पदावनति के एक महीने बाद भी इंदौर में प्रभारी सहायक आबकारी आयुक्त की कुर्सी पर तिवारी के बने रहने पर सवाल; प्रदेश के सबसे बड़े आबकारी राजस्व वाले जिले में नियमित अधिकारी की पदस्थापना क्यों नहीं?
भोपाल/इंदौर। मध्यप्रदेश के आबकारी विभाग में आखिर किसका आदेश चलता है—शासन का या अभिषेक तिवारी का? 29 सितंबर 2026 को शासन ने विभागीय पदोन्नति आदेश के जरिए अभिषेक कुमार तिवारी को सहायक आबकारी आयुक्त के पद से पदावनत कर दिया, लेकिन सवाल है कि आदेश जारी होने के एक महीने बाद भी वे इंदौर में प्रभारी सहायक आबकारी आयुक्त की भूमिका में कैसे बने हुए हैं? जब पदावनति के बाद उनका पद जिला आबकारी अधिकारी (DEO) का रह गया है और इंदौर जैसे प्रदेश के सबसे बड़े आबकारी राजस्व वाले जिले में सहायक आबकारी आयुक्त का पद है, तो शासन ने अब तक वहां नियमित अधिकारी की पदस्थापना क्यों नहीं की?
क्या विभाग में शासन के आदेशों से ऊपर किसी अधिकारी का अपना प्रभाव तंत्र काम कर रहा है, या फिर प्रशासनिक स्तर पर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं? ये सवाल अब आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
पदावनति का आदेश, फिर भी कुर्सी पर ‘प्रभारी राज’!
वाणिज्यिक कर विभाग के 29 सितंबर 2026 के आदेश में जिला आबकारी अधिकारी शादाब अहमद सिद्दीकी और राकेश कुमार कुर्मी को सहायक आबकारी आयुक्त के पद पर पदोन्नत करने के साथ अभिषेक कुमार तिवारी और दीपकम रायचुरा को पदावनत करने का उल्लेख है। आदेश के अनुसार, पदोन्नति नियम, 2025 के नियम 14(3) के तहत यह कार्रवाई की गई। हालांकि राकेश कुमार की पदोन्नति के बाद उन्हें हाल ही में देवास जिला में सहायक आयुक्त पद पर पदस्थ किया गया।
यहां सबसे बड़ा सवाल इंदौर की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर है। यदि अभिषेक तिवारी अब जिला आबकारी अधिकारी के पद पर प्रत्यावर्तित हैं, तो इंदौर जैसे महत्वपूर्ण जिले में सहायक आबकारी आयुक्त का प्रभार किस आधार पर उनके पास बना हुआ है? शासन के आदेश के बाद भी पदस्थापना की स्थिति स्पष्ट नहीं होना विभागीय जवाबदेही पर सवाल खड़े करता है।
इंदौर प्रदेश के प्रमुख आबकारी राजस्व केंद्रों में शामिल है। ऐसे जिले में नियमित सहायक आबकारी आयुक्त की पदस्थापना के बजाय पदावनत अधिकारी का प्रभारी बने रहना सामान्य प्रशासनिक निर्णय मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शासन को स्पष्ट करना चाहिए कि पदावनति आदेश के बाद इंदौर में पदस्थापना की स्थिति क्या है और नियमित अधिकारी की नियुक्ति अब तक क्यों नहीं हुई।
तबादला नीति भी सवालों के घेरे में
अभिषेक तिवारी की कार्यप्रणाली को लेकर विभागीय गलियारों में पहले से चर्चाएं होने के दावे किए जाते रहे हैं। युग क्रांति में सामने आए मामलों के बाद भी तबादला आदेशों के क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
गोपाल यादव और विनीता सागर, दोनों सहायक जिला आबकारी अधिकारियों को स्थानांतरण के बाद कार्यमुक्त कराने में देरी की बात सामने आई थी। आरोप है कि समाचार प्रकाशित होने और मामला उठाए जाने के बाद उन्हें रिलीव किया गया। इसी क्रम में आबकारी उपनिरीक्षक आशीष जैन के स्थानांतरण आदेश को लेकर भी सवाल कायम हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनका तबादला आदेश 16 जून 2026 को जारी हुआ था, लेकिन उन्हें अब तक कार्यमुक्त नहीं किया गया।
यदि यह स्थिति सही है, तो सवाल केवल एक अधिकारी के तबादले का नहीं, बल्कि शासन की स्थानांतरण नीति के पालन का भी है। विभागीय स्तर पर उद्धृत 22 मई 2026 की स्थानांतरण नीति के बिंदु क्रमांक 43 के अनुसार, स्थानांतरण आदेश जारी होने के दो सप्ताह के भीतर संबंधित अधिकारी-कर्मचारी को कार्यमुक्त किया जाना अनिवार्य बताया गया है। ऐसे में शासन को स्पष्ट करना चाहिए कि आशीष जैन को अब तक कार्यमुक्त क्यों नहीं किया गया और इसके लिए जिम्मेदार कौन है।
जहरीली शराब प्रकरण पर भी उठ रहे सवाल
इंदौर में पदस्थापना और तबादलों के अलावा तुलसी नगर में जहरीली शराब तथा अवैध शराब फैक्ट्री से जुड़े मामले को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आने की बात कही जा रही है। आरोप है कि इस प्रकरण को प्रभावी कार्रवाई के बजाय दबाने की कोशिश की गई। हालांकि, इस आरोप की पुष्टि के लिए जांच के आधिकारिक निष्कर्ष, संबंधित अभिलेख और जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष सामने आना जरूरी है।यदि किसी अधिकारी के विरुद्ध ऐसे गंभीर आरोप हैं, तो विभाग को उनकी जांच की स्थिति सार्वजनिक करनी चाहिए। जहरीली शराब का मामला जनसुरक्षा से जुड़ा है; इसलिए इसमें किसी भी स्तर पर लापरवाही या संरक्षण की आशंका की निष्पक्ष जांच जरूरी है।
विभाग में तिवारी की समानांतर सत्ता का हालिया उदाहरण यह भी है कि “तीन-चार दिन पहले इंदौर में पकड़ी गई दो ट्रकों में अवैध शराब की 3000 पेटी _मामले में इंदौर आबकारी क्यों चुप्पी साधे है?”
मुख्यमंत्री के कथित करीबी होने की चर्चा, विभाग में प्रभाव का दावा!
विभागीय गलियारों में अभिषेक तिवारी के मुख्यमंत्री के एक कथित भतीजे के बेहद करीबी होने और इसी प्रभाव के आधार पर विभाग में अपनी मजबूत पकड़ का दावा करने जैसी चर्चाएं भी सुनाई देने की बात कही जाती है। हालांकि, इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है और इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता। फिर भी यदि ऐसे दावे विभागीय निर्णयों को प्रभावित कर रहे हैं, तो शासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या किसी अधिकारी की प्रशासनिक हैसियत शासन के लिखित आदेशों से तय होगी या उसके कथित प्रभाव से? यदि पदावनति के बाद भी कोई अधिकारी उसी उच्च पद का प्रभार संभाले रहता है, तबादला आदेशों का पालन नहीं होता और गंभीर मामलों में कार्रवाई को लेकर सवाल उठते हैं, तो विभागीय नियंत्रण की समीक्षा अनिवार्य हो जाती है।
शासन जवाब दे_आदेश प्रभावी है या केवल कागजों तक सीमित?
अभिषेक तिवारी के मामले में अब वाणिज्यिक कर विभाग और आबकारी आयुक्त कार्यालय को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए—
- 29 सितंबर 2026 के पदावनति आदेश के बाद अभिषेक तिवारी को इंदौर में प्रभारी सहायक आबकारी आयुक्त बनाए रखने का कोई अलग आदेश जारी हुआ है या नहीं?
- यदि ऐसा आदेश नहीं है, तो उन्हें अब तक इस पद के प्रभार से क्यों नहीं हटाया गया?
- इंदौर जैसे महत्वपूर्ण आबकारी जिले में नियमित सहायक आबकारी आयुक्त की पदस्थापना कब की जाएगी?
- आशीष जैन के 16 जून के स्थानांतरण आदेश का पालन अब तक क्यों नहीं हुआ?
- तुलसी नगर के जहरीली शराब एवं कथित अवैध फैक्ट्री प्रकरण में जांच और कार्रवाई की वास्तविक स्थिति क्या है?
इन सवालों का जवाब किसी अधिकारी की व्यक्तिगत छवि का नहीं, बल्कि शासन की प्रशासनिक विश्वसनीयता का विषय है। यदि शासन का आदेश जारी होने के बाद भी उसकी मंशा के अनुरूप कार्रवाई नहीं होती, तो जिम्मेदारी तय करना जरूरी है।
अब देखना यह है कि शासन इंदौर में नियमित सहायक आबकारी आयुक्त की पदस्थापना कर प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करता है या फिर पदावनति के बाद भी ‘प्रभारी राज’ की स्थिति बनी रहती है।
