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सुगम परिवहन या ‘बस खरीदी’ घोटाले की आशंका? रैपिंग के नीचे छिपा सच तलाशने की जरूरत

करोड़ों की बसें, लेकिन सड़क पर उतरते ही सवालों की बौछार_नई बसों के दावे के बीच पुराने बेड़े की हालत ने खड़े किए गंभीर सवाल

भोपाल 26 सितंबर 2026। मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा को प्रदेश में तकरीबन 21 साल बाद सार्वजनिक परिवहन की बड़ी वापसी के रूप में पेश किया गया है। जिसे 25 सितंबर को 351 बसों को मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव एवं केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी व प्रदेश के उपमुख्यमंत्री और मंत्रियों की उपस्थिति में हरी झंडी दिखाकर सेवा शुरू की गई, उसकी सच्चाई की परतें भी पहले दिन से खुलना शुरू हो गई हैं।

सरकार ने यात्रियों को सुरक्षित, सुगम और आधुनिक परिवहन देने के लिए अगले पांच वर्षों में प्रदेश के 3500 से अधिक मार्गों पर चरणबद्ध तरीके से 15 हजार से अधिक बसें संचालित करने के  दावे किए हैं। लेकिन अब असली सवाल बसों के उद्घाटन का नहीं, बसों की वास्तविक हालत और उनकी खरीद/व्यवस्था पर खर्च हुए पैसे का है।

मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवाजमीन पर सामने आ रही तस्वीरों और उपलब्ध रिपोर्टों ने सरकार के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 351 बसों में 180 इलेक्ट्रिक बसें हैं, जबकि 171 बसें पहले से अलग-अलग शहरों में सिटी बस सेवा के रूप में चल रही थीं। भोपाल की 58 बसें भी पुराने बेड़े का हिस्सा हैं और इनमें अधिकांश 2018-19 मॉडल की बताई गई हैं। इन बसों को नई व्यवस्था के तहत नया रंग और रेडियम देकर शामिल किया गया है।

यहीं से शुरू होता है सबसे बड़ा सवाल—अगर बस पहले से सरकारी/शहरी परिवहन व्यवस्था में चल रही थी तो उसे मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा की नई बस के रूप में प्रस्तुत करने और उस पर हुए खर्च का पूरा हिसाब जनता के सामने क्यों नहीं रखा जा रहा?

रैपिंग से बस नई हो गई या सिर्फ चेहरा बदला गया?

दावा किया जा रहा है कि करीब 1 करोड़ 30 लाख रुपये कीमत की बसों में यात्रियों के लिए आधुनिक सुविधाएं हैं। लेकिन सवाल यह है कि यह कीमत किस बस की है, किस कंपनी/ऑपरेटर ने बस खरीदी, खरीद आदेश किस तारीख को जारी हुआ, टेंडर किसने किया और भुगतान किस मद से किया गया? और यदि कुछ बसें पहले से चल रही थीं तथा उन पर केवल नया रंग, रैपिंग और रेडियम लगाया गया है, तो फिर नई बस और पुराने बस बेड़े को नया लुक देने के बीच का फर्क जनता को कौन समझाएगा?

सिर्फ बाहर से चमकदार रैप चढ़ा देने से किसी वाहन की उम्र, इंजन की हालत, सस्पेंशन, ब्रेकिंग सिस्टम, टायर, वायरिंग, सीटें, एयर कंडीशनिंग, सीसीटीवी, पैनिक बटन और अन्य सुरक्षा उपकरण नए नहीं हो जाते। इसलिए अब सवाल बेहद सीधा है—बस की बॉडी पर नया चेहरा किस पैसे से चढ़ाया गया और बस के भीतर यात्रियों को वास्तव में क्या मिला?

खरीदी किसने की? कीमत कितनी? भुगतान किसे हुआ?

इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण जांच का विषय यही होना चाहिए।

जिन बसों को नई बताया जा रहा है, उनकी खरीद किसने की?

  • खरीद का टेंडर किस विभाग/कंपनी ने जारी किया?
  • बस की मूल खरीद कीमत कितनी थी?
  • प्रति बस ₹1.30 करोड़ का आंकड़ा किस दस्तावेज पर आधारित है?
  • बस का मॉडल और निर्माण वर्ष क्या है?
  • क्या बस बिल्कुल नई खरीदी गई या पहले से चल रहे बेड़े को नई व्यवस्था में शामिल किया गया?
  • रैपिंग, पेंटिंग और रेडियम पर कितना खर्च हुआ?
  • सीसीटीवी और पैनिक बटन वास्तव में चालू हैं या सिर्फ कागज पर?
  • फिटनेस प्रमाणपत्र किस तारीख को जारी हुए?
  • रखरखाव की जिम्मेदारी किस कंपनी/ऑपरेटर की है?
  • और सबसे महत्वपूर्ण—सरकारी खजाने से कुल कितना भुगतान हुआ और किसे हुआ?

जब तक इन सवालों के जवाब खरीद आदेश, बिल, टेंडर, वर्क ऑर्डर और भुगतान दस्तावेजों के साथ सार्वजनिक नहीं होते, तब तक “नई बस” का दावा खुद एक बड़े ऑडिट का विषय बना रहेगा।

असली परीक्षा सड़क पर होगी

सरकार ने मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा को आधुनिक तकनीक, सुरक्षा और बेहतर यात्री सुविधा से जोड़कर प्रस्तुत किया है। आधिकारिक योजना में बसों की निगरानी, सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए व्यवस्थाओं की बात कही गई है। लेकिन जनता को भाषण नहीं, चलती बस में सुविधा चाहिए।

रैपिंग नहीं, मजबूत बस चाहिए।
दिखावा नहीं, सुरक्षा चाहिए।
उद्घाटन नहीं, भरोसेमंद सफर चाहिए।

अब सरकार को सिर्फ यह नहीं बताना चाहिए कि कितनी बसें सड़क पर उतारी गईं, बल्कि यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि कौन-सी बस कब और कितने में खरीदी गई, कौन-सी बस पहले से चल रही थी, किस बस पर कितना नवीनीकरण खर्च हुआ और यात्रियों को बताई गई हर सुविधा वास्तव में चालू हालत में है या नहीं। क्योंकि सवाल बसों के रंग का नहीं है_सवाल उन करोड़ों रुपयों का है, जो इन बसों के नाम पर खर्च हुए हैं।

हालांकि केंद्रीय परिवहन मंत्री गडकरी ने योजना के शुभारंभ के दौरान मुख्यमंत्री डॉ यादव को संबोधित करते हुए इन बसों की हालात पर कड़े शब्दों में परिवहन अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा  कि “मैं परिवहन मंत्री हूं और मैं जानता हूं कि आरटीओ के कई अधिकारी गांधीवादी हैं जो नोट के पीछे भागते हैं इसलिए हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि यदि गलत बस को एंट्री किया तो आपकी नौकरी जाएगी”। अब देखना यह होगा कि प्रदेश के गडकरी के इस आग्रह पर किसकी नौकरी लेते हैं अथवा बेशर्मों की तरह मुस्कुराते रहते हैं?