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करीब ₹24 लाख का सरिया बना ‘टेस्ट केस’! सूचना मिली, अधिकारी पहुंचे, फिर भी कार्रवाई बेअसर

अनय द्विवेदी के कार्यकाल में एनफोर्समेंट पर सवाल: क्या चेकिंग अधिकारों पर रोक से टैक्स चोरों को खुली छूट? एक ट्रक की कार्रवाई से खुली व्यवस्था की पोल

भोपाल 14 सितंबर 2026। सरकार के राजस्व का सवाल हो तो कभी एक-एक रुपये की वसूली को लेकर अफसरों से जवाब मांगा जाता था। लेकिन मध्यप्रदेश के वाणिज्यकर विभाग में मौजूदा व्यवस्था को लेकर सामने आया एक मामला यह सवाल खड़ा कर रहा है कि जब विभाग को टैक्स चोरी की सूचना वाहन नंबर, माल की कीमत, रूट और गंतव्य सहित पहले से दे दी जाए, तब भी यदि मौके पर मौजूद अधिकारी कार्रवाई करने में सक्षम न हों तो आखिर सरकार का राजस्व कौन बचाएगा?

यह मामला करीब ₹24 लाख के TMT सरिए से जुड़े वाहन MP16 ZM 1110 का है। उपलब्ध सूचना के मुताबिक वाहन 11 सितंबर 2026 को रायपुर से चला था और इसमें करीब ₹24 लाख का TMT सरिया बिना बिल और ई-वे बिल के छतरपुर पहुंचने की जानकारी थी। वाहन को 13 सितंबर की सुबह छतरपुर में नौगांव रोड, क्रिश्चियन स्कूल के पीछे स्थित बुंदेलखंड मेटालिक में माल खाली करना था।

आयुक्त को पहले सूचना, फिर छतरपुर विभाग को अलर्ट

इस मामले में 12 सितंबर को दिन में स्वयं वाणिज्यकर आयुक्त अनय द्विवेदी को सूचना दी गई। इसके बाद वाहन के माल खाली करने से पहले उसी दिन शाम को छतरपुर जीएसटी विभाग को भी पूरी सूचना दी गई। यानी विभाग के सामने कोई सामान्य या अज्ञात शिकायत नहीं थी। वाहन नंबर था, माल का प्रकार था, अनुमानित कीमत थी, रायपुर से रवाना होने की जानकारी थी और छतरपुर में संभावित डिलीवरी प्वाइंट तक बताया गया था।

छतरपुर के अधिकारी मौके पर पहुंचे भी, लेकिन यहां इस कथित व्यवस्था की असली तस्वीर सामने आई। जानकारी के अनुसार मौके पर मौजूद अधिकारियों ने बताया कि उनके पास संबंधित वाहन को रोककर मोबाइल चेकिंग अथवा जब्ती-पेनल्टी की कार्रवाई करने का आवश्यक अधिकार नहीं है। साथ ही सहायक आयुक्त ने कथित रूप से बिना बिल माल होने की पुष्टि भी की और ऑनलाइन कार्रवाई किए जाने की बात कही। सवाल यह है कि जब चोरी रोकने का मौका सामने खड़ा था तो कार्रवाई ऑनलाइन होने तक क्यों सीमित रह गई?

कानून में कार्रवाई का प्रावधान, फिर हाथ क्यों बंधे?

GST व्यवस्था में माल परिवहन की जांच के लिए धारा 68 और Rule 138B जैसे प्रावधान मौजूद हैं। वहीं बिना वैध दस्तावेजों के माल परिवहन पाए जाने पर परिस्थितियों के अनुसार धारा 129 के तहत कर और दंड की कार्रवाई का प्रावधान है। ऐसे में इस मामले का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कानून में कार्रवाई का प्रावधान है या नहीं। सवाल यह है कि क्या वर्तमान आयुक्त की व्यवस्था में फील्ड अधिकारियों को संदिग्ध वाहनों की तत्काल जांच और कार्रवाई के लिए पर्याप्त अधिकार उपलब्ध हैं?

यदि किसी अधिकारी को अधिकार नहीं दिया गया और वह बिना अधिकृत किए वाहन रोकता है तो बाद में उसकी कार्रवाई कानूनी विवाद में फंस सकती है। लेकिन इसका दूसरा पहलू और ज्यादा गंभीर है—यदि अधिकारी को अधिकार ही नहीं दिया गया तो सरकार का एनफोर्समेंट अमला सड़क पर खड़ी टैक्स चोरी को रोक कैसे पाएगा?

एक ट्रक से लाखों का सवाल, प्रदेश में कितने वाहन निकल गए?

₹24 लाख के सरिए पर यदि 18 प्रतिशत GST की गणना की जाए तो अकेला कर ही करीब ₹4.32 लाख बैठता है। इसके अतिरिक्त धारा 129 के लागू प्रावधानों के तहत दंड की स्थिति बनने पर सरकारी मांग इससे कहीं अधिक ₹ 5-7 लाख हो सकती है। यानी यह सिर्फ एक ट्रक रोकने का मामला नहीं था, बल्कि लाखों रुपये के संभावित राजस्व की वसूली का अवसर था और यही इस पूरे मामले को गंभीर बनाता है।

यदि एक विशिष्ट वाहन की जानकारी 12 सितंबर को आयुक्त स्तर तक पहुंचती है, उसके बाद छतरपुर के अधिकारियों को भी सूचना मिलती है, अधिकारी मौके तक पहुंचते हैं और फिर भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक प्रशासनक की मनमानी है या विभाग की पूरी एनफोर्समेंट नीति ही टैक्स चोरी रोकने के बजाय अधिकारियों के हाथ बांध रही है? किसी अधिकारी को अधिकार एवं शक्तियां विधान से प्राप्त हैं तो आखिरकार आयुक्त द्विवेदी को यह अधिकार एवं शक्तियां कहां से प्राप्त है जो टैक्स चोरी रोकने एवं राजसी कोश को बढ़ाने के प्रावधानों (जैसे वाहन चेकिंग छापा कार्यवाही) पर विराम लगाता है?

आयुक्त की कार्यप्रणाली की जांच जरूरी

इस एक मामले को टेस्ट केस मानकर विभाग की कार्यप्रणाली की जांच की जाए तो कई सवालों के जवाब सामने आ सकते हैं— पिछले महीनों में बिना बिल और ई-वे बिल वाले कितने वाहनों पर मौके पर कार्रवाई हुई? कितनी धारा 129 की कार्रवाई हुई? उससे शासन को कितना राजस्व मिला? और कितनी ऐसी सूचनाएं आईं जिन पर मौके पर कार्रवाई नहीं हो सकी?

इन सवालों का जवाब केवल वाणिज्यकर विभाग की कार्यप्रणाली स्पष्ट नहीं करेगा, बल्कि यह भी बताएगा कि मध्यप्रदेश सरकार का राजस्व तंत्र टैक्स चोरी रोकने के लिए वास्तव में कितना सक्रिय है।

सबसे बड़ा सवाल तो वित्त मंत्री जगदीश देवड़ा और प्रमुख सचिव अमित राठौर से भी है—जब सरकार के पास कानून है, एनफोर्समेंट अमला है और टैक्स चोरी की सूचना भी समय रहते उपलब्ध है, तो फिर राजस्व बढ़ाने वाली मौके की कार्रवाई के रास्ते में प्रशासनिक बंदिशें क्यों हैं?

एक ट्रक पकड़ा जाता तो सरकार को लाखों की वसूली होती। लेकिन सवाल यह है कि ऐसे कितने ट्रक बिना पकड़े निकल रहे हैं? अब यह ₹24 लाख के सरिए का मामला नहीं, मध्यप्रदेश के राजस्व की निगरानी व्यवस्था का टेस्ट है।