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ट्रांसफर नीति ताक पर, सालों से एक ही जगह जमे अधिकारी-कर्मचारी

पारदर्शी सिस्टम और बेहतर कार्यप्रणाली के लिए जरूरी है ट्रांसफर पॉलिसी का पालन,

लंबे समय तक एक ही जगह रहने से पनपता है भ्रष्टाचार का समानांतर सिस्टम

भोपाल/ग्वालियर। मध्य प्रदेश शासन की सामान्य ट्रांसफर नीति के अनुसार किसी भी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी को एक ही जगह, जैसे एक ही जिले अथवा एक ही सीट पर, सामान्यतः तीन साल से अधिक नहीं रखा जाता। निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद प्रशासनिक आवश्यकताओं के तहत उनका स्थानांतरण किया जाता है। लेकिन प्रदेश के आबकारी सहित तमाम विभागों में ट्रांसफर नीति की यह व्यवस्था कागजों तक सीमित नजर आ रही है।

कई अधिकारी-कर्मचारी एक ही जिले में 8, 10 और यहां तक कि 15-17 वर्षों से जमे हुए हैं। स्थिति यह है कि आठ साल बाद जारी हुए ट्रांसफर आदेश का भी पालन नहीं हो रहा है।

इंदौर से सागर तक वर्षों से जमे अधिकारी

आबकारी विभाग में लंबे समय से एक ही जगह जमे रहने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की सूची भी सवाल खड़े करती है। इंदौर में ADEO कमलेश सोलंकी करीब 12 साल से पदस्थ बताए जा रहे हैं। सब इंस्पेक्टर मीरा सिंह और सब इंस्पेक्टर आशीष जैन को भी इंदौर में करीब 8 वर्ष हो चुके हैं। रतलाम में सब इंस्पेक्टर पुष्पराज चौहान करीब 9 साल से पदस्थ बताए जा रहे हैं। वहीं सागर में ADEO मंजूषा सोनी को करीब 17 साल हो चुके हैं। इसके अलावा कई अन्य जिलों में भी यही स्थिति बताई जा रही है। आरक्षकों के मामले में तो इंदौर, धार, मंदसौर और भोपाल जैसे जिलों में 15 से 20 साल तक एक ही जिले में पदस्थ रहने के मामले सामने आ रहे हैं।

तीन महीने बाद भी ट्रांसफर आदेश का पालन नहीं

ऐसा ही एक मामला इंदौर का है। आबकारी विभाग के उप निरीक्षक आशीष कुमार जैन का स्थानांतरण आदेश 16 जून 2026 को इंदौर से सीहोर किया गया था। आदेश जारी हुए करीब तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद वे इंदौर में ही पदस्थ हैं। बताया जाता है कि वर्तमान में उनके पास इंदौर के दो सर्कल—मालवा मिल ए और छावनी—का प्रभार है।

नियम के अनुसार ट्रांसफर आदेश के बाद अधिकारी-कर्मचारी को अधिकतम दो सप्ताह तक वर्तमान पदस्थापना पर रोका जा सकता है। यदि कोई विशेष परिस्थिति या प्रशासनिक कारण हो तो शासन की अनुमति से इस अवधि को आगे बढ़ाया जा सकता है। इसके बाद शासन को एकतरफा रूप से संबंधित अधिकारी को रिलीव करने का अधिकार है।

ऐसे में सवाल उठता है कि सीहोर तबादले के करीब तीन महीने बाद भी आशीष जैन को इंदौर से रिलीव नहीं करने की आखिर क्या वजह है? क्या इंदौर के आबकारी सहायक आयुक्त अभिषेक तिवारी के लिए उनकी मौजूदगी इतनी जरूरी है कि स्थानांतरण आदेश के बावजूद उन्हें कार्यमुक्त नहीं किया जा रहा? यदि आशीष जैन को दो-दो सर्कल का प्रभार दिया जा सकता है तो उनके कार्यमुक्त होने के बाद यही प्रभार इंदौर में मौजूद किसी अन्य अधिकारी को क्यों नहीं सौंपा जा सकता?

विभागीय सफाई भी खड़े करती है सवाल

इस मामले में आबकारी सहायक आयुक्त इंदौर का कहना है कि स्वीकृत 22 सब इंस्पेक्टर पदों के मुकाबले वर्तमान में केवल 13 सब इंस्पेक्टर हैं। इनमें से एक का हाल ही में प्रमोशन हुआ है और वह ट्रेनिंग पर है। इसी वजह से अभी तक आशीष जैन को रिलीज नहीं किया गया है। अधिकारी के अनुसार इंदौर की वस्तुस्थिति से शासन को अवगत कराते हुए आवश्यक आग्रह किया गया है।

वहीं संभागीय आबकारी उपायुक्त इंदर सिंह जामोद ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि इस मामले में जवाब देने और जिम्मेदारी संबंधित अधिकारी की है।

क्या इंदौर में चल रहा है समानांतर सिस्टम?

सूत्रों का दावा है कि इंदौर के आबकारी विभाग में सहायक आयुक्त अभिषेक तिवारी का इतना प्रभाव है कि उनके रहते विभागीय स्तर पर फैसलों और व्यवस्थाओं में उन्हीं की भूमिका प्रमुख रहती है। सूत्र इसे विभाग के भीतर एक तरह की “समानांतर सत्ता” के रूप में बताते हैं और आशीष कुमार जैन को इस व्यवस्था का करीबी बताया जाता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि होना बाकी है।

इसी कथित प्रभाव और विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करने वाला एक मामला तुलसी नगर कॉलोनी इंदौर में पकड़ी गई अवैध फैक्ट्री का भी है। इस मामले में अंतरराष्ट्रीय तार जुड़े होने की संभावना को लेकर बड़े-बड़े दावे और बयान सामने आए थे, लेकिन सूत्रों का आरोप है कि आबकारी विभाग की जांच कार्रवाई अंततः महज औपचारिकता बनकर रह गई।

अब बड़ा सवाल यही है कि यदि सरकार की ट्रांसफर नीति पारदर्शी प्रशासन और बेहतर कार्यप्रणाली के लिए बनाई गई है, तो उसका पालन सुनिश्चित कौन करेगा? जब ट्रांसफर आदेश जारी होने के बाद भी अधिकारी महीनों तक उसी जगह जमे रहेंगे और लंबे समय से एक ही जिले में पदस्थ लोगों पर कार्रवाई नहीं होगी, तो फिर इस व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे सुनिश्चित होगी?