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प्रधानमंत्री के जन्मदिन के दीपोत्सव के टेंडर पर सवाल, ₹4.18 करोड़ के आवंटन की CBI जांच की मांग

कांग्रेस महासचिव अमित शर्मा का आरोप—टेंडर की समय-सीमा, कंपनियों के चयन और खर्च के हिसाब में पारदर्शिता जरूरी; पर्यटन विभाग से मांगा जवाब

भोपाल 16 अक्टूबर 2026। मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के उज्जैन में आयोजित ‘आशीर्वाद का दिया’ दीपोत्सव कार्यक्रम के टेंडर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। मध्य प्रदेश कांग्रेस महासचिव अमित शर्मा ने टेंडर प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं, कंपनियों के चयन और सरकारी धन के उपयोग पर सवाल उठाते हुए पूरे मामले की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन पर आयोजित कार्यक्रम के नाम पर जनता के पैसे का उपयोग हुआ है, इसलिए सरकार को टेंडर से लेकर भुगतान तक का पूरा हिसाब सार्वजनिक करना चाहिए।

टेंडर जारी करने से कार्यादेश तक, समय-सीमा पर उठे सवाल

अमित शर्मा के अनुसार, पर्यटन विभाग ने 16 सितंबर को दोपहर 3:46 बजे ईमेल के जरिए कंपनियों को टेंडर संबंधी जानकारी भेजी और उसी दिन शाम 5 बजे तक प्रस्ताव जमा करने की समय-सीमा तय की। यानी कंपनियों को प्रस्ताव तैयार कर जमा करने के लिए लगभग 74 मिनट का समय मिला। उनका आरोप है कि निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के बाद भी प्रक्रिया जारी रही और उसी रात अहमदाबाद की कंपनी ‘गो बनाना’ को काम आवंटित करने का आदेश जारी कर दिया गया।

यदि यह घटनाक्रम दस्तावेजों से प्रमाणित होता है, तो टेंडर की शर्तों, प्रतिस्पर्धा के अवसर और प्रस्तावों के मूल्यांकन की प्रक्रिया की जांच जरूरी होगी। यह स्पष्ट होना चाहिए कि इतनी कम समय-सीमा तय करने का आधार क्या था, टेंडर किन-किन कंपनियों को भेजा गया, कितने प्रस्ताव प्राप्त हुए और अंतिम चयन किस प्रक्रिया के तहत किया गया।

₹4.18 करोड़ का टेंडर और ₹8.18 करोड़ के प्रस्ताव का सवाल

विज्ञप्ति में दिए गए विवरण के मुताबिक, मुख्य टेंडर की राशि लगभग ₹4.18 करोड़ बताई गई है, जबकि दिल्ली की कंपनी ‘दीपाली डिजाइन’ की ओर से लगभग ₹8.18 करोड़ का प्रस्ताव दिए जाने की बात कही गई है। दोनों राशियों में करीब ₹4 करोड़ का अंतर है। हालांकि, केवल प्रस्तावित राशि में अंतर होने से अनियमितता साबित नहीं होती। इसके लिए टेंडर की शर्तों, प्रस्तावों के तुलनात्मक विवरण, तकनीकी पात्रता और मूल्यांकन रिपोर्ट की जांच आवश्यक है।

शर्मा ने यह भी सवाल उठाया कि उज्जैन में दीपोत्सव के दौरान दीपक जलाने के लिए ₹4.18 करोड़ खर्च किए जाने संबंधी दावे का पूरा हिसाब सामने आना चाहिए। कार्यक्रम की कुल लागत में दीपक, आयोजन प्रबंधन, सजावट, तकनीकी व्यवस्थाओं, सामग्री, परिवहन और अन्य मदों पर कितना खर्च हुआ, इसका मदवार विवरण सार्वजनिक किया जाना चाहिए।

उन्होंने आशंका जताई कि पूरक बिलों और अन्य मदों के कारण कुल खर्च ₹10 करोड़ से ₹18 करोड़ तक पहुंच सकता है। यह फिलहाल उनकी ओर से जताई गई आशंका है; वास्तविक खर्च की पुष्टि के लिए कार्यादेश, बिल, भुगतान अभिलेख और लेखा परीक्षण रिपोर्ट सामने आना जरूरी है।

अधिकारियों की भूमिका और स्थानीय कंपनियों को अवसर देने की मांग

प्रेस कॉन्फ्रेंसअमित शर्मा ने पर्यटन विभाग के अधिकारियों देवेंद्र राय और राहुल अर्गल की भूमिका की निष्पक्ष जांच की मांग की है। उन्होंने कहा कि जांच का दायरा किसी एक कंपनी तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि टेंडर जारी करने, प्रस्ताव प्राप्त करने, मूल्यांकन, कार्यादेश और भुगतान से जुड़े सभी निर्णयों की पड़ताल होनी चाहिए।

उन्होंने मध्य प्रदेश में मौजूद स्थानीय इवेंट मैनेजमेंट कंपनियों, युवाओं और स्टार्टअप को भी सरकारी आयोजनों में समान प्रतिस्पर्धी अवसर देने की मांग की। उनके मुताबिक, दूसरे राज्यों की कंपनियों को काम देने के निर्णय के पीछे अपनाए गए मानदंडों और चयन के आधार को सार्वजनिक किया जाना चाहिए। हालांकि, किसी कंपनी का दूसरे राज्य का होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है; महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चयन निर्धारित नियमों और पारदर्शी प्रक्रिया के तहत हुआ या नहीं।

CBI जांच, खर्च के ऑडिट और दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग

कांग्रेस महासचिव ने ‘आशीर्वाद का दिया’ कार्यक्रम की टेंडर प्रक्रिया और भुगतान की CBI से जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि सभी संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। इनमें टेंडर नोटिस, ईमेल रिकॉर्ड, प्रस्ताव जमा करने का समय, प्राप्त बोलियां, तकनीकी एवं वित्तीय मूल्यांकन, कार्यादेश, संशोधित लागत, पूरक बिल और भुगतान का विवरण शामिल होना चाहिए।

उन्होंने कार्यक्रम के वास्तविक खर्च का विस्तृत ऑडिट कराने और जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की मांग की। शर्मा ने कहा कि राज्य पर कर्ज का बोझ होने के बीच सरकारी आयोजनों में खर्च होने वाली राशि के प्रत्येक रुपये का हिसाब देना सरकार की जिम्मेदारी है।

इस मामले में प्रमुख सवाल यह है कि क्या विभाग निर्धारित टेंडर प्रक्रिया, प्रस्तावों के मूल्यांकन और भुगतान से संबंधित दस्तावेज सार्वजनिक करेगा? क्या 16 सितंबर को टेंडर भेजे जाने से लेकर उसी रात कार्यादेश जारी होने तक की पूरी प्रक्रिया नियमों के अनुरूप थी? और कार्यक्रम पर वास्तविक खर्च कितना हुआ? इन सवालों के जवाब संबंधित दस्तावेजों और पर्यटन विभाग के आधिकारिक पक्ष से ही स्पष्ट हो सकेंगे।