलत आधार दर अपनाने से 68.96 लाख रुपये के अतिरिक्त भुगतान की बात ऑडिट ने दर्ज की।
यह आंकड़ा किसी विपक्षी भाषण का हिस्सा नहीं है। यह CAG की ऑडिट प्रक्रिया से निकला दस्तावेजी तथ्य है।और जब सड़कें बारिश में उखड़ती हैं, गड्ढों में बदलती हैं या निर्माण के कुछ ही समय बाद मरम्मत की जरूरत पड़ती है, तब सवाल सिर्फ ठेकेदार से नहीं पूछा जाना चाहिए। सवाल उस पूरी सरकारी श्रृंखला से होना चाहिए जो टेंडर से लेकर डिजाइन, निरीक्षण, माप पुस्तिका, भुगतान और गुणवत्ता नियंत्रण तक जिम्मेदार है।
भ्रष्टाचार पर सबसे बड़ा सवाल: शिकायतें कितनी, कार्रवाई कितनी?
आर्थिक अपराधों की जांच करने वाली राज्य की EOW के संबंध में सामने आए आंकड़े भी गंभीर सवाल पैदा करते हैं।अगस्त 2026 की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 से जून 2026 के बीच EOW को 23,261 शिकायतें मिलीं, लेकिन इस अवधि में केवल 258 आपराधिक मामले दर्ज हुए और महज 9 मामलों में चार्जशीट दाखिल होने की जानकारी सामने आई।
यह आंकड़ा अपने आप में किसी शिकायत को सही या गलत साबित नहीं करता। लेकिन यह जरूर पूछता है कि हजारों शिकायतों के बीच जांच और अभियोजन की गति इतनी सीमित क्यों रही? भ्रष्टाचार के खिलाफ शून्य सहनशीलता का दावा तभी विश्वसनीय बनता है जब शिकायत से जांच, जांच से FIR और FIR से अभियोजन तक पूरी प्रक्रिया दिखाई दे।
CAG ने खोली सरकारी व्यवस्था की कई परतें
जुलाई 2026 में CAG की राज्य वित्त रिपोर्ट सामने आई। इसी अवधि में मनरेगा, आंगनवाड़ी, ग्रामीण रोजगार, स्कूल शिक्षा और अन्य क्षेत्रों से जुड़ी कई ऑडिट रिपोर्टें भी सामने आईं।
वित्तीय प्रबंधन से जुड़ी पिछली CAG रिपोर्ट में 3,157 मामलों में 40.02 करोड़ रुपये की हेराफेरी, नुकसान या चोरी से संबंधित मामले लंबित पाए गए थे। इनमें वन एवं वन्यजीव, स्कूल शिक्षा और पुलिस सहित कई विभाग शामिल थे। उसी रिपोर्ट के अनुसार 56 सरकारी उपक्रमों/निगमों/कंपनियों के खाते वर्षों से लंबित थे और 23 उपक्रम घाटे में चल रहे थे। दो संस्थाओं—आदिवासी वित्त एवं विकास निगम तथा राज्य सड़क परिवहन निगम—के खाते क्रमशः 18 और 16 वर्षों से लंबित बताए गए।
यह सवाल किसी एक विभाग का नहीं है। यह शासन की उस संस्कृति का सवाल है जिसमें फाइलें चलती हैं, योजनाएं बनती हैं, बजट खर्च होता है—लेकिन जवाबदेही अक्सर पीछे छूट जाती है।
अपराध के आंकड़े भी सवाल पूछ रहे हैं
कानून-व्यवस्था पर भी तस्वीर एकतरफा नहीं है।
2024 में प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 32,832 मामले दर्ज हुए। यह आंकड़ा 2023 के 32,342 मामलों से अधिक था। 2020 में यह संख्या 25,640 थी।
विधानसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के आधार पर दिसंबर 2023 से जून 2025 के बीच प्रदेश में 2,691 हत्याएं और 10,626 बलात्कार के मामले दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। सरकार ने साथ ही कहा था कि कुल अपराध दर में वृद्धि नहीं हुई है।
दोनों तथ्यों को साथ पढ़ना जरूरी है। सरकार के पास अपराध नियंत्रण को लेकर अपना पक्ष और आंकड़े हैं। लेकिन पीड़ित परिवारों के लिए सवाल अपराध दर की तकनीकी परिभाषा नहीं, बल्कि सुरक्षा, FIR, जांच, अभियोजन और न्याय की वास्तविक गति है।
शिक्षा में घोषणाएं बनाम जमीनी प्रबंधन
स्कूल शिक्षा पर CAG की रिपोर्ट ने भी मानव संसाधन प्रबंधन से जुड़ी कमियां दर्ज की हैं। ऑडिट के अनुसार राज्य के सरकारी स्कूलों में लाखों विद्यार्थी और बड़ी संख्या में शिक्षक हैं, लेकिन स्कूल शिक्षा की राष्ट्रीय Performance Grading Index व्यवस्था में प्रदेश ‘Aspirational-I’ श्रेणी में था।
यहां भी सवाल यही है—बजट बढ़ना और भवन बनना पर्याप्त है या शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, प्रशिक्षण और बच्चों के वास्तविक learning outcomes को भी शासन की सफलता का पैमाना बनाया जाएगा?
पानी की योजनाओं में भी ऑडिट की चोट
जल जीवन मिशन जैसे बड़े कार्यक्रम को लेकर भी CAG की रिपोर्ट ने योजनाओं के चयन और क्रियान्वयन पर सवाल उठाए। रिपोर्ट में कुछ योजनाओं को पर्याप्त feasibility studies और project reports के बिना स्वीकृत किए जाने तथा SC/ST बहुल क्षेत्रों की प्राथमिकताओं की अनदेखी से संबंधित टिप्पणियां सामने आईं। यानी समस्या केवल पैसा खर्च करने की नहीं है।
पैसा कहां खर्च हुआ, किस योजना पर खर्च हुआ, किस गुणवत्ता से काम हुआ और उसका लाभ वास्तव में किसे मिला—असल शासन की परीक्षा यहीं होती है।
दावों और दस्तावेजों के बीच खड़ा प्रदेश

सत्ता का पक्ष भी दर्ज होना चाहिए। मुख्यमंत्री ने हाल के सार्वजनिक बयानों में प्रदेश में मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ने, मेडिकल सीटों में वृद्धि, बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ने और रोजगार की स्थिति बेहतर होने का दावा किया है। उन्होंने पुलिस और स्कूल शिक्षा विभाग में चल रही भर्तियों का भी उल्लेख किया।
सरकार ने शिक्षा में प्राथमिक स्कूल ड्रॉपआउट घटने और शिक्षा बजट में भारी वृद्धि का दावा भी किया है, लेकिन यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
सरकार के दावे बनाम ऑडिट की टिप्पणियां। बजट के आंकड़े बनाम जमीन पर सेवाओं की गुणवत्ता। सड़क निर्माण के भुगतान बनाम सड़क की उम्र। भ्रष्टाचार की शिकायतें बनाम जांच और अभियोजन। अपराध के आंकड़े बनाम नागरिक की सुरक्षा। भर्ती की घोषणाएं बनाम स्थायी रोजगार।
यही वह अंतर है जिसे पाटना किसी भी सरकार की सबसे बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी है।
जनता को भाषण नहीं, हिसाब चाहिए
लोकतंत्र में सरकार का मूल्यांकन प्रचार सामग्री से नहीं, परिणाम और जवाबदेही से होता है।
यदि सड़क के निर्माण में ऑडिट आपत्ति है तो जिम्मेदार कौन? यदि सरकारी धन के नुकसान के हजारों मामले लंबित हैं तो कार्रवाई कब? यदि आर्थिक अपराधों की हजारों शिकायतों के मुकाबले FIR और चार्जशीट की संख्या इतनी कम है तो कारण क्या? यदि कर्ज बढ़ रहा है तो उससे बनी स्थायी परिसंपत्तियों का हिसाब कहां है? यदि अपराध नियंत्रण बेहतर है तो पीड़ितों को समयबद्ध न्याय क्यों नहीं?यदि शिक्षा में बजट बढ़ा है तो learning outcomes और शिक्षक व्यवस्था की स्वतंत्र तस्वीर क्या कहती है?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या सत्ता जनता को केवल उपलब्धियों की सूची सुनाएगी या CAG की आपत्तियों, लंबित मामलों, वित्तीय बोझ और प्रशासनिक विफलताओं का भी उतनी ही ईमानदारी से हिसाब देगी?
“अंधेर नगरी” कह देना आसान है।“चौपट व्यवस्था” का प्रमाण देना उससे कठिन, लेकिन जब CAG की रिपोर्ट, बजट के आंकड़े, अपराध के सरकारी रिकॉर्ड और विभागीय जवाब एक साथ मेज पर रखे जाते हैं, तब सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं रह जाता, बल्कि सवाल शासन का हो जाता है।और लोकतंत्र में आखिरकार सबसे बड़ा सवाल यही है—
सत्ता किसकी है, यह चुनाव तय करता है; लेकिन सत्ता ने जनता के लिए क्या किया और क्या बिगाड़ा, इसका हिसाब आंकड़े तय करते हैं।
