ब्रेकिंग

एनजीटी की सख्ती से खुले मध्यप्रदेश के जल-संकट के राज: भोपाल में तालाबों की हद और केरवा का पानी सवालों में, ग्वालियर तक पहुंचा सीवेज का संकट

अतिक्रमण से लेकर सीवेज तक_NGT के निशाने पर सरकारी तंत्र; सवाल यह कि जलस्रोत बचाने की जिम्मेदारी आखिर निभाएगा कौन?

भोपाल/ग्वालियर। मध्यप्रदेश के जलस्रोतों और पर्यावरणीय व्यवस्था को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) की लगातार सख्ती अब केवल कागजी चेतावनी तक सीमित नहीं रह गई है। भोपाल में बड़ा तालाब, कलियासोत और केरवा की सीमा, अतिक्रमण तथा पानी के बहाव को लेकर अधिकरण के निर्देशों के बाद सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सीधे सवाल खड़े हो रहे हैं। दूसरी ओर प्रदेश के सीवेज प्रबंधन से जुड़े मामले में ग्वालियर समेत कई बड़े शहरों की स्थिति NGT के सामने चिंता का विषय बनी हुई है।

केरवा में पानी बहता रहा, सर्वे रुक गया—NGT ने 15 दिन दिए

कैरवा डैम क्षेत्र में अतिक्रमण

15 सितंबर को सामने आए घटनाक्रम के बाद मामला और गंभीर हुआ। NGT के निर्देश पर जलाशयों के Full Tank Level (FTL) की वास्तविक स्थिति और अतिक्रमणों की जांच के लिए गठित समिति ने केरवा में ग्राउंड-ट्रुथिंग शुरू करनी चाही, लेकिन FTL को लेकर स्थिति स्पष्ट न होने के कारण सर्वे पूरा नहीं हो सका।

इसी विवाद के बीच NGT ने जल संसाधन विभाग को केरवा से कथित लगातार हो रहे पानी के बहाव को 15 दिन के भीतर रोकने का निर्देश दिया। समिति की रिपोर्ट में कलियासोत का ड्रोन सर्वे और ग्राउंड-ट्रुथिंग पूरी होने की बात सामने आई, जबकि केरवा का काम अधूरा रह गया। तकनीकी रिपोर्ट में जियो-टैगिंग, सैटेलाइट इमेजरी, रिमोट सेंसिंग, ड्रोन सर्वे और वीडियोग्राफी को शामिल किया जाना है। मामले की अगली सुनवाई 30 सितंबर 2026 को है।

यहां सबसे बड़ा सवाल पानी का नहीं, व्यवस्था की निगरानी का है—अगर जलाशय की वास्तविक सीमा तय करने के लिए NGT को हस्तक्षेप करना पड़ रहा है और सर्वे के दौरान ही पानी के बहाव को लेकर विवाद खड़ा हो रहा है, तो इतने वर्षों से जलस्रोतों की निगरानी करने वाली सरकारी एजेंसियां क्या कर रही थीं?

कलियासोत में मिले निर्माण, अब अफसरों की जवाबदेही भी सवाल में

5 से 9 सितंबर तक हुए विशेष सर्वे में बड़ा तालाब और कलियासोत के FTL क्षेत्र में सड़क, फार्म हाउस, रेस्टोरेंट तथा अन्य निर्माणों की जानकारी सामने आई। कलियासोत के बफर क्षेत्र में भी कई निर्माण पाए जाने की रिपोर्ट सामने आई है।

कलियासोत के आसपास अतिक्रमणइसके बाद 16 सितंबर को भोज वेटलैंड और भोपाल के जल निकायों से जुड़े मामलों की सुनवाई में NGT ने केवल अतिक्रमणकारियों पर कार्रवाई की बात नहीं की, बल्कि उन अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर भी जोर दिया जिनकी लापरवाही या निष्क्रियता से सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे और निर्माण की स्थिति बनी।

मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने अंतरिम कार्रवाई रिपोर्ट पेश की और विस्तृत रिपोर्ट के लिए चार सप्ताह का समय मांगा। NGT ने विस्तृत रिपोर्ट अगली सुनवाई से पहले प्रस्तुत करने को कहा है। इन मामलों की अगली सुनवाई 6 अक्टूबर को होगी। यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तालाब की जमीन पर किसने कब्जा किया? सवाल यह भी है कि कब्जा होते समय सरकारी अमला कहां था और कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

ग्वालियर भी अछूता नहीं—सीवेज का बोझ जलस्रोतों तक

मध्यप्रदेश के सीवेज प्रबंधन से जुड़े NGT मामले में प्रदेश के 61 नगरीय निकायों के 12,67,626 घरों के सीवर नेटवर्क से बाहर होने तथा 352 नगरीय निकायों में सीवेज सिस्टम की कमी का मुद्दा सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के नगरीय निकायों के 1,315 नालों से लगभग 637 एमएलडी सीवेज और सिल्लेज विभिन्न जलस्रोतों में पहुंच रहा है। NGT ने भोपाल, इंदौर, उज्जैन, जबलपुर के साथ ग्वालियर को भी उन बड़े शहरों में शामिल किया है जहां नालों के माध्यम से सीवेज डिस्चार्ज की समस्या दर्ज की गई है।

इसका अर्थ साफ है—एक तरफ राजधानी में तालाबों की सीमा और अतिक्रमण पर NGT को सरकारी तंत्र को लगातार निर्देश देने पड़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ ग्वालियर जैसे बड़े शहर में सीवेज का सवाल अभी भी समाधान की प्रतीक्षा में है।

स्वर्णरेखा ग्वालियरजलस्रोत बचाने के लिए कानून मौजूद हैं, एजेंसियां मौजूद हैं और बजट भी है। फिर बार-बार NGT को ही हस्तक्षेप क्यों करना पड़ रहा है? यह सवाल अब सिर्फ पर्यावरण का नहीं, जवाबदेही और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का सवाल बन चुका है।